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सावन दूसरा सोमवार: 25 साल से शिवभक्तों की प्यास बुझा रहे हैं 'किशमिश गुरु'

सावन दूसरा सोमवार: 25 साल से शिवभक्तों की प्यास बुझा रहे हैं 'किशमिश गुरु'

धर्मनगरी काशी में सावन का महीना सिर्फ पूजा-पाठ का ही नहीं, बल्कि आत्मीय सेवा का भी महापर्व माना जाता है। इस पवित्र महीने में जब पूरा शहर शिवमय हो जाता है, तब कुछ ऐसे चेहरे भी सामने आते हैं जो अपनी निःस्वार्थ सेवा से इस पावन भूमि की महक को और बढ़ा देते हैं। ऐसे ही एक शख्सियत हैं लक्ष्मीकांत मिश्र, जिन्हें पूरी काशी प्यार से 'किशमिश गुरु' के नाम से जानती है।

25 साल का अटूट सफर और बाबा की भक्ति

साल 2002 में शुरू हुआ यह सफर आज एक मिसाल बन चुका है। पिछले 25 वर्षों से बाबा काशी विश्वनाथ के दरबार में आने वाले शिवभक्तों की सेवा करना किशमिश गुरु और उनके परिवार का एकमात्र ध्येय बन गया है। सावन के हर सोमवार को भक्तों की भीड़ को संभालना और उन्हें राहत देना उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य बन चुका है।

खास बात यह है कि इस बड़े धार्मिक और सामाजिक कार्य के लिए किसी से कोई चंदा नहीं लिया जाता। परिवार के सभी सदस्य पूरे साल अपनी मेहनत की कमाई से एक-एक पैसा जोड़ते हैं ताकि सावन के पवित्र दिनों में आने वाले शिवभक्तों की सेवा में कोई कमी न रह जाए।

सावन के दूसरे सोमवार को बांटी गई ठंडी लस्सी

हाल ही में संपन्न हुए सावन के दूसरे सोमवार को बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए रिकॉर्ड तोड़ श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। भीषण गर्मी और उमस के बीच घंटों लंबी कतारों में खड़े भक्तों को राहत देने के लिए किशमिश गुरु और उनकी टीम ने मोर्चा संभाला।

  • लाखों शिवभक्तों के बीच ठंडी और ऊर्जावान लस्सी का वितरण किया गया।
  • लस्सी के साथ-साथ विशेष प्रसाद और फलाहार की भी व्यवस्था की गई।
  • बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को विशेष प्राथमिकता के साथ राहत पहुंचाई गई।
"बाबा विश्वनाथ के भक्तों की सेवा करना मेरे लिए कोई आयोजन मात्र नहीं है, बल्कि यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी साधना है। मेरी यही इच्छा है कि काशी आने वाला हर शिवभक्त यहां से अपनापन और सुखद अनुभव लेकर लौटे।" - किशमिश गुरु (लक्ष्मीकांत मिश्र)

काशी के दिग्गजों ने भी बढ़ाई हौसला अफजाई

इस महान सेवा कार्य में शहर के कई गणमान्य लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। सावन के इस विशेष आयोजन के दौरान वाराणसी के महापौर अशोक तिवारी, पूर्व मंत्री मनोज राय धूपचंडी, राकेश जैन, लालू यादव, सुनील त्रिपाठी, और बृजेश कपूर समेत तमाम सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग मौजूद रहे और व्यवस्था को संभालने में अपना योगदान दिया।

काशी की संस्कृति की असली पहचान

अतिथि देवो भवः और 'काशी की सेवा परंपरा' को जीवित रखने में ऐसे लोगों का बहुत बड़ा योगदान है। 25 सालों से बिना रुके, बिना थके चल रहा यह कारवां आज हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो समाज के लिए कुछ करना चाहता है। सावन के इन पावन दिनों में किशमिश गुरु का शिविर भक्तों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होता।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: 'किशमिश गुरु' कौन हैं?

Ans: लक्ष्मीकांत मिश्र जी को 'किशमिश गुरु' के नाम से जाना जाता है, जो पिछले 25 वर्षों से वाराणसी में सावन के दौरान शिवभक्तों को प्रसाद और लस्सी बांटने की सेवा कर रहे हैं।

Q2: यह सेवा कब शुरू हुई थी?

Ans: यह सेवा कार्य वर्ष 2002 में शुरू किया गया था और तब से यह लगातार हर साल सावन में जारी है।

Q3: इस सेवा कार्य के लिए फंड कहां से आता है?

Ans: किशमिश गुरु और उनके परिवार के सदस्य अपनी निजी कमाई से पैसे बचाकर इस सेवा का पूरा खर्च उठाते हैं।

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काव्या त्रिपाठी

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Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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