वैश्विक मंचों पर जब भी नेपाल की बात होती है, तो अक्सर इसे दो बड़े दिग्गजों के बीच घिरा हुआ एक छोटा सा पर्वतीय देश मान लिया जाता है। लेकिन, अब इस पुरानी सोच को बदलने की पुरजोर मांग उठने लगी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों से इतर न्यूयॉर्क में आयोजित एक उच्चस्तरीय कार्यक्रम के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने अपनी कूटनीति और दृष्टिकोण से सबका ध्यान खींच लिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नेपाल को अब केवल अपनी सीमाओं या क्षेत्रफल के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एशिया के एक प्रमुख आर्थिक, डिजिटल और रणनीतिक 'ब्रिज' (सेतु) के रूप में स्थापित करने का समय आ गया है।
एशियाई सदी और नेपाल की बदलती भूमिका
एशिया सोसाइटी द्वारा आयोजित ‘स्टियरिंग नेपाल्स फ्यूचर इन एशियाज राइजिंग सेंचुरी’ विषयक कार्यक्रम में बोलते हुए शिशिर खनाल ने एक नया वैचारिक दृष्टिकोण सामने रखा। आज के दौर में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया बनता जा रहा है, और दुनिया की करीब 60 प्रतिशत आबादी इसी महाद्वीप में निवास करती है, तब नेपाल की भौगोलिक स्थिति किसी अभिशाप की तरह नहीं, बल्कि एक सुनहरे अवसर की तरह देखी जानी चाहिए।
विदेश मंत्री ने कहा कि आकार के आधार पर खुद को छोटा समझना बंद करना होगा। भूगोल की अपनी वास्तविकताएं होती हैं, खासकर जब आपके पड़ोसी देश आकार में बहुत बड़े हों, लेकिन यह स्थिति किसी भी देश की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की सीमा तय नहीं कर सकती। खनाल के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है, जहां भारत और चीन जैसे विशाल पड़ोसियों के बीच नेपाल की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है।
'हिमालयन सुनामी' और जलवायु परिवर्तन की चुनौती
किसी भी देश की रणनीतिक प्राथमिकताएं तय करने में वहां की जमीनी और प्राकृतिक परिस्थितियां बहुत बड़ा रोल निभाती हैं। विदेश मंत्री ने हाल ही में देश में आई विनाशकारी बाढ़ का जिक्र करते हुए इसे बेहद आक्रामक रूप में 'हिमालयन सुनामी' की संज्ञा दी। उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि नेपाल लंबे समय से कठिन भौगोलिक बनावट, प्राकृतिक आपदाओं और संरचनात्मक चुनौतियों से जूझता रहा है।
लेकिन इन चुनौतियों से घबराने के बजाय, इसे राष्ट्रीय नीतियों में बदलाव का आधार बनाया जा रहा है। खनाल ने जोर देकर कहा कि अब जलवायु परिवर्तन को नेपाल की विदेश नीति की प्राथमिक सूची में सबसे ऊपर रखना होगा। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं पर तुरंत और ठोस काम करने की बात कही:
- देश में और अधिक प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) विकसित करना।
- पड़ोसी देशों के साथ मौसम और जल संबंधी सटीक आंकड़ों का नियमित आदान-प्रदान।
- पूर्वानुमान योग्य और अनुदान आधारित जलवायु वित्त (Climate Finance) की व्यवस्था।
- क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यावहारिक तथा मजबूत सहयोग।
पुराने इतिहास से सीख और वर्तमान की कूटनीति
नेपाल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों की बात करते हुए उन्होंने गौतम बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी के साथ-साथ ऐतिहासिक हस्तियों जैसे अरनिको और भृकुटी का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि इतिहास गवाह है कि नेपाल हमेशा से एशियाई संस्कृतियों के बीच एक जीवंत संपर्क स्थल रहा है।
संपर्क हमेशा समृद्धि पैदा करता है, जबकि अलगाव केवल गरीबी को बढ़ावा देता है।
यह संदेश आज के वैश्वीकृत युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। अब तक यह सवाल पूछा जाता था कि दो महाशक्तियों के बीच नेपाल अपनी सुरक्षा कैसे बचाएगा? लेकिन खनाल ने इस सवाल का दायरा बदलकर एक नया आयाम दिया। उनका कहना था कि अब सवाल यह होना चाहिए कि नेपाल इन दोनों देशों के बीच और उनसे भी आगे बढ़कर किस तरह से अधिक से अधिक 'आर्थिक मूल्य' (Economic Value) पैदा कर सकता है।
जलविद्युत और ट्रांस-हिमालयी कनेक्टिविटी का विजन
आर्थिक समृद्धि के रास्ते में ऊर्जा और बुनियादी ढांचा (Infrastructure) रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं। नेपाल के पास जलविद्युत (Hydropower) की अपार क्षमता है, जिसे अब क्षेत्रीय एकीकरण से जोड़ा जा रहा है। वर्तमान में नेपाल की स्वच्छ ऊर्जा भारत के रास्ते होते हुए बांग्लादेश तक पहुंचाई जा रही है, जो क्षेत्रीय सहयोग का एक बेहतरीन उदाहरण है।
इसके अलावा, सीमावर्ती विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) में उत्पादन को बढ़ावा देकर वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ने की दिशा में भी काम चल रहा है। चीन के साथ संबंधों पर बात करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि बीजिंग के साथ सहयोग पूरी तरह से व्यावहारिक, व्यावसायिक और दीर्घकालिक होना चाहिए। इसके तहत सड़कों, सुरंगों, ड्राई पोर्ट्स, आधुनिक हवाई सेवाओं, डिजिटल नेटवर्क और सीमा-पार रेल परियोजनाओं के जरिए एक बहुआयामी ट्रांस-हिमालयी कनेक्टिविटी नेटवर्क तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए खुला आमंत्रण
लेख के अंत में विदेश मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि देश के भविष्य का फैसला खुद नेपाल की जनता को करना है, लेकिन इस सफर में वैश्विक साझेदारों की भूमिका भी बेहद अहम है। उन्होंने अमेरिका, यूरोपीय देशों, आसियान देशों, लैटिन अमेरिका और अन्य वैश्विक साझीदारों को नेपाल की विकास यात्रा में निवेश करने और रणनीतिक साझेदारी निभाने के लिए आमंत्रित किया।
यह पूरा घटनाक्रम संकेत देता है कि नेपाल अब पारंपरिक पिछवाड़े की कूटनीति से बाहर निकलकर एशिया के दिल में एक मजबूत, आत्मनिर्भर और डिजिटल रूप से जुड़े हुए 'ब्रिज' के रूप में अपनी नई पहचान गढ़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।