मुंबई पुलिस ने जनवरी से अगस्त 2026 के बीच दर्ज नाबालिग लड़कियों के 97 प्रतिशत मामलों को सुलझाने का दावा किया है, जबकि शहर में इस दौरान कुल 875 मामले सामने आए थे।
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में नाबालिग लड़कियों की गुमशुदगी के मामले पुलिस प्रशासन के लिए गंभीर और संवेदनशील विषय बने हुए हैं। मुंबई पुलिस द्वारा जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू वर्ष 2026 में जनवरी से लेकर अगस्त तक के आठ महीनों में नाबालिग लड़कियों के लापता होने के कुल 875 मामले दर्ज किए गए हैं। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इनमें से 846 मामलों को सफलतापूर्वक सुलझा लिया है, जो कुल दर्ज मामलों का लगभग 96.7 प्रतिशत बैठता है। केवल अगस्त के महीने में ही गुमशुदगी के 109 नए मामले सामने आए, जिनमें से पुलिस ने 91 मामलों का पता लगाकर बालिकाओं को सुरक्षित वापस ढूंढ निकाला।
हर पुलिस स्टेशन में विशेष मिसिंग स्क्वाड का गठन
नाबालिगों के लापता होने की सूचना मिलने पर पुलिस द्वारा किसी भी प्रकार की देरी नहीं की जाती है और तत्काल औपचारिक मामला दर्ज कर उनकी तलाश शुरू कर दी जाती है। इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए मुंबई के प्रत्येक स्थानीय पुलिस स्टेशन में एक विशेष ‘मिसिंग स्क्वाड’ का गठन किया गया है। इन विशेष टीमों का मुख्य दायित्व गुमशुदा बच्चों की तलाश करना, उपलब्ध सुरागों, कॉल डिटेल और तकनीकी सहायता की जांच करना तथा बच्चों को सुरक्षित बरामद कर उनके परिजनों तक पहुंचाना है।
कानूनी प्रावधानों के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लापता होने पर परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपहरण से संबंधित कानूनी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाता है। उपलब्ध जानकारी में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2) का उल्लेख किया गया है, हालांकि इस विशिष्ट विधिक प्रावधान के सटीक और विस्तृत संदर्भ की प्रकाशन से पूर्व पुष्टि किया जाना आवश्यक माना गया है।
पारिवारिक विवाद, रिश्ते और सामाजिक कारण
पुलिस अधिकारियों के विश्लेषण के अनुसार, कई मामलों में नाबालिग लड़कियां अपनी मर्जी से या घरों में चल रहे पारिवारिक विवादों के कारण स्वयं घर छोड़ देती हैं। हालांकि, बच्चों के नाबालिग होने के कारण कानूनन पुलिस के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु पूरी विधिक प्रक्रिया का पालन करे।
इस संदर्भ में कुछ समय पहले जुलाई 2026 के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में राज्य स्तर के कुछ आंकड़े साझा किए थे। उनके अनुसार, वर्ष 2021 से 2026 के बीच लापता महिलाओं और बालिकाओं के मामलों में लगभग 46.32 प्रतिशत मामले रोमांटिक रिश्तों तथा करीब 20 प्रतिशत मामले पारिवारिक समस्याओं से जुड़े हुए थे। हालांकि, प्रशासन स्पष्ट करता है कि ये आंकड़े पूरे महाराष्ट्र राज्य के स्तर के हैं, इसलिए इन्हें सीधे तौर पर केवल मुंबई शहर के नाबालिगों के मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता है।
घरेलू हिंसा और सोशल मीडिया के जोखिम
विभिन्न सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि कुछ परिवारों में बच्चों के साथ होने वाली मारपीट, सामाजिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी परिस्थितियां भी लड़कियों को मानसिक रूप से परेशान कर घर छोड़ने के लिए विवश कर सकती हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स या निजी संपर्कों के माध्यम से मिलने वाले लुभावने और झूठे वादे भी कई बार नाबालिगों को गंभीर जोखिम में डाल देते हैं। ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़ित परिवारों और स्थानीय पुलिस की समय पर की गई संयुक्त कार्रवाई सबसे अधिक महत्वपूर्ण साबित होती है।
तकनीकी और सीसीटीवी की मदद से सफल तलाश
मुंबई महानगर में गुमशुदा बच्चों की तलाश के अभियानों के दौरान आधुनिक तकनीक और सीसीटीवी फुटेज पुलिस के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहे हैं। इसका एक उदाहरण हाल ही में सामने आया था जब 21 जुलाई को दादर की हिंदू कॉलोनी से सात वर्ष की एक बच्ची अचानक लापता हो गई थी। माटुंगा पुलिस ने तुरंत सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालते हुए व्यापक तलाश अभियान चलाया और बच्ची को सुरक्षित ढूंढ निकाला। इसी तरह, शिवड़ी से एक 13 वर्षीय छात्रा के लापता होने तथा अगस्त के महीने में भिवंडी क्षेत्र से दो 17 वर्षीय किशोरियों के लापता होने के मामलों में भी पुलिस ने तत्परता से जांच और बरामदगी की कार्रवाई पूरी की।