उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर से गर्माहट देखने को मिल रही है। विपक्षी गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, इसके संकेत लगातार मिलने लगे हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के हालिया रायबरेली दौरे के बाद कांग्रेस खेमे में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। स्थिति यह है कि कांग्रेस नेताओं के तेवर अब पूरी तरह से तल्ख हो चुके हैं और उन्होंने दो टूक कह दिया है कि अगर ऐसा ही रवैया रहा, तो वे भी पीछे नहीं हटेंगे और जल्द ही कन्नौज तथा इटावा का रुख करेंगे।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब दोनों दल आगामी राजनीतिक रणनीतियों को साधने में जुटे हैं। जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की होड़ में अब गठबंधन के साथी ही एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। आइए जानते हैं कि आखिर इस पूरे विवाद के पीछे की असल वजह क्या है और क्यों कांग्रेस खेमा इस दौरे से इतना आहत और गुस्से में है।
अखिलेश के रायबरेली दौरे ने बढ़ाई खटास
राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं जोरों पर हैं कि समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का रायबरेली दौरा कांग्रेस को नागवार गुजरा है। रायबरेली को पारंपरिक रूप से कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, और ऐसे में वहां सपा की सक्रियता को कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व ने अपने राजनीतिक स्पेस में सेंधमारी के रूप में देखा है।
सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर भारी रोष है कि बिना किसी आपसी समन्वय के सपा नेतृत्व ने उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में दखل देना शुरू कर दिया है। इसी नाराजगी का इजहार करते हुए कांग्रेस के कई नेताओं ने खुलकर बयानबाजी शुरू कर दी है, जिससे राज्य का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है।
'हम भी जाएंगे कन्नौज और इटावा'- कांग्रेस की दो टूक
सपा के इस कदम से आगबबूला हुई कांग्रेस ने अब जवाबी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। पार्टी के भीतर से यह आवाज तेजी से उठ रही है कि यदि समाजवादी पार्टी उनके गढ़ में दखल दे सकती है, तो कांग्रेस भी चुप नहीं बैठेगी।
- रणनीतिक पलटवार: कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वे भी जल्द ही सपा के मजबूत गढ़ माने जाने वाले जिलों जैसे कि कन्नौज और इटावा का दौरा करेंगे।
- कार्यकर्ताओं में जोश: इस प्रतिक्रिया के जरिए कांग्रेस अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि पार्टी किसी भी स्थिति में अपना राजनीतिक दायरा कम नहीं होने देगी।
- गठबंधन पर सवाल: विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयानों और दौरों से भले ही ऊपर से सब ठीक दिखाने की कोशिश हो, लेकिन अंदरखाने गठबंधन की डोर कमजोर हो रही है।
कन्नौज और इटावा उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के लिए बेहद संवेदनशील और प्रतिष्ठा की सीटें व क्षेत्र माने जाते हैं। इन इलाकों में सपा का पुराना और मजबूत जनाधार रहा है। ऐसे में यदि कांग्रेस वहां अपनी सक्रियता बढ़ाती है, तो यह सीधे तौर पर दोनों दलों के बीच का शीत युद्ध और गहरा कर देगा।
जमीनी हकीकत और राजनीतिक नफा-नुकसान
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की बयानबाजी और खींचतान का सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिल सकता है। जब विपक्षी दल आपस में ही एक-दूसरे की घेराबंदी करने में जुट जाते हैं, तो मुख्य मुद्दों से ध्यान भटक जाता है।
एक तरफ जहां देश और प्रदेश में जनता से जुड़े कई गंभीर मुद्दे हैं, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और बढ़ाने की उधेड़बुन में लगे हैं। रायबरेली और कन्नौज-इटावा की यह राजनीतिक जंग इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन के भीतर आपसी अविश्वास अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सीटों के बंटवारे और भविष्य की रणनीतियों को लेकर अंदर ही अंदर जो सुगबुगाहट थी, वह अब सतह पर साफ दिखाई देने लगी है।
आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सपा और कांग्रेस के आलाकमान इस बढ़ते तनाव को समय रहते थाम पाते हैं या फिर यह तनातनी और अधिक विकराल रूप धारण करती है। फिलहाल, कांग्रेस के आक्रामक तेवर और कन्नौज-इटावा जाने की चेतावनी ने उत्तर प्रदेश की सियासत में नए समीकरणों की चर्चाओं को हवा जरूर दे दी है।