देश की सरहदों पर सीना तानकर खड़े रहने वाले सैनिकों को जब अपनों के बीच ही अपने ही हक के लिए आंसू बहाने पड़ें, तो यह व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर देता है। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक ऐसी ही झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने हर संवेदनशील इंसान को अंदर से झकझोर कर रख दिया है। रीवा कलेक्ट्रेट परिसर में उस वक्त अजीब और गमगीन माहौल बन गया, जब एक भारतीय सेना का जवान अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदे गए प्लॉट के रास्ते को लेकर गुहार लगाते-लगाते प्रशासनिक अधिकारियों के सामने ही फफक-फफक कर रो पड़ा।
रतहरा इलाके का मामला: 20 फीट रास्ते के लिए संघर्ष
यह पूरा मामला रीवा शहर के रतहरा इलाके से जुड़ा हुआ है। यहां एक रेजिडेंशियल प्लॉटिंग से जुड़े रास्ते का विवाद पिछले काफी समय से तूल पकड़ता जा रहा है। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, उन्होंने अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी लगाकर यहां प्लॉट खरीदे थे, ताकि वे अपने परिवार के साथ एक शांतिपूर्ण जीवन बिता सकें। लेकिन प्लॉट तक पहुंचने के लिए जो 20 फीट चौड़ा रास्ता तय किया गया था, उस पर अब स्थानीय स्तर पर अड़ंगे लगाए जा रहे हैं।
इस रास्ते के बंद होने या विवादित होने की वजह से इन सभी 12 प्लॉट खरीदारों का जीना मुहाल हो गया है। स्थिति यह बन चुकी है कि लोग अपने ही खरीदे हुए प्लॉट पर ईंट, सीमेंट या अन्य निर्माण सामग्री तक नहीं ले जा पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आम नागरिकों के साथ-साथ देश के एक सजग प्रहरी यानी फौजी का धैर्य भी जवाब दे गया।
कलेक्ट्रेट पहुंचे 12 खरीदार, बयां किया अपना दर्द
अपनी इस विकट समस्या से निजात पाने के लिए रतहरा के इन 12 प्लॉट खरीदारों ने एकजुट होकर जिला कलेक्ट्रेट का रुख किया। उनका मुख्य उद्देश्य रीवा कलेक्टर के समक्ष अपनी बात रखना और एक निष्पक्ष जांच तथा समाधान की मांग करना था। कलेक्ट्रेट में जब इन सभी ने अपनी पीड़ा प्रशासनिक अधिकारियों के सामने रखनी शुरू की, तो माहौल बेहद भावुक हो गया।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उन्होंने बिल्डर या कॉलोनाइज़र से नियमानुसार रास्ते के प्रावधान को देखकर ही जमीन खरीदी थी। लेकिन रजिस्ट्री और लिखा-पढ़ी होने के बाद अब उन्हें रास्ते के इस्तेमाल से रोका जा रहा है। स्थानीय स्तर पर कई बार पंचायत और समझाइश के दौर चले, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। आखिरकार, थक-हारकर इन सभी को न्याय के मंदिर यानी कलेक्टर की शरण में आना पड़ा।
परेशानी बताते-बताते फौजी का टूटा सब्र
इस पूरे प्रतिनिधिमंडल में शामिल एक फौजी जब अपनी आपबीती सुना रहा था, तो उसकी आंखें नम हो गईं। सरहद पर दुश्मनों का डटकर मुकाबला करने वाले इस जवान का जब घरेलू और प्रशासनिक मोर्चे पर यह हाल हुआ, तो उसका सब्र टूट गया। अपनी परेशानी बयां करते-करते वह कलेक्टर कार्यालय में ही फूट-फूटकर रो पड़ा।
फौजी ने रोते हुए अधिकारियों से कहा, "सर, हम देश की सेवा में अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा लगा देते हैं, पीछे परिवार को सुरक्षित छोड़ने की उम्मीद में अपनी कमाई का एक-एक पाई जोड़कर जमीन लेते हैं। लेकिन आज हालात यह हैं कि हमें अपने ही प्लॉट तक जाने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। अगर हमें अपने ही देश में इस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी, तो हम कहां जाएंगे?"
फौजी का यह दर्द वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर गया। आसपास खड़े अन्य लोग भी इस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गए। यह सिर्फ एक फौजी के रोने की घटना नहीं थी, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल था जो आम आदमी को अपने हक के लिए महीनों और सालों चक्कर काटने पर मजबूर कर देती है।
क्या कहती है स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था?
इस हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील मामले के तूल पकड़ने के बाद जिला प्रशासन भी हरकत में आ गया है। कलेक्ट्रेट पहुंचे पीड़ितों की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों ने मामले की फाइल तलब कर ली है। प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रतहरा के इस रास्ते वाले विवाद की पूरी तहकीकात की जा रही है।
- प्लॉट खरीदारों की मुख्य मांग: रतहरा में 20 फीट चौड़े रास्ते को तुरंत अतिक्रमण मुक्त कराया जाए।
- दस्तावेजों की जांच: कॉलोनाइज़र और स्थानीय भू-स्वामियों के बीच हुए अनुबंध और अप्रूव्ड लेआउट की बारीकी से जांच हो।
- त्वरित कार्रवाई का आश्वासन: प्रशासन ने मामले में निष्पक्ष जांच का भरोसा दिलाया है।
भविष्य को लेकर चिंता में डूबे हैं परिवार
इन 12 खरीदारों ने अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन जमीनों में निवेश किया है। कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने बैंक से भारी-भरकम लोन लेकर ये प्लॉट खरीदे हैं। अब किस्तें भी भरी जा रही हैं और जमीन का कोई उपयोग भी नहीं हो पा रहा है। रास्ते के विवाद के कारण वे अपने सपनों का आशियाना भी नहीं बना पा रहे हैं।
परिवारों का कहना है कि अगर समय रहते इस पर कोई ठोस प्रशासनिक कदम नहीं उठाया गया, तो यह विवाद और अधिक बढ़ सकता है। लोगों को डर है कि कहीं उनकी संपत्ति विवादों की भेंट न चढ़ जाए।
निष्कर्ष और आगे की उम्मीद
रीवा कलेक्ट्रेट में घटी यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे देश में जमीन और प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद कितने जटिल और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले होते हैं। एक सैनिक का रोना इस बात का प्रतीक है कि जब आम इंसान अपनी बुनियादी जरूरतों और हक के लिए सिस्टम के चक्कर काट-काटकर थक जाता है, तब उसका अंदर का गुबार आंसुओं के जरिए बाहर आता है।
अब देखना यह होगा कि रीवा जिला प्रशासन इस मामले में कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी कार्रवाई करता है। क्या इन 12 खरीदारों, खासकर उस फौजी को उसका हक और न्याय मिल पाएगा? इसका जवाब आने वाले कुछ दिनों में होने वाली प्रशासनिक जांच और कार्रवाई से ही मिल सकेगा। फिलहाल, इस घटना ने पूरे रीवा संभाग में सनसनी फैला दी है और हर तरफ इसी बात की चर्चा हो रही है।