वाराणसी के जिला मुख्यालय पर बुधवार, 24 सितंबर 2026 को राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल उस वक्त तेज हो गई, जब आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर हुंकार भरी। देशव्यापी 'संपूर्ण भागीदारी आंदोलन' के तहत काशी में हुए इस प्रदर्शन ने प्रशासन को भी सतर्क कर दिया। सामाजिक न्याय, समान अवसर और वंचित तबकों की प्रशासनिक व राजनीतिक भागीदारी की मांग को लेकर कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया और अंत में देश के राष्ट्रपति के नाम संबोधित एक विस्तृत ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा।
आरक्षण को लेकर संविधान सम्मत अधिकारों की हुंकार
आंदोलन की अगुवाई कर रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं का साफ तौर पर कहना था कि भारतीय संविधान में आरक्षण की परिकल्पना केवल आर्थिक उत्थान के लिए नहीं, बल्कि सदियों पुराने सामाजिक भेदभाव, शैक्षणिक वंचना और व्यवस्था में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को पाटने के लिए की गई थी। ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया गया कि आज भी सरकारी और गैर-सरकारी तंत्र में वंचित वर्गों की वास्तविक हिस्सेदारी उनकी आबादी के अनुपात में बेहद कम है।
कार्यकर्ताओं ने मांग की कि देश भर के सभी सरकारी विभागों में आरक्षित वर्गों (SC, ST और OBC) के रिक्त पड़े पदों और बैकलॉग को युद्धस्तर पर भरा जाए। साथ ही, आरक्षण नीति का जमीनी स्तर पर कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि किसी भी स्तर पर कोटे के नियमों की अनदेखी न हो सके।
महिला आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर नए सिरे से मंथन
इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन के दौरान महिलाओं के अधिकारों और उनकी राजनीतिक भागीदारी को लेकर भी बेहद कड़े और स्पष्ट प्रस्ताव रखे गए। आंदोलनकारियों ने मांग की कि आने वाले समय में लागू होने वाले महिला आरक्षण में कुल कोटे का 50 प्रतिशत हिस्सा दलित, आदिवासी और पिछड़ी वर्ग की महिलाओं के लिए सुरक्षित किया जाए। इसके साथ ही:
- स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर त्रिस्तरीय पंचायतों तक में महिलाओं को 50 प्रतिशत की पक्की हिस्सेदारी दी जाए।
- देश की संसद यानी लोकसभा और राज्यसभा के साथ-साथ सभी राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषदों में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के लिए उनकी आबादी के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय किया जाए।
- निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्थाओं में वंचित समाज की आधी आबादी की सीधी आवाज पहुंचे।
जाति जनगणना और उच्च न्यायपालिका में सुधार की मांग
वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में जाति जनगणना का मुद्दा सबसे गरमाया हुआ है। वाराणसी के इस प्रदर्शन में भी यह प्रमुखता से गूंजा। ज्ञापन में पुरजोर मांग की गई कि आगामी जाति आधारित जनगणना में ओबीसी समाज के लिए एक अलग कॉलम जोड़ा जाए, ताकि उनकी सही और सटीक संख्या देश के सामने आ सके।
इसके साथ ही, देश की उच्च न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए। आंदोलनकारियों ने मांग की कि वर्तमान कॉलेजियम व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त किया जाए और इसकी जगह पर 'राष्ट्रीय उच्च न्यायिक आयोग' का गठन किया जाए। इस आयोग के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि न्यायपालिका में भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के काबिल लोगों को यथोचित प्रतिनिधित्व मिल सके।
ओबीसी क्रीमी लेयर और सरकारी सेवाओं में पदोन्नति का पेंच
प्रदर्शनकारियों ने केंद्र और राज्य सरकारों से ओबीसी वर्ग के लिए तय 'क्रीमी लेयर' की आय सीमा की मौजूदा समीक्षा करने की मांग उठाई, ताकि बढ़ती महंगाई और आर्थिक बदलावों के बीच वास्तविक पिछड़ों को इसका लाभ मिल सके। इसके अतिरिक्त, सरकारी सेवाओं में लंबे समय से लंबित पड़ी 'पदोन्नति (Promotion) में आरक्षण' की व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू करने की बात भी प्रमुखता से रखी गई।
शिक्षा, स्वास्थ्य और बजट में आनुपातिक हिस्सेदारी
शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय को मजबूत करने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़े समता संबंधी विनियमों (Equity Regulations) को कागजों से निकालकर धरातल पर कड़ाई से लागू करने को कहा गया। इसके अलावा, सरकारी योजनाओं और वार्षिक बजट आवंटन में देश की कुल आबादी के अनुपात के आधार पर बजट का हिस्सा वंचितों तक पहुंचाने की मांग की गई।
ज्ञापन में यह भी जोड़ा गया कि:
- अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC-ST Act) के मामलों में मिलने वाली मुआवजा राशि को बढ़ाकर सीधे 30 लाख रुपये किया जाए।
- सरकारी ठेकों, सार्वजनिक खरीद और बिजनेस टेंडरिंग में भी एससी, एसटी और ओबीसी उद्यमियों को निश्चित आरक्षण का लाभ दिया जाए।
- निजी क्षेत्र (Private Sector), मीडिया घरानों और देश की नीति-निर्धारण करने वाली तमाम संस्थाओं में वंचित वर्गों की भागीदारी कानूनी रूप से तय की जाए।
- मंडल आयोग (Mandal Commission) की बची हुई सभी सिफारिशों को उनके मूल रूप में पूर्ण रूप से लागू किया जाए।
सफाई कर्मचारियों के अधिकारों और सुरक्षा पर विशेष जोर
आंदोलन का एक बेहद संवेदनशील और मानवीय पहलू सफाई कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा हुआ था। ज्ञापन में इस बात पर गहरी नाराजगी जताई गई कि आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान इंसानों को जोखिम में डाला जाता है।
मांग की गई कि:
- सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई में मानवीय प्रवेश पर पूर्ण और सख्त प्रतिबंध लगाया जाए तथा इस कार्य में आधुनिक मशीनों का प्रयोग अनिवार्य हो।
- सफाई कर्मियों की आउटसोर्सिंग प्रथा को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर उन्हें स्थायी सरकारी नियुक्ति दी जाए।
- 'समान काम के लिए समान वेतन' के सिद्धांत को लागू करते हुए इन्हें पूरी सामाजिक सुरक्षा दी जाए।
- ड्यूटी के दौरान या सीवर सफाई में किसी सफाईकर्मी की असामयिक मृत्यु होने पर उनके परिवार को 30 लाख रुपये का आर्थिक मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और उचित पुनर्वास दिया जाए।
- पढ़ने वाले पात्र अल्पसंख्यक और वंचित छात्रों के लिए आधुनिक छात्रावासों का निर्माण कराया जाए और उन्हें नियमित रूप से समय पर छात्रवृत्ति (Scholarship) का भुगतान मिले।
वाराणसी में हुए इस प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में सामाजिक न्याय और आरक्षण के इन मुद्दों पर राजनीतिक सरगर्मी और तेज होने वाली है। जिला प्रशासन ने ज्ञापन को स्वीकार करते हुए इसे नियमानुसार उच्च स्तर तक पहुंचाने का आश्वासन दिया है, लेकिन आंदोलनकारियों ने दो टूक कह दिया है कि यदि उनकी इन जायज मांगों पर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप लेगा।