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अघोर चतुर्दशी पर गूंजा हरिश्चंद्र घाट: 300 साधकों ने किया योगिनी चक्र पूजन, मिला विशेष मुंडमाला

अघोर चतुर्दशी पर गूंजा हरिश्चंद्र घाट: 300 साधकों ने किया योगिनी चक्र पूजन, मिला विशेष मुंडमाला

काशी की धरती हमेशा से रहस्यों, आध्यात्मिक ऊर्जा और प्राचीन परंपराओं का केंद्र रही है। इसी आध्यात्मिक श्रृंखला में बुधवार को अघोर चतुर्दशी के पावन अवसर पर एक ऐसा अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसने एक बार फिर प्राचीन सनातन और अघोर साधना की गहराई से रूबरू कराया। वाराणसी के ऐतिहासिक हरिश्चंद्र घाट स्थित अघोर पीठ पर मध्यरात्रि से लेकर भोर तक एक अलौकिक और रहस्यमयी माहौल बना रहा। मौका था महान संत अवधूत बाबा कीनाराम की 427वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष आध्यात्मिक अनुष्ठान का।

मध्यरात्रि से भोर तक चला साधना का दौर

अघोर चतुर्दशी की रात आम इंसानों के लिए भले ही सामान्य रही हो, लेकिन हरिश्चंद्र घाट स्थित अघोर पीठ पर यह रात साधना, तपस्या और आत्मबोध की पराकाष्ठा थी। अवधूत उग्र चंडेश्वर कपाली बाबा के पावन सानिध्य में आयोजित इस दिव्य अनुष्ठान में देश के कोने-कोने से आए करीब 300 अघोर साधकों ने हिस्सा लिया। अनुशासन और पूरी निष्ठा के साथ किए गए इस अनुष्ठान की शुरुआत मध्यरात्रि में हुई जो बृहस्पतिवार की भोर तक अनवरत चलती रही।

इस दौरान पूरा घाट परिसर मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत था। साधकों ने विधि-विधान के साथ योगिनी शक्तियों का स्मरण किया और श्मशान पीठ का पूजन संपन्न किया। अघोर परंपरा में इस रात्रि का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि इसे ऊर्जा के संचय और साधना की सिद्धि के लिए सबसे उत्तम काल माना गया है।

श्मशान: भय का स्थान नहीं, आत्मचिंतन का केंद्र

आमतौर पर आम जनमानस में श्मशान का नाम सुनते ही भय, शोक और नकारात्मकता का अहसास होता है। लेकिन अघोर दर्शन इस सोच से बिल्कुल परे है। इस संबंध में प्रकाश डालते हुए अवधूत उग्र चंडेश्वर कपाली बाबा ने अघोर साधना के मूल दर्शन को बहुत ही सरल और गहरे शब्दों में समझाया।

उन्होंने बताया कि अघोर परंपरा में श्मशान को केवल अंतिम संस्कार की भूमि या अंत नहीं माना जाता, बल्कि यह आत्मचिंतन और उच्च कोटि की आध्यात्मिक साधना का सबसे बड़ा केंद्र है। श्मशान पीठ पूजन के माध्यम से साधक अपने भीतर के हर डर, जीवन की नश्वरता और मृत्यु के मूल बोध का सीधा सामना करते हैं। जब मनुष्य मृत्यु के भय से पार पा लेता है, तभी वह वास्तविक आत्मबोध की दिशा में आगे बढ़ पाता है। अघोर दर्शन का सार ही समत्व, असीम करुणा और समाज में फैले हर तरह के भेदभाव से ऊपर उठकर देखना है।

योगिनी चक्र पूजन का तांत्रिक और शाक्त महत्व

इस भव्य अनुष्ठान का एक मुख्य आकर्षण 'योगिनी चक्र पूजन' भी रहा, जो तांत्रिक और शाक्त साधना परंपरा का एक बेहद गोपनीय और शक्तिशाली अनुष्ठान माना जाता है। इस पूजन में साधकों ने योगिनी शक्तियों का आह्वान कर उनका स्मरण और पूजन किया।

अघोर और तांत्रिक साधना पद्धति में योगिनियों को मां शक्ति के विभिन्न स्वरूपों और असीम आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इन ऊर्जाओं को जाग्रत कर साधक अपने भीतर छिपी हुई आध्यात्मिक क्षमताओं को विस्तार देते हैं। भोर तक चले इस चक्र पूजन ने हरिश्चंद्र घाट के वातावरण को पूरी तरह से ऊर्जावान बना दिया था।

साधना के वर्ष पूरे होने पर मिले विशेष संस्कार: मुंडमाला दीक्षा और पूर्णाभिषेक

यह आयोजन केवल पूजन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि अघोर साधना के मार्ग पर वर्षों से कठोर तपस्या कर रहे साधकों के लिए यह संस्कारों का एक बड़ा पड़ाव भी साबित हुआ। अघोर परंपरा में समय और साधना की परिपक्वता के आधार पर विशेष दीक्षा दिए जाने का विधान है।

  • मुंडमाला दीक्षा: जिन साधकों ने अपनी कठिन अघोर साधना के 12 वर्ष सफलतापूर्वक पूरे कर लिए थे, उन्हें इस पावन अवसर पर मुंडमाला दीक्षा से अलंकृत किया गया।
  • पूर्णाभिषेक: वहीं, जिन समर्पित साधकों ने साधना पथ पर अपने 24 वर्ष का लंबा सफर पूरा कर लिया था, उनका भव्य और विधि-विधान के साथ पूर्णाभिषेक संपन्न हुआ।

इन संस्कारों को अघोर साधना की दीर्घावधि परंपरा में बेहद पवित्र और उच्च कोटि का मील का पत्थर माना जाता है।

काशी की प्राचीन और जीवंत परंपरा का प्रतीक

वाराणसी और हरिश्चंद्र घाट का नाता सदियों पुरानी साधना पद्धतियों से रहा है। आधुनिकता की दौड़ के बीच काशी आज भी अपनी उस प्राचीन आध्यात्मिक निरंतरता को सहेजे हुए है, जिसके दर्शन दुनिया भर के लोगों को अचंभित कर देते हैं। अवधूत बाबा कीनाराम की 427वीं जयंती पर हुआ यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि आज भी युवा और वरिष्ठ साधक प्राचीन अघोर परंपराओं को पूरी शुचिता और अनुशासन के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।

योगिनी चक्र पूजन, श्मशान पीठ का रहस्यमयी अनुष्ठान, मुंडमाला दीक्षा और पूर्णाभिषेक जैसे दुर्लभ संस्कारों के साथ अघोर चतुर्दशी का यह पर्व बृहस्पतिवार की भोर में सूर्योदय के साथ ही पूरी दिव्यता के साथ संपन्न हुआ। इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि काशी की गलियों और घाटों में आध्यात्मिक चेतना की वह धारा आज भी अनवरत बह रही है, जो इंसानी चेतना को साधारण से असाधारण बनाने की क्षमता रखती है।

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रोली सिंह

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Writer (स्थानीय खबरें)

रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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