वाराणसी की धरती पर आज सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के अधिकारों को लेकर एक नया और मुखर स्वर गूंजा है। पृष्ठभूमि में सितंबर 2026 की यह हलचल देश के उन तमाम समुदायों की सुध लेने की दावत देती है, जो दशकों से विकास की रोशनी से महरूम रहे हैं। मौका था 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के महानायक और परमवीर चक्र विजेता शहीद अब्दुल हमीद की 61वीं पुण्यतिथि का, जिसे राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने एक बड़े जागरूकता अभियान और पदयात्रा के रूप में तब्दील कर दिया। इस आयोजन के जरिए पिछड़े वर्ग, मुस्लिम दलित जातियों और अति पिछड़ी जातियों की दशा और दिशा पर गंभीर सवाल खड़े किए गए।
शहीद अब्दुल हमीद के बलिदान को किया गया याद
कार्यक्रम की शुरुआत देश के वीर सपूत शहीद अब्दुल हमीद को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष यूथ, नुरुल हुदा ने अपने संबोधन में कहा कि जिस महान योद्धा ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश की संप्रभुता की रक्षा की, विडंबना यह है कि आज उसी समाज और पृष्ठभूमि के लोग उपेक्षा का शिकार हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी एक बड़े तबके की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है।
नुरुल हुदा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को उसका हक नहीं मिलता, तब तक राष्ट्र का सर्वांगीण विकास अधूरा ही रहेगा। उन्होंने देश के नीति-निर्माताओं से अपील की कि वे शहीदों के सम्मान और उनके सपनों को साकार करने के लिए वंचित जातियों के कल्याण हेतु ठोस और व्यावहारिक नीतियां बनाएं।
अरजाल आयोग के गठन की उठी पुरजोर मांग
कार्यक्रम का सबसे मुख्य और राजनीतिक रूप से संवेदनशील केंद्र बिंदु 'अरजाल आयोग' (Arzal Commission) के गठन की मांग रही। वक्ताओं ने विस्तार से बताया कि मुस्लिम समाज के भीतर भी कई ऐसी जातियां हैं जिनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। इन जातियों में पमरिया/पवरिया, मुस्लिम माली, गौरी, भट्ट और नट जैसी उप-जातियां प्रमुख रूप से शामिल हैं।
काउंसिल के नेताओं का तर्क है कि इन समुदायों की वास्तविक और जमीनी हकीकत का आकलन करने के लिए एक विशेष आयोग का होना अनिवार्य है। अरजाल आयोग के गठन से न केवल इनकी समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन हो सकेगा, बल्कि उनके उत्थान के लिए सटीक नीतियां भी तैयार की जा सकेंगी। वक्ताओं ने पुराने कई ऐतिहासिक आयोगों और समितियों का हवाला दिया।
पूर्व आयोगों की रिपोर्टों का दिया गया हवाला
चर्चा के दौरान वक्ताओं ने देश की विभिन्न महत्वपूर्ण कमेटियों और आयोगों की संस्तुतियों को आधार बनाया। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- मंडल कमीशन: सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान।
- रंगनाथ मिश्रा आयोग: धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के कल्याण हेतु सिफारिशें।
- सच्चर कमेटी: मुस्लिम समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सच।
- काका कालेलकर आयोग: पिछड़े वर्गों के अधिकारों की नींव।
- रोहिणी आयोग: ओबीसी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) की दिशा में प्रयास।
इन सभी रिपोर्टों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि सरकार के पास पहले से ही पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं, बस जरूरत है तो राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की।
चार सूत्रीय मांगों का विस्तृत खाका
कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के समक्ष चार बेहद महत्वपूर्ण मांगें रखीं, जो आने वाले दिनों में राजनीतिक गलियारों में बड़ी बहस का विषय बन सकती हैं:
- अनुच्छेद 341(3) से धार्मिक प्रतिबंध हटाना: संविधान के इस अनुच्छेद के तहत दलित का दर्जा पाने के लिए धर्म की शर्त जोड़ी गई है, जिसे हटाने की मांग लंबे समय से की जा रही है ताकि दलित मुस्लिमों और ईसाइयों को भी उनका हक मिल सके।
- अरजाल आयोग का गठन: मुस्लिम दलित और अति पिछड़ी जातियों के संपूर्ण विकास के लिए एक स्वतंत्र आयोग की स्थापना।
- ओबीसी सूची में शामिल करना: मुस्लिम पमरिया, पवरिया और अन्य छूटी हुई पात्र जातियों को उत्तर प्रदेश की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की अनुमन्य सूची में शामिल किया जाना।
- कर्पूरी फॉर्मूला लागू करना: बिहार राज्य की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी ओबीसी आरक्षण को उप-श्रेणियों में बांटकर (अति पिछड़ा और पिछड़ा) कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला लागू करना।
पदयात्रा और ज्ञापन सौंपने की प्रक्रिया
विचार-गोष्ठी और सभा के समापन के पश्चात, राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के बैनर तले सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने वाराणसी की सड़कों पर एक अनुशासित पदयात्रा निकाली। हाथों में तख्तियां और बैनर लिए कार्यकर्ताओं ने सामाजिक न्याय के नारे लगाए। इस पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य आम जनमानस को इन ज्वलंत मुद्दों के प्रति जागरूक करना था।
पदयात्रा के उपरांत, काउंसिल का एक प्रतिनिधिमंडल जिला प्रशासन के अधिकारियों से मिला। प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को संबोधित एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि इन चार सूत्रीय मांगों पर जल्द ही सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आंदोलन को और अधिक तीव्र किया जाएगा।
राजनीतिक और सामाजिक मायने
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के अभियानों से चुनावी माहौल में एक नई गर्माहट आती है। खासकर जब बात उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की हो, जहां पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों का समीकरण चुनावी नतीजों को तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है। उलेमा काउंसिल का यह कदम सत्ता और शासन में उचित भागीदारी की उस पुरानी मांग को फिर से हवा दे रहा है, जो भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों यानी 'सामाजिक न्याय' से सीधा जुड़ा हुआ है। अब देखना यह होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और आने वाले समय में इन वंचित समुदायों के लिए क्या प्रशासनिक पहल की जाती है।