बलिया में बनेगा 350 दर्शकों की क्षमता वाला वीर लोरिक सभागार, तलवार के एक वार से पत्थर काटने वाले योद्धा की गाथा होगी अमर
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बलिया में बनेगा 350 दर्शकों की क्षमता वाला वीर लोरिक सभागार, तलवार के एक वार से पत्थर काटने वाले योद्धा की गाथा होगी अमर

बलिया में बनेगा 350 दर्शकों की क्षमता वाला वीर लोरिक सभागार, तलवार के एक वार से पत्थर काटने वाले योद्धा की गाथा होगी अमर

भारतीय लोक संस्कृति और इतिहास के पन्नों में कई ऐसे महानायक दर्ज हैं, जिनके पराक्रम और साहस की कहानियां आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्हीं महान योद्धाओं की विरासत को संजोने और उसे आधुनिक पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए एक बेहद सराहनीय कदम उठाया है। इसी कड़ी में पूर्वांचल के ऐतिहासिक जिले बलिया में भोजपुरी लोक महाकाव्य 'लोरिकायन' के नायक वीर लोरिक की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए एक भव्य सभागार का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह पहल न केवल क्षेत्रीय सांस्कृतिक गतिविधियों को एक नया मंच देगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपने इतिहास से जोड़ेगी।

साढ़े चार करोड़ से अधिक की लागत से तैयार हो रहा अत्याधुनिक सभागार

उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से बलिया जिले के बांसडीह तहसील अंतर्गत राजस्व ग्राम हसनपुरा (पोस्ट बिसौली) में इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू किया गया है। लगभग 4.97 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस भव्य सभागार के निर्माण के लिए शासन स्तर से 1.36 करोड़ रुपये की पहली किश्त भी जारी की जा चुकी है, जिससे निर्माण कार्यों ने गति पकड़ ली है। वर्तमान में इस परियोजना के फाउंडेशन का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है।

इस अत्याधुनिक सभागार की परिकल्पना कुछ इस तरह की गई है कि यह आधुनिक तकनीकी सुविधाओं से पूरी तरह लैस हो। इसमें एक साथ 350 दर्शकों के बैठने की क्षमता होगी। स्थानीय कलाकारों, लोकगायकों और नाट्य कर्मियों के लिए यह किसी बड़े वरदान से कम नहीं होगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के सुचारू आयोजन के लिए भवन को पूरी तरह फायर-प्रूफ बनाया जा रहा है, ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके। साथ ही, यहां आने वाले कलाकारों और दर्शकों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए जलापूर्ति की पुख्ता व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है।

अत्याधुनिक तकनीकी सुविधाओं से लैस होगा मंच

आज के दौर में किसी भी सांस्कृतिक आयोजन की सफलता के लिए उच्च कोटि की ध्वनि और प्रकाश व्यवस्था का होना बेहद जरूरी है। इसे ध्यान में रखते हुए बलिया के इस नए सभागार में तमाम हाई-टेक सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं। सभागार में साउंड रीइन्फोर्समेंट सॉल्यूशन (बेहतर ध्वनि व्यवस्था), एचडी सिनेमैटिक प्रोजेक्शन सिस्टम और एलईडी इंटेलिजेंट स्टेज लाइटिंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा।

मंच की सुंदरता और कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए मोटराइज्ड कर्टन और विशेष फैब्रिकेशन सिस्टम भी विकसित किया जा रहा है। इसके अलावा, सभागार के भीतर गूंज (Echo) की समस्या को खत्म करने और दर्शकों के अनुकूल बेहतरीन वातावरण तैयार करने के लिए विशेष एकॉस्टिकल एवं इंटीरियर्स का कार्य कराया जाएगा, जो बड़े शहरों के ऑडिटोरियम को टक्कर देगा।

मानकों के अनुरूप मजबूत ढांचा और प्रशासनिक देखरेख

निर्माण की गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता न हो, इसके लिए इस भवन का निर्माण पूरी तरह से आरसीसी फ्रेम्ड स्ट्रक्चर (RCC Framed Structure) के आधार पर किया जा रहा है। भवन की पूरी डिजाइन भारतीय मानक (आईएस) कोड के दिशा-निर्देशों के अनुसार तैयार की गई है। इसके सभी निर्माण कार्य केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के निर्धारित स्पेसिफिकेशन और संबंधित विभाग के मानकों के अधीन ही पूरे कराए जा रहे हैं, जिससे यह संरचना सदियों तक मजबूत बनी रहे।

कौन थे वीर लोरिक? जानिए भोजपुरी लोक संस्कृति के इस महानायक का इतिहास

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की सिकंदरपुर तहसील के गौरा गांव में जन्मे वीर लोरिक को भोजपुरी लोक महाकाव्य 'लोरिकायन' का केंद्रीय और सबसे प्रमुख नायक माना जाता है। उन्हें लोककथाओं में एक ऐसे पराक्रमी योद्धा के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने हमेशा समाज में फैले अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ मुखर होकर लड़ाई लड़ी।

वीर लोरिक के जीवन से जुड़े कई ऐसे प्रसंग हैं, जो आज भी लोकगीतों और गाथाओं के माध्यम से पूर्वांचल, बिहार और झारखंड के गांवों में चाव से गाए और सुने जाते हैं। उनकी वीरता का सबसे चर्चित प्रसंग सोनभद्र के अत्याचारी राजा से मंजरी की रक्षा करने और उसे युद्ध में परास्त करने का है। इस ऐतिहासिक युद्ध के बाद वीर लोरिक और मंजरी के विवाह की कथा आज भी लोकगाथाओं में अमर है।

तलवार के एक वार से दो टुकड़े करने वाला 'वीर लोरिक पत्थर'

वीर लोरिक से जुड़ा एक ऐसा रहस्य और लोकविश्वास है, जो आज भी लोगों को हैरान कर देता है। झारखंड और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित मारकुंडी घाटी का 'वीर लोरिक पत्थर' इसका सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। जनश्रुतियों और लोकमान्यताओं के अनुसार, मंजरी के अनुरोध पर वीर लोरिक ने अपनी तलवार के केवल एक ही वार से एक विशालकाय पत्थर को दो बराबर हिस्सों में चीर दिया था। आज भी यह पत्थर बलिया, सोनभद्र और आसपास के इलाकों में वीरता, अटूट प्रेम और पराक्रम का जीवंत प्रतीक माना जाता है। बलिया में पहले से ही वीर लोरिक अखाड़ा, उनकी भव्य प्रतिमा और वीर लोरिक स्पोर्ट्स स्टेडियम उनकी यादों को ताजा रखे हुए हैं, और अब यह नया सभागार इस कड़ी में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ने जा रहा है।

सरकार का सांस्कृतिक संकल्प

इस महत्वपूर्ण परियोजना पर बात करते हुए उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि महापुरुष वीर लोरिक का शौर्य, उनका अदम्य साहस और उनकी लोकगाथाएं हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। उनकी जीवन गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को हमेशा अन्याय के खिलाफ खड़े होने और अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देती रहेंगी। सरकार की यह पहल इन महान नायकों को सच्ची श्रद्धांजलि है।

बहरहाल, बलिया में बन रहा यह भव्य सभागार केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है, बल्कि यह पूर्वांचल की लोक संस्कृति, उसके गौरवशाली अतीत और वीर लोरिक के अजेय पराक्रम का एक ऐसा मंदिर बनने जा रहा है, जो आने वाले समय में कला और साहित्य प्रेमियों का मुख्य केंद्र बनेगा।

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रोली सिंह

रोली सिंह

Writer (स्थानीय खबरें)

रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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