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पीएम मोदी के खिलाफ अमर्यादित भाषा पर अधिवक्ताओं का फूटा गुस्सा, बड़ी मांग

पीएम मोदी के खिलाफ अमर्यादित भाषा पर अधिवक्ताओं का फूटा गुस्सा, बड़ी मांग

देश की राजनीति में इन दिनों बयानों के तीर लगातार तीखे होते जा रहे हैं, लेकिन अब इस पर न्याय के रखवालों यानी अधिवक्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार इस्तेमाल हो रही अमर्यादित भाषा और सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे दुष्प्रचार को लेकर लीगल फ्रेटरनिटी में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। वकीलों का साफ कहना है कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार करने वालों पर अब कानूनी शिकंजा कसना बेहद जरूरी हो गया है।

क्यों भड़के हैं देश के वकील?हाल के दिनों में राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया है, उसने राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ बौद्धिक वर्ग को भी झकझोर कर रख दिया है। अधिवक्ताओं का तर्क है कि विरोध की आड़ में व्यक्तिगत हमले और अपमानजनक टिप्पणियां न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हैं, बल्कि यह देश की संवैधानिक संस्थाओं का भी अनादर करती हैं।

एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "विरोध करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन असहमति और गाली-गलौज के बीच की बारीक रेखा को मिटाया जा रहा है। इसे चुपचाप सहन नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक खतरनाक परंपरा को बढ़ावा दे रहा है।"

अधिवक्ता संघों की मुख्य मांगें:

  • कड़े कानून का पालन: मानहानि और नफरत भरे भाषणों (Hate Speech) के मामलों में मौजूदा कानूनों को और अधिक सख्त बनाया जाए।
  • सोशल मीडिया पर निगरानी: भ्रामक दुष्प्रचार और फेक न्यूज फैलाने वाले एल्गोरिदम और अकाउंट्स पर तुरंत रोक लगे।
  • त्वरित कानूनी कार्रवाई: संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने वालों पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया जाए।

सोच-समझकर हो राजनीति या फिर तय हो जवाबदेही?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का आक्रोश इस बात का संकेत है कि समाज का एक बड़ा वर्ग अब राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर से आजिज़ आ चुका है। चुनावों का मौसम हो या सामान्य दिन, वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन व्यक्तिगत और अमर्यादित टिप्पणियां भारतीय राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रही हैं।

आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विभिन्न बार काउंसिल्स और लीगल संगठनों द्वारा एक बड़ा ज्ञापन राष्ट्रपति या संबंधित प्राधिकारियों को सौंपे जाने की संभावना है। वकीलों की यह चेतावनी स्पष्ट करती है कि यदि साइबर स्पेस और सार्वजनिक मंचों पर अनुशासनहीनता पर लगाम नहीं लगी, तो यह मामला देश की अदालतों तक भी बड़े पैमाने पर पहुंच सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: अधिवक्ताओं ने किस बात पर आपत्ति जताई है?

उत्तर: अधिवक्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही अमर्यादित भाषा और फैलाए जा रहे दुष्प्रचार पर कड़ी आपत्ति जताई है।

Q2: इस मामले में वकीलों की मुख्य मांग क्या है?

उत्तर: उनकी मांग है कि संवैधानिक पदों की गरिमा बनाए रखने के लिए अभद्र टिप्पणियां करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और एक मजबूत मिसाल कायम हो।

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काव्या त्रिपाठी

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Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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