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प्रथम विश्व युद्ध की मशहूर डांसर माता हारी, जिन्हें जासूसी के आरोप में दी गई थी फांसी

प्रथम विश्व युद्ध की मशहूर डांसर माता हारी, जिन्हें जासूसी के आरोप में दी गई थी फांसी

नीदरलैंड में जन्मीं मार्गेटे जेले से लेकर पेरिस की मशहूर डांसर और प्रथम विश्व युद्ध की संदेहास्पद महिला जासूस 'माता हारी' के जीवन का अंत 15 अक्टूबर 1917 को फ्रांस में फायरिंग स्क्वॉड के सामने हुआ था।

प्रथम विश्व युद्ध के दौर में यूरोप की प्रतिष्ठित नृत्यांगना माता हारी की खूबसूरती और कला के दीवाने दोनों पक्षों में थे। फ्रांस में उनके शो हाउसफुल रहते थे, वहीं युद्धकाल में वह उन चुनिंदा लोगों में थीं जो जर्मनी में बिना किसी बड़ी रोक-टोक के आ-जा सकती थीं। उनकी यही असीमित आवाजाही और प्रभाव अंततः उनके पतन का कारण बना और उन्हें डबल एजेंट के रूप में पेश करते हुए मौत के घाट उतार दिया गया।

भारतीय नृत्य कला से जुड़ाव और जीवन का शुरुआती सफर

माता हारी का जन्म 1876 में नीदरलैंड में हुआ था और उनका मूल नाम मार्गेटे जेले था। उनके पिता एक व्यापारी थे, जिन्हें बाद में वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ा। महज 18 वर्ष की आयु में उनका विवाह डच सेना के एक अधिकारी से हुआ, जिसके बाद वह डच ईस्ट इंडीज (वर्तमान इंडोनेशिया) चली गईं। वहां उनके दो बच्चे हुए, जिनमें से पहले बच्चे की जन्म के तुरंत बाद मृत्यु हो गई। पति-पत्नी के संबंधों में लगातार खटास आने के बाद 1907 में उनका आधिकारिक रूप से तलाक हो गया।

इंडोनेशिया में अपने कठिन और तनावपूर्ण दिनों से उबरने के लिए उन्होंने नृत्य सीखना शुरू किया, जहां उनकी रुचि विशेष रूप से भारतीय नृत्य शैलियों में बढ़ी। इसी दौरान उन्होंने अपना नाम बदलकर 'माता हारी' रख लिया, जिसका मलय भाषा में अर्थ 'सूर्य' होता है।

पेरिस में लोकप्रियता और प्रभावशाली संपर्क

इंडोनेशिया से लौटने के बाद माता हारी पेरिस पहुंचीं और नृत्य की दुनिया में अपनी अनूठी पहचान बनाई। उनके प्रदर्शन का तरीका उस समय के लिहाज से काफी अलग था, जिसमें वह मंच पर धीरे-धीरे अपने वस्त्र उतारती थीं। इस शैली के कारण उनके कार्यक्रम अत्यधिक चर्चित हुए।

उनकी प्रसिद्धि पेरिस से फैलकर पूरे यूरोप में पहुंच गई। उनके कार्यक्रमों में सैन्य अधिकारी, राजनयिक और बड़े कारोबारी शिरकत करते थे। यही रसूखदार संपर्क और पहचान उनके जीवन के आगामी दौर में एक बड़ा मोड़ साबित हुए।

प्रथम विश्व युद्ध और जासूसी के गंभीर आरोप

जब पहला विश्व युद्ध आरंभ हुआ, तब तक माता हारी यूरोप की एक स्थापित कलाकार बन चुकी थीं। कई देशों के सैन्य अधिकारियों से उनके गहरे संपर्क थे, जिसके चलते उन पर खुफिया सूचनाएं जुटाकर दूसरे देशों तक पहुँचाने के आरोप लगने लगे।

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, फ्रांस की ओर से भी उन्हें जासूसी के कार्यों में इस्तेमाल करने का प्रयास किया गया था। हालांकि, इतिहासकारों के बीच इस बात को लेकर हमेशा मतभेद रहे हैं कि उनकी जासूसी गतिविधियां वास्तव में कितनी सक्रिय थीं। उन पर सबसे बड़ा आरोप यह था कि वह फ्रांसीसी खुफिया तंत्र के लिए काम करने के साथ-साथ जर्मनी को भी गोपनीय सूचनाएं लीक कर रही थीं, जिससे उन्हें एक डबल एजेंट के रूप में देखा गया।

कोड नाम 'एच 21' और गिरफ्तारी

वर्ष 1917 में फ्रांसीसी अधिकारियों ने पेरिस के एक लग्जरी होटल से माता हारी को हिरासत में लिया। अधिकारियों का दावा था कि बर्लिन भेजे गए एक संदेश में 'एच 21' कोड का इस्तेमाल किया गया था, जिसका संबंध माता हारी से था।

करीब पांच महीने चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद उन्हें दोषी करार दिया गया। फ्रांसीसी सैन्य अदालत में आरोप लगाया गया कि उनकी जासूसी के कारण करीब 50 हजार सैनिकों की जान गई। हालांकि, आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि इस दावे के समर्थन में कभी कोई पुख्ता और ठोस सबूत सामने नहीं आ सके।

बलि का बकरा बनाए जाने की थ्योरी

प्रथम विश्व युद्ध के उस दौर में फ्रांस की सेना गंभीर संकट से जूझ रही थी। लगातार मोर्चों पर नुकसान के कारण सैनिकों का मनोबल गिर रहा था और कई जगहों पर विद्रोह के स्वर भी उठने लगे थे। ऐसी विकट परिस्थितियों में सरकार और सैन्य नेतृत्व पर आंतरिक गड़बड़ियों और जासूसी के मामलों में कड़ी कार्रवाई करने का भारी दबाव था।

कई इतिहासकार मानते हैं कि माता हारी को उस वक्त की राजनीतिक और सैन्य जरूरतों के चलते बलि का बकरा बनाया गया। उनके खिलाफ उपलब्ध कानूनी सबूत काफी कमजोर थे, लेकिन उनकी विदेशी पहचान, ख्याति और उच्चस्तरीय संपर्क ने उन्हें संदेह के दायरे में सबसे आगे ला खड़ा किया।

फांसी और मौत का वह अंतिम पल

15 अक्टूबर 1917 को 41 वर्ष की आयु में फ्रांस में उन्हें फायरिंग स्क्वॉड के जरिए गोली से उड़ाने की सजा दी गई। तय नियमों के अनुसार उनके हाथ खंभे से बांधे जाने थे, लेकिन उन्होंने केवल एक हाथ बंधवाया और दूसरे हाथ से अपने वकील को विदाई दी।

जेलर के कहने पर जब संतरी पट्टी बांधने आगे बढ़ा, तो उन्होंने उससे साफ इंकार कर दिया। मौत सामने होने के बावजूद उन्होंने रोने या घबराने के बजाय मुस्कुराना चुना और फायरिंग की गूंज से ठीक पहले हवा में एक फ्लाइंग किस उछालते हुए हमेशा के लिए शांत हो गईं। उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को कोई लेने नहीं आया, जिसके बाद उसे मेडिकल अध्ययन के लिए भेज दिया गया था।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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