रक्षा और उन्नत तकनीक में आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम, मेरठ के गंगा एक्सप्रेसवे औद्योगिक क्षेत्र में लगेगी अत्याधुनिक रिफाइनरी
भारत जल्द ही रक्षा उपकरणों, विमानन सेवाओं और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) में इस्तेमाल होने वाले रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) यानी स्थायी चुंबक का देश के भीतर ही उत्पादन शुरू करेगा। इस रणनीतिक पहल के तहत देश में 6,000 मीट्रिक टन आरईपीएम तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसकी कुल आवश्यकता का 30 प्रतिशत कच्चा माल उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर से मिलेगा। भू-राजनीतिक अस्थिरता और चीन जैसे देशों पर आयात की निर्भरता कम करने के लिहाज से इस योजना को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मेरठ में स्थापित होगी रेयर अर्थ रिफाइनरी
इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए मेरठ के गगसोना गांव निवासी उद्यमी सईम रिजवी की कंपनी 'सर्कुलाजी क्लींटेक प्राइवेट लिमिटेड' आगे आई है। गंगा एक्सप्रेसवे के किनारे विकसित किए जा रहे औद्योगिक क्षेत्र में इस रिफाइनरी की स्थापना की जाएगी। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार के साथ 200 करोड़ रुपये के निवेश का एमओयू (समझौता ज्ञापन) हस्ताक्षर किया गया है। राज्य सरकार की ओर से इस कंपनी को जल्द ही 20 हजार वर्ग मीटर जमीन आवंटित की जाएगी। यह रिफाइनरी प्रतिवर्ष एक हजार मीट्रिक टन रेयर अर्थ और 10 हजार मीट्रिक टन क्रिटिकल मिनरल का उत्पादन करेगी।
चीन के दबदबे को तोड़ने की तैयारी
वर्तमान में वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और उन्नत तकनीकों में अग्रणी बनने की होड़ मची है। हालांकि, अधिकांश देशों के पास इसके निर्माण में काम आने वाले प्रमुख दुर्लभ तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। भारत को अपनी जरूरत का अधिकांश आरईपीएम आयात करना पड़ता है, जिस पर मुख्य रूप से चीन का एकाधिकार है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 53 हजार मीट्रिक टन रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट का आयात किया था। इस निर्भरता को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने देश में ही 6,000 मीट्रिक टन आरईपीएम का उत्पादन करने का लक्ष्य तय किया है।
एनडीपीआर ऑक्साइड की आपूर्ति
देश में तय लक्ष्य के मुताबिक 6,000 मीट्रिक टन आरईपीएम तैयार करने के लिए लगभग 2,000 मीट्रिक टन एनडीपीआर ऑक्साइड यानी नियोडिमियम और प्रैजियोडाइमियम की आवश्यकता होगी। इस पूरी मांग का 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले मेरठ में तैयार होने वाली रिफाइनरी से पूरा किया जाएगा, जो देश की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करेगा।
ई-वेस्ट से दुर्लभ खनिजों के निष्कर्षण का सफर
उद्यमी सईम रिजवी की यह उपलब्धि संघर्ष और शोध की एक अनूठी मिसाल है। मवाना के एएस इंटर कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालने के लिए उन्होंने अलीपुर जिजमाना में ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) का व्यवसाय शुरू किया था। काम के दौरान ई-वेस्ट के भीतर मौजूद विभिन्न तत्वों और रसायनों को लेकर उनकी जिज्ञासा बढ़ी, जिसके बाद उन्होंने इस विषय का गहन अध्ययन शुरू किया। बाद में ई-वेस्ट का व्यवसाय बंद कर उन्होंने अपनी बचत और जमीन बेचकर कंपनी पंजीकृत कराई। भारत सरकार के खान मंत्रालय के सहयोग से उन्होंने जमशेदपुर में एक रिसर्च लैब स्थापित की, जहां सफलता मिलने के बाद पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। अब व्यावसायिक उत्पादन के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के 'इन्वेस्ट यूपी' के माध्यम से निवेश का रास्ता साफ किया है।
ई-वेस्ट, बैटरियों और पुरानी मशीनों से निकलेंगे दुर्लभ तत्व
सर्कुलाजी क्लींटेक प्राइवेट लिमिटेड की यह रिफाइनरी ई-वेस्ट यानी उपयोग के बाद बेकार हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिज अलग करेगी। इसके अतिरिक्त, एमआरआई मशीनों, पवन ऊर्जा टर्बाइन, कंप्यूटर हार्ड ड्राइव और इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटरों में पहले से इस्तेमाल हो चुके पुराने आरईपीएम (स्थायी चुंबकों) से नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे अति-दुर्लभ रेयर अर्थ तत्वों को सुरक्षित रूप से निकाला जाएगा।