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नौकरशाही से सियासत तक: दिव्या मित्तल के बाद अब इस दिग्गज अफसर की एंट्री, क्या बदल रहा है यूपी का ट्रेंड?

नौकरशाही से सियासत तक: दिव्या मित्तल के बाद अब इस दिग्गज अफसर की एंट्री, क्या बदल रहा है यूपी का ट्रेंड?

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीति का रिश्ता हमेशा से ही गहरा और दिलचस्प रहा है। फाइलें और कानून देखने वाले जब चुनावी अखाड़े में उतरते हैं, तो सियासी समीकरणों में हलचल होना लाजिमी है। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या देश के सबसे बड़े सूबे में पूर्व नौकरशाहों (Bureaucrats) का राजनीति की ओर रुख करना एक नया ट्रेंड बन रहा है? पूर्व सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव (M. Nageswara Rao) की राजनीति में धमाकेदार एंट्री और पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल (Divya Mittal) के इस्तीफे ने इस चर्चा को हवा दे दी है।

एम. नागेश्वर राव का राजनीति में कदम: वाराणसी से नई सियासी पारी

दशकों तक खाकी वर्दी और खुफिया जांच एजेंसियों की कमान संभालने वाले 1986 बैच के आईपीएस अधिकारी एम. नागेश्वर राव ने रिटायरमेंट के बाद अब राजनीति की पिच पर बैटिंग करने का फैसला किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक नगरी वाराणसी से अपनी नई राजनीतिक पार्टी 'सर्वजन सनातन पार्टी' का ऐलान कर दिया है।

लगभग चार दशक तक पुलिस सेवा में अपनी सेवाएं देने वाले राव की गिनती तेज-तर्रार अधिकारियों में होती रही है। ओडिशा कैडर के इस आईपीएस ने अपने करियर के दौरान कई बड़े कारनामे किए। तालचेर में कोयला तस्करी के खिलाफ उनकी सख्त कार्रवाई हो या फिर 1996 में जगतसिंहपुर के एक गंभीर मामले में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक का शुरुआती इस्तेमाल, वह हमेशा अपनी कार्यशैली के लिए चर्चा में रहे। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी प्रशासनिक पहचान 2013 में आए खतरनाक चक्रवात 'फाइलिन' और 'हुदहुद' के दौरान आपदा प्रबंधन के रूप में उभरी। उनके नेतृत्व में करीब 10 लाख लोगों की सुरक्षित निकासी की गई थी, जिसके लिए उन्हें ओडिशा सरकार का पहला लोक सेवा उत्कृष्टता पुरस्कार भी मिला था। बाद में उन्होंने सीबीआई के अंतरिम निदेशक की जिम्मेदारी भी संभाली।

हालांकि, उनका सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। सीबीआई के अंतरिम निदेशक पद पर रहते हुए मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से जुड़े एक विवाद के कारण उन्हें अदालत की अवमानना का सामना करना पड़ा था, जिस पर शीर्ष अदालत ने उन पर जुर्माना भी लगाया था। अब इन तमाम अनुभवों को पीछे छोड़ते हुए वह राजनीति के मैदान में अपनी नई किस्मत आजमाने उतरे हैं।

दिव्या मित्तल और वीआरएस (VRS) लेने वाले अधिकारियों का बढ़ता ग्राफ

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो राजनीति और प्रशासन के बीच की धुंधली होती रेखा साफ नजर आती है। साल 2017 से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश कैडर के 9 आईएएस अधिकारियों ने समय से पहले वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) लिया है, जबकि 4 अन्य अधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा दिया है। इस तरह कुल 13 वरिष्ठ अधिकारी तय समय से पहले प्रशासनिक सेवा से बाहर हो चुके हैं। इस सूची में आर.पी. सिंह, राजीव अग्रवाल, मोहम्मद मुस्तफा, आमोद कुमार, रेणुका कुमार, जूथिका पाटणकर, विकास गोठलवाल, रिग्जियान सैंफिल और अनामिका सिंह जैसे कई जाने-माने नाम शामिल हैं।

इस कड़ी में सबसे ताजा और चर्चित नाम पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल का है, जिन्होंने हाल ही में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर हर तरफ चौंका दिया था। हालांकि उन्होंने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह किसी मौजूदा राजनीतिक दल का दामन थामेंगी या खुद का कोई नया मंच बनाएंगी, लेकिन उनके इस्तीफे को लेकर सियासी गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। विपक्षी दलों का दावा है कि कार्यप्रणाली से असंतोष के चलते उन्होंने यह कदम उठाया, हालांकि अधिकारी की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक राजनीतिक टिप्पणी नहीं की गई है।

यही नहीं, पूर्व आईएएस राकेश वर्मा ने भी 22 साल की लंबी प्रशासनिक सेवा के बाद साल 2020 में वीआरएस लेकर कांग्रेस पार्टी का हाथ थाम लिया था। अब इन तमाम चेहरों के बाद एम. नागेश्वर राव की सक्रियता यह बताने के लिए काफी है कि प्रशासनिक पृष्ठभूमि के लोग अब सत्ता के गलियारों में केवल सलाह देने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि खुद फैसले लेने की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं।

क्या यह सरकारी नीतियों से असंतोष है या नई राजनीतिक महत्वाकांक्षा?

आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अचानक से नौकरशाहों का मोहभंग हो रहा है? क्या यह मोदी-योगी सरकारों के कार्यकाल से उपजा कोई अंदरूनी असंतोष है? जानकारों का मानना है कि इसके कई अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। हर अधिकारी के वीआरएस लेने या इस्तीफा देने के पीछे व्यक्तिगत कारण, सार्वजनिक जीवन में एक नई पारी खेलने की इच्छा या फिर सीधे तौर पर चुनावी राजनीति में उतरने की महत्वाकांक्षा हो सकती है। इसे सीधे तौर पर किसी सरकार के खिलाफ सामूहिक असंतोष मान लेना जल्दबाजी होगी, क्योंकि जब तक संबंधित अधिकारी खुद इस बात का खुलासा न करें, तब तक ऐसे कयासों को अंतिम सच नहीं माना जा सकता।

2027 के विधानसभा चुनावों से पहले गर्माएगा पारा

उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों की नजरें उन अनुभवी चेहरों पर टिकी हैं जो जमीन पर शासन, प्रशासन, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की मैदानी हकीकत को अच्छी तरह समझते हैं। प्रशासनिक अनुभव रखने वाले ये चेहरे जनता के बीच अपनी अलग पकड़ का दावा जरूर कर सकते हैं, लेकिन नौकरशाही की कागजी और मैदानी पकड़ को चुनावी मतों में तब्दील करना एक बेहद कठिन और अलग चुनौती होती है।

आने वाले महीनों में इन पूर्व नौकरशाहों के सियासी तेवर, उनके सार्वजनिक बयान और आगामी चुनावों में उनकी भूमिका ही यह तय करेगी कि यूपी की राजनीति में यह कोई स्थायी ट्रेंड बनने जा रहा है या महज एक चुनावी मौसम का बवंडर। फिलहाल, नागेश्वर राव और दिव्या मित्तल जैसे नाम सूबे की सियासत में नई चर्चाओं को जन्म जरूर दे रहे हैं।

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रोली सिंह

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रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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