कोलकाता की आबोहवा में एक बार फिर साहित्य और कला की बयार बहने वाली है। दुर्गापूजा के ठीक मुहाने पर खड़े शहरवासियों के लिए एक ऐसी खबर सामने आई है, जो साहित्यिक गलियारों में खासी चर्चा का विषय बन चुकी है। अपने बेबाक लेखन और साहसिक विचारों के लिए पूरी दुनिया में पहचानी जाने वाली प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन एक बार फिर ‘सिटी ऑफ जॉय’ यानी कोलकाता के दौरे पर आ रही हैं। महालया के पावन अवसर पर उनके आगमन को लेकर उनके चाहने वालों और पाठकों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है।
महाजाति सदन में सजेगी महफिल, होगा खास मंचन
प्राप्त जानकारी के अनुसार, तसलीमा नसरीन इस बार केवल एक आगंतुक के तौर पर नहीं आ रही हैं, बल्कि शहर के सांस्कृतिक पटल पर अपनी एक नई कलात्मक प्रस्तुति की छाप छोड़ने के लिए तैयार हैं। शहर के ऐतिहासिक महाजाति सदन में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन तय माना जा रहा है। इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ‘शिकोल भांगार गल्पो’ (जंजीर तोड़ने की कहानी) नामक प्रस्तुति का मंचन होगा।
इस अनूठे प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका निर्देशन खुद तसलीमा नसरीन कर रही हैं। उनके शब्दों और सोच को मंच पर जीवंत करने की जिम्मेदारी प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित नृत्यांगना मैत्री पहाड़ी को सौंपी गई है। नृत्य और साहित्य का यह संगम दर्शकों के लिए एक बेहद यादगार अनुभव साबित हो सकता है।
तय हो चुका है यात्रा का पूरा कार्यक्रम
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, तसलीमा नसरीन आगामी 8 अक्टूबर को कोलकाता की धरती पर कदम रखेंगी। उनका यह प्रवास लगभग पांच दिनों का होगा, जिसके तहत वह 12 अक्टूबर तक शहर में ही मौजूद रहेंगी। यानी ठीक दुर्गापूजा के उल्लास भरे माहौल के बीच उनके प्रशंसकों को अपनी चहेती लेखिका के बेहद करीब रहने और उन्हें शहर में देखने का दुर्लभ अवसर मिलेगा। हालांकि, इस भव्य कार्यक्रम के आधिकारिक आयोजकों के नामों का खुलासा अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन प्रशासनिक और सांस्कृतिक हलकों में इसकी सुगबुगाहट तेज हो गई है।
कुछ समय पहले ही हुई थी बहुप्रतीक्षित वापसी
यह पूरा घटनाक्रम इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि करीब दो दशक लंबे और दर्दनाक निर्वासन के झटकों को झेलने के बाद, इसी वर्ष एक अगस्त को तसलीमा नसरीन ने कोलकाता की आबोहवा में सांस ली थी। उस ऐतिहासिक वापसी के दौरान रवींद्र सदन में ‘सेक्युलर मिशन’ नामक संस्था की तरफ से उनका भव्य और गर्मजोशी से स्वागत किया गया था।
उस यात्रा के दौरान राजनीतिक गलियारों से भी सकारात्मक संदेश देखने को मिले थे। कार्यक्रम के दौरान उनकी सुरक्षा और सम्मान को लेकर बड़े आश्वासन दिए गए थे, जिससे उनके प्रशंसकों को काफी राहत मिली थी। पिछली बार जब वह कोलकाता से अपने गंतव्य के लिए रवाना हो रही थीं, तो हवाईअड्डे पर ही उन्होंने यह संकेत दे दिए थे कि वह अक्टूबर के महीने में एक बार फिर इस शहर का रुख करेंगी। उनकी वह बात अब सच साबित होती दिख रही है।
सांस्कृतिक और वैचारिक हलचल तेज
तसलीमा नसरीन का नाम हमेशा से विवादों और वैचारिक बहसों के केंद्र में रहा है। ‘लज्जा’, ‘द्विखंडित’ और ‘मेयबेला’ जैसी उनकी किताबों ने उपमहाद्वीप के साहित्य में तहलका मचा दिया था। उनके विचारों के समर्थक और विरोधी दोनों ही समाज में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। ऐसे में, दुर्गापूजा के ठीक पहले उनका कोलकाता आना और एक सांस्कृतिक मंच के जरिए जनता के बीच उपस्थित होना निश्चित रूप से शहर की राजनीतिक और साहित्यिक फिजा में एक नई हलचल पैदा करेगा।
सुरक्षा एजेंसियों से लेकर स्थानीय प्रशासन तक, सभी इस हाई-प्रोफाइल दौरे को लेकर सतर्क और मुस्तैद हैं। पिछले दौरे की तरह इस बार भी उनके प्रवास के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने की उम्मीद है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।
कला प्रेमियों में भारी उत्सुकता
कोलकाता हमेशा से कला, साहित्य और दुर्गापूजा के भव्य मेल के लिए जाना जाता है। ऐसे समय में जब पूरा शहर महालया की गूंज और पूजा की तैयारियों में डूबा होगा, तसलीमा नसरीन की मौजूदगी इस उल्लास में एक बौद्धिक और वैचारिक आयाम जोड़ देगी। ‘शिकोल भांगार गल्पो’ के जरिए वह समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं और मंच पर उनकी यह नई पारी कितनी सफल रहती है, यह तो अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में ही साफ हो पाएगा। फिलहाल, साहित्य प्रेमियों की निगाहें पूरी तरह से 8 अक्टूबर की तारीख पर टिकी हुई हैं।