लखनऊ में AIMIM प्रमुख ने चुनाव आयोग की साख, मुख्य चुनाव आयुक्त की कानूनी सुरक्षा और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर उठाए गंभीर सवाल
देश की राजनीति में चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की कानूनी सुरक्षा और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने विपक्षी गठबंधन 'INDIA' ब्लॉक के विरोध प्रदर्शन से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है। हालांकि, उन्होंने नागरिकों के विरोध प्रदर्शन करने के संवैधानिक अधिकार का समर्थन किया है, लेकिन साथ ही न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच अधिकारों की लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।
INDIA ब्लॉक के प्रदर्शन से दूरी और शक्तियों के अलगाव पर बात
लखनऊ में मीडिया से बात करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने स्पष्ट किया कि हर भारतीय नागरिक को विरोध जताने का लोकतांत्रिक अधिकार है और देश की सर्वोच्च अदालत भी इसे मान्यता देती है। इसके साथ ही उन्होंने दो टूक कहा कि उनकी पार्टी का 'INDIA' ब्लॉक से कोई संबंध नहीं है, इसलिए वे विपक्ष के इस प्रदर्शन पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।
ओवैसी ने विपक्षी सांसदों द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से मुलाकात करने के कदम पर भी सवाल खड़े किए। उनके अनुसार, सांसद विधायिका का हिस्सा होते हैं और संविधान के तहत विभिन्न संस्थाओं के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन तय किया गया है। उन्होंने इसके समर्थन में अतीत का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि जब 'वन नेशन, वन इलेक्शन' यानी एक देश, एक चुनाव के मुद्दे पर संसद की स्थायी समिति ने सुप्रीम कोर्ट के जजों से मिलने का प्रयास किया था, तब भी शक्तियों के अलगाव के सिद्धांत को लेकर तीखे सवाल उठे थे।
मुख्य चुनाव आयुक्त कानून और कानूनी सुरक्षा पर चिंता
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के हालिया मामले और चयन प्रक्रिया का जिक्र करते हुए ओवैसी ने कहा कि जब संसद में इस से जुड़ा नया कानून लाया गया था, तभी उन्होंने इस पर अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। उनका मानना है कि सेवानिवृत्ति या पद छोड़ने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को कानूनी सुरक्षा प्रदान किया जाना चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की साख और विश्वसनीयता को गंभीर चोट पहुंचा सकता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने मांग की कि इस विवादास्पद कानून पर पुनर्विचार करते हुए इसे समाप्त किया जाना चाहिए। ओवैसी ने सुझाव दिया कि भविष्य में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाना चाहिए, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनकी राजनीतिक सलाह है और फिलहाल मौजूदा कानून में ऐसा कोई बदलाव नहीं हुआ है।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और फॉर्म-6 पर सवाल
चुनावी प्रक्रिया के एक अन्य अहम पहलू पर बोलते हुए ओवैसी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) और फॉर्म-6 के प्रावधानों पर भी कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने दावा किया कि इस गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान लगभग 10 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। साथ ही, नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले फॉर्म-6 में मैपिंग जैसी जटिल शर्तें जोड़ दी गई हैं।
ज्ञात हो कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का मूल उद्देश्य सूची को पूरी तरह अद्यतन करना होता है ताकि केवल पात्र और सही मतदाता ही उसमें शामिल रह सकें। इसके बावजूद, ओवैसी का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जानी चाहिए, नागरिकों को इसकी पूर्व सूचना मिलनी चाहिए और आपत्ति दर्ज कराने का उचित अवसर मिलना ही लोकतंत्र की असल पहचान है। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 का कानूनी रूप से इस्तेमाल किया जाता है।
असदुद्दीन ओवैसी के इन ताजा बयानों के बाद एक बार फिर देश की चुनावी प्रक्रिया, मतदाताओं के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस पर राजनीतिक दलों और चुनाव प्रशासन की ओर से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है।