मेवाड़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरा ने सदियों से अपनी गोद में अनगिनत रहस्यों, परंपराओं और प्राचीन विरासतों को समेट कर रखा है। रेगिस्तान और पहाड़ों के इस आंचल में फैले धार्मिक स्थल न केवल आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि उस कालखंड की वास्तुकला और इंजीनियरिंग की अद्भुत दास्तां भी बयान करते हैं। आज हम आपको ले चल रहे हैं राजस्थान के एक ऐसे ही प्राचीन और चमत्कारी तीर्थ स्थल पर, जिसकी गिनती राज्य के 108 प्रमुख जैन तीर्थों में होती है। समय के बड़े-बड़े थपेड़ों को झेलते हुए भी यह पावन स्थल आज अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा है।
उदयपुर के सवीना खेड़ा में स्थित है यह ऐतिहासिक धरोहर
झीलों की नगरी उदयपुर के सवीना खेड़ा इलाके में स्थित श्री पार्श्वनाथ भगवान का यह प्राचीन जैन मंदिर किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इतिहास के पन्नों और शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, यह मंदिर लगभग दो हजार वर्ष पुराना माना जाता है। जब इस बात का अहसास होता है कि कोई संरचना दो सदियों से भी ज्यादा समय से इंसानी सभ्यता और आस्था की गवाह रही है, तो मन में एक अजब सी सिहरन और जिज्ञासा पैदा हो जाती है। मंदिर की बनावट, इसकी दीवारें और इसमें इस्तेमाल किए गए पत्थर अपने भीतर इतिहास के अनगिनत अध्यायों को समेटे हुए हैं।
स्थानिय जानकारों और इतिहास में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण उस प्राचीन शैली में हुआ है जो उस समय के स्थापत्य कला के चरम को दर्शाती है। शिखरबंद शैली में बने इस मंदिर की विशालता और भव्यता इसके मुख्य द्वार पर कदम रखते ही साफ महसूस होने लगती है। मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों तरफ पत्थरों को तराश कर बनाई गई हाथियों की सजीव आकृतियां इस बात का प्रमाण हैं कि उस दौर के शिल्पकार अपनी कला में कितने माहिर और सिद्धहस्त थे।
काले पाषाण की 2000 साल पुरानी अद्भुत प्रतिमा
इस मंदिर के गर्भग्रह (निज मंदिर) में प्रवेश करते ही एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा का अहसास होता है। यहां भगवान पार्श्वनाथ की बेहद मनमोहक और चमत्कारी प्रतिमा विराजमान है। काले पाषाण (ब्लैक स्टोन) से गढ़ी गई यह मूर्ति लगभग 19 इंच ऊंची है। इसकी दिव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब इसके ऊपर बने सर्प छत्र को भी शामिल किया जाता है, तो इसकी कुल ऊंचाई 21 इंच हो जाती है। वहीं, पूरे परिकर को मिलाने पर इसकी कुल ऊंचाई 41 इंच तक पहुंच जाती है।
पंचतीर्थी स्वरूप में ढाली गई यह प्रतिमा न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है, बल्कि कला प्रेमियों के लिए भी किसी अजूबे से कम नहीं है। इस प्रतिमा के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं को एक असीम शांति की अनुभूति होती है। यही वजह है कि दूर-दूर से लोग इस पावन मूर्ति के दर्शन के लिए उदयपुर खींचे चले आते हैं।
सफेद संगमरमर और प्राचीन शिलालेख का रहस्य
मंदिर परिसर में केवल भगवान पार्श्वनाथ ही नहीं, बल्कि अन्य पावन प्रतिमाएं भी मौजूद हैं जो इसके ऐतिहासिक महत्व को और अधिक बढ़ा देती हैं। मंदिर में भगवान धर्मनाथ स्वामी की एक अत्यंत भव्य श्वेत संगमरमर (व्हाइट मार्बल) की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता इसके नीचे खुदा हुआ एक प्राचीन शिलालेख है।
इस शिलालेख पर विक्रम संवत 1699 साफ-साफ अंकित है। यह शिलालेख उस कालखंड के इतिहास को समझने का एक बहुत बड़ा जरिया है। इसमें तत्कालीन उपकेश वंश और इस प्रतिमा के निर्माण में सहयोग देने वाले या इसे स्थापित करने वाले दानदाताओं के नामों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह इस बात का सबूत है कि सदियों पहले भी समाज के दानवीर लोग धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे।
अन्य प्रमुख प्रतिमाएं और कलाकृतियां
मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के ठीक दाहिने हाथ की ओर एक और महत्वपूर्ण मूर्ति स्थापित है। यह पक्षी लांछन से युक्त सुमतिनाथ या अनंतनाथ भगवान की 19 इंच ऊंची श्वेत पाषाण प्रतिमा है, जो मंदिर की कलात्मक समृद्धि में चार चांद लगाती है। इसके अलावा, मंदिर के विशाल सभा मंडप में बनी हुई आलियों (niches) में पार्श्वयक्ष और देवी पद्मावती की सुंदर प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। ये मूर्तियां प्राचीन काल की मूर्तिकला के उच्च स्तर को दर्शाती हैं, जहां हर एक बारीक विवरण को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है।
पौष दशमी पर उमड़ता है आस्था का सैलाब
श्री जैन श्वेतांबर महासभा की देखरेख और संरक्षण में चल रहे इस ऐतिहासिक तीर्थ स्थल के प्रति जैन समाज सहित अन्य धर्मों के लोगों में भी गहरी आस्था है। श्री जैन श्वेतांबर महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर के अनुसार, मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा को लेकर भक्तों में अटूट श्रद्धा और कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। सालभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन विशेष अवसरों पर इस मंदिर की रौनक देखने लायक होती है।
विशेष तौर पर 'पौष दशमी' के पवित्र अवसर पर इस मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है। इस दिन देश के कोने-कोने से जैन धर्मावलंबि और पर्यटक उदयपुर पहुंचते हैं। पौष दशमी पर होने वाले विशेष धार्मिक आयोजनों, अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में भाग लेने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर रोशनी और मंत्रोच्चार से गूंज उठता है, जो एक अलौकिक समां बांध देता है।
आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों को थामे एक तीर्थ
आज के इस भौतिकवादी युग में जहां नई इमारतें कुछ ही सालों में पुरानी होकर खंडहर बन जाती हैं, वहीं उदयपुर का यह दो हजार साल पुराना जैन मंदिर हमें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है। यह मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति, कला, संयम और समर्पण का एक जीता-जागता दस्तावेज है। यदि आप इतिहास को करीब से महसूस करना चाहते हैं, प्राचीन शिल्पकला के कायल हैं या फिर मानसिक शांति की तलाश में हैं, तो उदयपुर का यह सवीना खेड़ा स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर आपकी यात्रा की सूची में जरूर होना चाहिए।