मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से एक बेहद झकझोर देने वाली और गंभीर खबर सामने आई है। यहाँ संक्रामक बीमारियों के प्रकोप के चलते पिछले कुछ समय में 30 से अधिक मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है। इस दर्दनाक घटना ने पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। अब इस मामले पर देश की न्यायपालिका ने स्वतः संज्ञान लेते हुए बेहद कड़ा रुख अपनाया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस भीषण लापरवाही पर गहरी नाराजगी जताई है और राज्य सरकार के तमाम जिम्मेदार अधिकारियों को आधिकारिक नोटिस जारी कर तलब किया है।
स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर उठे गंभीर सवाल
ग्रामीण अंचलों और आदिवासी बहुल इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। बालाघाट में हुई इन मौतों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य महकमा किस हद तक लापरवाह बना हुआ है। जब एक के बाद एक बच्चों की जान जाने लगी, तब जाकर प्रशासनिक मशीनरी की नींद टूटी। स्थानीय लोगों और परिजनों का आरोप है कि समय पर इलाज और बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं मिल जातीं, तो शायद इन नौनिहालों की जान बचाई जा सकती थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि बरसात और मौसम में बदलाव के दौरान फैलने वाली संक्रामक बीमारियां यदि शुरुआती दौर में ही काबू में न लाई जाएं, तो वे महामारी का रूप ले लेती हैं। बालाघाट में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
हाई कोर्ट की सख्ती: अधिकारियों को नोटिस जारी
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस पर सख्त संज्ञान लिया है। अदालत ने राज्य के प्रमुख स्वास्थ्य सचिव, जिला कलेक्टर और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) समेत कई अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट करने को कहा है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत के पीछे मुख्य कारण क्या रहे और प्रशासन की तरफ से समय रहते क्या एहतियाती कदम उठाए गए थे।
न्यायालय ने यह भी पूछा है कि प्रभावित क्षेत्रों में डॉक्टरों की टीम क्यों नहीं भेजी गई और क्या वहां दवाओं व मेडिकल किट की पर्याप्त आपूर्ति थी या नहीं। हाई कोर्ट के इस सख्त तेवर के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
मैदानी इलाकों की हकीकत और प्रशासनिक दावे
एक तरफ जहां शासन-प्रशासन हर गांव तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का दावा करता है, वहीं दूसरी तरफ बालाघाट जैसी घटनाएं इन दावों की पोल खोल देती हैं।
- बुनियादी सुविधाओं की कमी: कई दूरदराज के गांवों में आज भी एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती है।
- जागरूकता का अभाव: स्वास्थ्य विभाग द्वारा समय-समय पर संक्रामक बीमारियों के प्रति जागरूकता अभियान नहीं चलाए जाते।
- स्टाफ की कमी: सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और नर्सों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं।
इन तमाम कमियों के कारण मरीजों को जिला मुख्यालय या अन्य बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है, और कई बार रास्ते में ही स्थिति गंभीर हो जाती है।
अभिभावकों का दर्द और न्याय की आस
अपने जिगर के टुकड़ों को खोने वाले माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका कहना है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों ने ठीक से इलाज करने के बजाय उन्हें बड़े अस्पतालों के लिए रेफर कर दिया, लेकिन गरीब परिवार महंगे इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ थे। अब इन पीड़ित परिवारों की निगाहें हाई कोर्ट पर टिकी हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस कानूनी सख्ती के बाद न केवल दोषियों पर कार्रवाई होगी, बल्कि भविष्य में किसी अन्य माता-पिता को इस तरह का दर्द नहीं सहना पड़ेगा।
आगे की कार्रवाई और प्रशासनिक जवाबदेही
हाई कोर्ट के इस नोटिस के बाद अब संबंधित विभागों को एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपना जवाब कोर्ट में पेश करना होगा। यदि अधिकारियों के जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाते हैं, तो अदालत की ओर से और भी कड़ी टिप्पणियां या कार्रवाई देखने को मिल सकती है। इस मामले ने एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे देश में बच्चों की जान की कीमत इतनी कम हो गई है कि प्रशासनिक लापरवाही के चलते उन्हें अपनी जान गंवानी पड़े?
यह देखना बेहद अहम होगा कि इस कानूनी प्रक्रिया के बाद राज्य सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है और क्या वाकई बालाघाट जैसी त्रासदियों पर रोक लग पाएगी।