उत्तराखंड के रामनगर के पुछड़ी नई बस्ती में अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई से 133 परिवार बेघर हुए हैं, जिससे स्थानीय नेताओं के वोट बैंक पर असर पड़ सकता है।
उत्तराखंड के रामनगर स्थित पुछड़ी नई बस्ती में दो चरणों में चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद राजनीतिक और सामाजिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। इस कार्रवाई की वजह से कुल 133 परिवार बेघर हो चुके हैं, जिनके अन्यत्र विस्थापित होने से आगामी चुनावों में स्थानीय नेताओं के वोट बैंक पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
रामनगर के पुछड़ी गांव में जंगल की सरकारी और वन भूमि पर पिछले कई वर्षों से पक्के मकान बनाकर कब्जा किया गया था। प्रशासन द्वारा चलाए गए इस व्यापक अभियान के दौरान एक साथ 28 बुलडोजरों का इस्तेमाल किया गया, जिसके परिणामस्वरूप महज छह घंटे के भीतर वर्षों पुराना अतिक्रमण जमींदोज कर दिया गया। देखते ही देखते कल तक आबाद रहे आवासीय क्षेत्र मलबे के ढेर में तब्दील हो गए और चारों तरफ टूटे हुए भवनों के अवशेष ही नजर आए।
दो चरणों में हुई 133 परिवारों के आशियानों पर कार्रवाई
प्रशासन द्वारा पुछड़ी नई बस्ती में यह कार्रवाई दो अलग-अलग चरणों में पूरी की गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष चले पहले चरण के अभियान में 52 मकानों को तोड़ा गया था, जबकि हाल ही में शनिवार को हुई दूसरी बड़ी कार्रवाई के दौरान 81 और लोगों के मकान ध्वस्त किए गए। इस प्रकार कुल 133 परिवार इस कार्रवाई की चपेट में आकर बेघर हुए हैं। इन परिवारों के सामने अब अपने नए ठिकाने की तलाश करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
वोट समीकरणों पर पड़ेगा सीधा असर
अतिक्रमण हटाने के बाद इन परिवारों के रामनगर क्षेत्र से अन्य स्थानों पर विस्थापित होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय समीकरणों के जानकारों का मानना है कि इसका सीधा प्रभाव आगामी चुनावों में चुनाव लड़ने वाले नेताओं के पाले पर पड़ेगा। यदि प्रत्येक प्रभावित परिवार से औसतन चार मतदाता भी माने जाएं, तो कुल मिलाकर पांच सौ से अधिक मतों का यह अंतर किसी भी चुनाव के परिणामों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है। वोट बैंक के इस तरह बिखरने से स्थानीय जनप्रतिनिधियों और उम्मीदवारों के चुनावी समीकरण गड़बड़ा सकते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह और भूमि खरीद के कड़े नियम
इस पूरी घटना के बाद जमीन की खरीद-फरोख्त और दस्तावेजों की प्रामाणिकता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रामनगर के स्थानीय आर्किटेक्ट एमएस नेगी का कहना है कि किसी भी जमीन को खरीदने से पहले खरीदार को तहसील या संबंधित पटवारी के माध्यम से उसके सभी दस्तावेजों का पूरी तरह सत्यापन कराना चाहिए। जमीन बेचने वाले का भी यह दायित्व है कि वह खसरा नंबर, जमीन के वर्ग और उसके कानूनी स्टेटस की पूरी जानकारी साझा करे। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आम जनता को जागरूक करने के लिए तहसील या वन विभाग द्वारा बोर्ड लगाए जाने चाहिए ताकि लोगों को यह स्पष्ट रूप से पता चल सके कि किस क्षेत्र में जमीन की खरीद कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में सरकारी और वन भूमि की खरीद-फरोख्त से जुड़े मामलों में हाल ही में अन्य जगहों पर भी प्रशासनिक सख्ती देखने को मिली है, जहां एसआईटी जांच के आदेश दिए गए हैं। वहीं दूसरी ओर, इस प्रकार की अचानक की गई विध्वंस कार्रवाइयों से आम जनता की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। उदाहरण के तौर पर, रामनगर के इसी प्रभावित क्षेत्र में एक परिवार ऐसा भी सामने आया है जिनकी बेटी का विवाह अगले ही महीने होना है, लेकिन आशियाना टूटने के कारण उनकी सारी खुशियां गहरी चिंता में बदल गई हैं।