अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले भारतीय प्रोफेशनल्स और छात्रों के लिए एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आई है। अमेरिकी सरकार ने एच-1बी (H-1B) वीजा के नियमों में एक और कड़ा बदलाव करते हुए 1,03,265 डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) की भारी-भरकम नई आवेदन फीस का प्रस्ताव रखा है। इस नए कदम से अमेरिका में कानूनी रूप से नौकरी पाने और बसने की उम्मीद लगाए बैठे हजारों भारतीय युवाओं के लिए राह बेहद कठिन हो सकती है।
क्या है पूरा मामला और क्यों लाया गया यह प्रस्ताव?
डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) की तरफ से जारी 67 पेज के ड्राफ्ट नोटिस के मुताबिक, यह नया शुल्क अमेरिकी कानूनी आव्रजन प्रणाली (Legal Immigration System) के प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए लाया गया है। खास बात यह है कि पिछले साल सितंबर 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जो 100,000 डॉलर की फीस घोषित की थी, उसे अमेरिकी अदालत ने इस साल जून में रोक दिया था। वह पुरानी फीस इसी 21 सितंबर को समाप्त होने वाली है।
अब इस नई व्यवस्था के तहत DHS ने स्पष्ट किया है कि यदि पुरानी कानूनी लड़ाई जारी रहती है और ट्रम्प की वह घोषणा भी बनी रहती है, तो दोनों फीस एक साथ (कौरेंटली) लागू हो सकती हैं। यानी कंपनियों और आवेदकों पर वित्तीय बोझ कई गुना बढ़ सकता है।
किसे चुकानी होगी यह फीस और कौन होगा बाहर?
यह नया नियम सभी एच-1बी वीजा आवेदनों पर लागू नहीं होगा, बल्कि यह मुख्य रूप से 'कैप-सब्जेक्ट' (Cap-Subject) आवेदनों पर ही लागू होगा।
- वार्षिक कोटा: अमेरिका हर साल वित्त वर्ष में 65,000 एच-1बी वीजा जारी करता है, जबकि एडवांस्ड डिग्री धारकों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीजा का कोटा होता है।
- किसे छूट मिलेगी: कैप-एक्EMPT (Cap-Exempt) श्रेणी, यानी गैर-लाभकारी संगठनों (Non-profit organizations) और विश्वविद्यालयों द्वारा प्रायोजित वीजा आवेदनों को इस अतिरिक्त फीस से बाहर रखा गया है।
- भारतीय छात्रों पर सीधा असर: पिछली बार जब 1,00,000 डॉलर की फीस आई थी, तो अमेरिका में ही पढ़ाई कर रहे और स्टूडेंट वीजा (F-1) से एच-1बी में स्टेटस बदलने वाले छात्रों को छूट दी गई थी। इससे अमेरिका में पढ़ रहे करीब 3.6 लाख भारतीय छात्रों को राहत मिली थी। लेकिन इस नए प्रस्ताव में ऐसी कोई राहत नहीं दी गई है। यह फाइलिंग चार्ज देश के भीतर या बाहर, हर जगह से आने वाले कैप-सब्जेक्ट आवेदनों पर अनिवार्य रूप से लागू होगा।
छोटे व्यवसायों और टेक फर्मों पर पड़ेगा भारी असर
इमिग्रेशन मामलों के जानकारों का मानना है कि इस भारी-भरकम फीस से केवल बड़े टेक दिग्गज ही नहीं, बल्कि छोटे और मध्यम आकार के नियोक्ता (Employers) बुरी तरह प्रभावित होंगे। मेनिफेस्ट लॉ के इमिग्रेशन स्ट्रेटजी प्रेसिडेंट जेफ जोसेफ ने कहा, "30 कर्मचारियों वाली कोई इंजीनियरिंग फर्म, क्षेत्रीय हेल्थकेयर एजेंसी या छोटा मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस, जो साल में एक या दो एच-1बी वर्कर्स को स्पॉन्सर करता है, उनके लिए यह सिर्फ एक लाइन-आइटम नहीं बल्कि स्पॉन्सरशिप पूरी तरह बंद करने का फैसला साबित होगा। यह नियम छोटे नियोक्ताओं को टैलेंट पाइपलाइन से बाहर कर देगा।"
क्या कहती है अमेरिकी सरकार और क्या हैं कानूनी चुनौतियाँ?
DHS का दावा है कि कैप-सब्जेक्ट एच-1बी आवेदक इस भारी फीस का भुगतान करने में सक्षम हैं। सरकार का अनुमान है कि इस नई व्यवस्था से 85,000 वीजा याचिकाओं से लगभग 8.8 बिलियन डॉलर (880 करोड़ डॉलर) का भारी राजस्व प्राप्त होगा, जिसे डिपार्टमेंट ऑफ लेबर, स्टेट डिपार्टमेंट, डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस और DHS के बीच बांटा जाएगा।
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फीस का वैधानिक आधार काफी संदिग्ध है। इस प्रस्ताव को मंगलवार को औपचारिक रूप से प्रकाशित किया जाएगा, जिसके बाद जनता की प्रतिक्रिया (Public Comment) के लिए 30 दिनों का समय दिया जाएगा। इसके बाद ही फाइनल नियम आएगा। जानकारों का मानना है कि जैसे ही यह नियम अंतिम रूप लेगा, व्यापारिक समूहों और राज्यों द्वारा इसे अदालतों में चुनौती दी जाएगी, क्योंकि यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार के पास इस पैमाने पर आव्रजन शुल्क तय करने का कोई ठोस वैधानिक अधिकार है या नहीं।
