अंतरराष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर एक बार फिर युद्ध के काले बादल मंडराने लगे हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने उस वक्त और अधिक खतरनाक मोड़ ले लिया जब अमेरिका द्वारा ईरान के ठिकानों पर एक बड़ी सैन्य स्ट्राइक को अंजाम दिया गया। इस घटना के बाद से ही वैश्विक कूटनीति में खलबली मच गई है और कच्चे तेल की कीमतों से लेकर शेयर बाजार तक, हर जगह अनिश्चितता का माहौल बन गया है। अमेरिका की इस आक्रामक कार्रवाई के जवाब में ईरानी हुकूमत ने भी कड़े तेवर अपनाते हुए वॉशिंगटन को खुली और दो टूक चेतावनी दे डाली है।
तेहरान का तीखा तेवर: 'ऐसा सबक देंगे जो जमाना याद रखेगा'
अमेरिकी एयर स्ट्राइक के ठीक बाद ईरान की राजधानी तेहरान से सर्वोच्च स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरानी सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक गलियारों से यह साफ कर दिया गया है कि वे इस हमले को चुपचाप सहन नहीं करेंगे। तेहरान के आधिकारिक बयानों में कहा गया है कि अमेरिका ने क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन किया है और इसका खामियाजा उसे भारी कीमत चुकाकर भुगतना होगा। ईरानी अधिकारियों ने अपनी आक्रामकता को जायज ठहराते हुए यहां तक कह दिया कि वे अमेरिका को ऐसा सबक सिखाएंगे जिसे आने वाला जमाना याद रखेगा।
इस बयान के बाद से ही मध्य पूर्व (Middle East) में अमेरिकी सैन्य अड्डों और परिसंपत्तियों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। खुफिया एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रख दिया गया है ताकि किसी भी संभावित आसन्न हमले या जवाबी कार्रवाई से निपटा जा सके।
मध्य पूर्व में गहराता संकट: आखिर क्यों भड़की आग?
वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच यह ताजा संघर्ष रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों के बीच परोक्ष युद्ध (Proxy War) और नौसैनिक झड़पें लगातार बढ़ रही थीं। क्षेत्र में बढ़ते तनाव, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और परमाणु वार्ताओं के बीच गतिरोध इस संघर्ष का मुख्य कारण रहा है।
- रणनीतिक महत्व के ठिकाने: अमेरिकी हमलों में मुख्य रूप से उन ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों द्वारा किया जा रहा था।
- समुद्री व्यापार पर असर: फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास बढ़ते तनाव ने वैश्विक नौवहन और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है।
- कूटनीतिक संवादहीनता: वर्तमान परिदृश्य में दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक चैनल लगभग बंद हो चुके हैं, जिससे किसी भी तरह की शांतिपूर्ण बातचीत की गुंजाइश फिलहाल बहुत कम नजर आ रही है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और बाजारों पर मंडराता खतरा
- जब भी अमेरिका और ईरान आमने-सामने आते हैं, उसका सीधा असर आम आदमी की जेब और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस ताजा सैन्य स्ट्राइक के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि यह संघर्ष और अधिक लंबा खिंचा या इसका दायरा बढ़ा, तो ईंधन के दाम आसमान छू सकते हैं, जिससे दुनिया भर में महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है।
- इसके अलावा, भारत जैसे विकासशील देशों के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है। पश्चिम एशिया में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और ऊर्जा आयात के मोर्चे पर देश की रणनीतिक स्वायत्तता दोनों ही चीजें इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल से सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं।
आगे क्या हो सकता है? विशेषज्ञों की राय
- अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि आने वाले कुछ दिन बेहद संवेदनशील रहने वाले हैं। एक तरफ जहां अमेरिका अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, वहीं ईरान अपनी साख बचाने के लिए बड़े पलटवार की योजना बना सकता है। हालांकि, अधिकांश रणनीतिकार इस बात की भी उम्मीद कर रहे हैं कि दोनों देश किसी पूर्ण युद्ध से बचना चाहेंगे, क्योंकि एक बड़ा युद्ध किसी के भी हित में नहीं है।
- संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य वैश्विक शक्तियां इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की जा रही है। लेकिन तेहरान के तीखे तेवर और वॉशिंगटन की आक्रामक नीतियों के बीच शांति की यह अपील कितनी असरदार साबित होगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान अपनी धमकी पर किस तरह अमल करता है और अमेरिका का अगला कदम क्या होगा।
