अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) के पहले वैश्विक सर्वेक्षण में खेल जगत को चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इसके अनुसार, तीन चौथाई यानी 76 प्रतिशत महिला खिलाड़ियों, कोचों और अधिकारियों ने किसी न किसी रूप में लिंगभेद या उत्पीड़न का सामना किया है।
अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) के महिला आयोग द्वारा कराए गए 'FIDE वीमेन इन चेस रिप्रेजेंटेशन, पार्टिसिपेशन एंड डेवलपमेंट सर्वे' के मुताबिक, 38 प्रतिशत महिलाओं ने ऑनलाइन दुर्व्यवहार या उत्पीड़न का अनुभव साझा किया है। इसके अलावा, 63 प्रतिशत महिलाओं और बालिकाओं ने शतरंज के माहौल में लिंगभेद का सामना करने की बात कही है, जिसमें से 16 प्रतिशत ने माना कि ऐसा अक्सर होता है। वहीं, 38 प्रतिशत ने यौन उत्पीड़न या अनुचित व्यवहार की पुष्टि की है।
वैश्विक स्तर पर हुआ सर्वेक्षण और भारत की भागीदारी
यह सर्वेक्षण इस साल 3 अगस्त से 14 सितंबर के बीच 127 राष्ट्रीय महासंघों से जुड़ी कुल 672 महिला उत्तरदाताओं के बीच कराया गया था, जिसके निष्कर्ष इस महीने प्रकाशित किए गए। इस अध्ययन में भारत सबसे बड़ा योगदान देने वाला महासंघ रहा, जहाँ से 69 उत्तरदाता (यानी 10 प्रतिशत से अधिक) शामिल थीं।
सर्वेक्षण में 133 FIDE-टाइटिल प्राप्त खिलाड़ी शामिल थीं, जिनमें 10 महिला ग्रैंडमास्टर (WGM), 27 महिला इंटरनेशनल मास्टर (WIM), 49 महिला FIDE मास्टर (WFM) और 43 महिला कैंडिडेट मास्टर (WCM) शामिल थीं।
आयु वर्ग और टाइटिल्स के आधार पर स्थिति
18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में 70 प्रतिशत ने शतरंज के दायरे में लिंगभेद का सामना किया, जबकि 46 प्रतिशत ने यौन उत्पीड़न या अनुचित व्यवहार की बात कही। वहीं, 18 वर्ष से कम उम्र की उत्तरदाताओं में 47 प्रतिशत ने लिंगभेद और 17 प्रतिशत ने यौन उत्पीड़न का सामना करने की बात स्वीकार की। जब इस सैंपल को केवल FIDE टाइटिल प्राप्त महिलाओं तक सीमित किया गया, तो ये आंकड़े बढ़कर क्रमशः 81 प्रतिशत और 55 प्रतिशत हो गए।
क्षेत्रीय आधार पर देखें तो लिंगभेद उत्तर अमेरिका में 83%, दक्षिण अमेरिका में 78%, यूरोप में 74% और मध्य अमेरिका में 73% दर्ज किया गया, जबकि एशिया में यह 53% और अफ्रीका में 50% रहा।
शतरंज छोड़ने का विचार और अन्य बड़ी बाधाएं
सर्वेक्षण का दायरा केवल लिंगभेद और उत्पीड़न तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके अन्य पहलू भी गंभीर तस्वीर पेश करते हैं:
- सर्वेक्षण में शामिल 44 प्रतिशत महिलाओं ने शतरंज छोड़ने पर विचार किया था। लिंगभेद का सामना करने वाली महिलाओं में से 56 प्रतिशत और यौन उत्पीड़न का शिकार हुई महिलाओं में से 58 प्रतिशत ने खेल छोड़ने के बारे में सोचा।
- 54 प्रतिशत महिलाओं के पास शतरंज में कभी कोई महिला रोल मॉडल या मेंटर नहीं रहा, और केवल एक तिहाई (33 प्रतिशत) महिलाएं ही अपने क्षेत्रीय शतरंज समुदाय में खुद को पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व प्राप्त मानती हैं। जिन महिलाओं के बच्चे थे, उन्होंने खेल छोड़ने की संभावना कम (35%) जताई, जबकि बिना बच्चों वाली महिलाओं में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत था।
- विकास में सबसे बड़ी बाधाओं के रूप में दो-तिहाई (66%) ने वित्तीय लागत (यात्रा, कोचिंग और एंट्री फीस) को चुना, जबकि लगभग आधी (48%) महिलाओं ने स्कूल, काम या परिवार के समय की पाबंदियों को मुख्य कारण बताया।
विशेषज्ञों की राय और आगे की सिफारिशें
FIDE महिला आयोग की अध्यक्ष ट्रिस-एन रिचर्ड्स ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि यह सर्वेक्षण महिलाओं के अनुभवों को सीधे तौर पर समझने के लिए कराया गया था ताकि ठोस और व्यावहारिक समाधान तलाशे जा सकें। उन्होंने कहा कि आंकड़े चिंताजनक जरूर हैं, लेकिन इन्हें केवल डरावने आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह समाज और कार्यस्थलों पर महिलाओं की व्यापक चुनौतियों का हिस्सा हैं।
रिपोर्ट के लेखकों ने यह भी नोट किया कि वास्तविक आंकड़े इससे अधिक हो सकते हैं क्योंकि इसमें उन महिलाओं के अनुभव शामिल नहीं हैं जो पहले ही खेल छोड़कर जा चुकी हैं। आयोग ने अपनी सिफारिशों में टूर्नामेंट हॉल, कोचिंग रिश्तों और ऑनलाइन स्पेस को कवर करने वाला स्पष्ट आचार संहिता अपनाने, स्वतंत्र रूप से संचालित होने वाले गोपनीय रिपोर्टिंग चैनल स्थापित करने और आर्बिटर्स को उत्पीड़न पहचानने व प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षित करने की बात कही है।