अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों से एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक परिधानों को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। यूरोप के प्रमुख देशों में शुमार इटली में स्कूलों के भीतर बुर्का और नकाब जैसे चेहरा पूरी तरह ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी द्वारा की गई इस घोषणा के बाद से वैश्विक स्तर पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब भारतीय राजनीतिक गलियारों से भी तीखी और अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं, जिससे यह मुद्दा देश के भीतर भी चर्चा का केंद्र बन गया है।
इटली में क्या है नया प्रस्ताव और क्यों मचा है बवाल?
हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने अपनी राजनीतिक पार्टी 'ब्रदर्स ऑफ इटली' के एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के दौरान देश की शिक्षा प्रणाली और सांस्कृतिक पहचान को लेकर एक बड़ा ऐलान किया। इस घोषणा के तहत, इटली के स्कूलों में चेहरा ढकने वाले वस्त्रों, विशेषकर बुर्का और नकाब पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की योजना है। इसके साथ ही, कक्षाओं के भीतर विदेशी छात्रों की संख्या को भी एक निश्चित सीमा के दायरे में लाने का प्रस्ताव रखा गया है।
जॉर्जिया मेलोनी की इस घोषणा को यूरोप में सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और अल्पसंख्यक समुदायों के एक वर्ग ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि इस तरह के प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों के खिलाफ हैं।
सपा विधायक अबू आसिम आजमी का तीखा हमला
इटली के इस प्रस्तावित कानून पर भारत में भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक अबू आसिम आजमी ने जॉर्जिया मेलोनी के इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। अपने तीखे अंदाज के लिए जाने जाने वाले आजमी ने इस मामले को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी जोड़ दिया।
अबू आसिम आजमी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि चूंकि जॉर्जिया मेलोनी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मित्र हैं, इसलिए वह इस तरह के कदम उठा रही हैं। आजमी ने आगे कहा, "वे इटली की प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उन्हें जब चाहे बयान देने और नीतियां बनाने का अधिकार है, लेकिन उन्हें इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहिए कि इस तरह के फैसलों से किसी भी समुदाय की धार्मिक आस्था को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। पहनावा और आस्था व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा हैं।"
कांग्रेस नेता उदित राज का अलग नज़रिया
जहां एक तरफ समाजवादी पार्टी ने इस फैसले को धार्मिक आस्था पर चोट बताया है, वहीं कांग्रेस पार्टी की तरफ से इस मामले पर एक संतुलित और व्यावहारिक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता उदित राज ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा कि हर संप्रभु देश को अपनी आंतरिक व्यवस्था और कानूनों के हिसाब से फैसले लेने का पूरा अधिकार है।
उदित राज ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "जॉर्जिया मेलोनी इटली की प्रधानमंत्री हैं और वहां के स्कूलों में कौन से नियम, प्रोटोकॉल या ड्रेस कोड लागू होंगे, यह पूरी तरह से उनके अधिकार क्षेत्र में आता है। स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों और विशेष परिधानों की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, इसका निर्णय वहां की सरकार को लेना है। यदि इस तरह के नियम बिना किसी भेदभाव के सभी पर समान रूप से लागू किए जाते हैं, तो इसमें किसी भी प्रकार के भेदभाव का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है।"
यूरोप में लगातार कड़े हो रहे हैं नियम
यह कोई पहला मौका नहीं है जब यूरोप के किसी देश में सार्वजनिक स्थानों या शैक्षणिक संस्थानों में चेहरे को ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने की बात उठी हो। इससे पहले फ्रांस, बेल्जियम और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में भी बुर्का, नकाब और बुर्किनी को लेकर कड़े कानून बनाए जा चुके हैं। इन देशों की सरकारों का यह तर्क रहा है कि सुरक्षा कारणों और सामाजिक एकीकरण (Social Integration) के लिए यह जरूरी है कि हर व्यक्ति का चेहरा पहचाना जा सके।
दूसरी ओर, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक संगठनों का मानना है कि इस प्रकार के प्रतिबंध बहुसांस्कृतिक समाजों की मूल भावना के खिलाफ हैं और इनसे विशेष समुदाय की महिलाओं का समाज से अलगाव और बढ़ सकता है।
भारत में क्यों गरमाई है सियासत?
इटली की घटना का भारत की राजनीति में गूंजना इस बात को साबित करता है कि धार्मिक और वैचारिक मुद्दे अब सीमाओं के मोहताज नहीं रहे। भारत में पहले से ही हिजाब और ड्रेस कोड को लेकर कई बार बड़े विवाद खड़े हो चुके हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के एक प्रमुख राजनीतिक दल के विधायक द्वारा इस मुद्दे पर बयान देना और इसे कूटनीति तथा व्यक्तिगत संबंधों से जोड़ना आने वाले दिनों में और बड़ी बहस को जन्म दे सकता है।
आगामी दिनों में देखना यह होगा कि इटली की संसद में यह प्रस्ताव किस रूप में पास होता है और वैश्विक स्तर पर इस पर मानवाधिकार संगठन क्या रुख अपनाते हैं। फिलहाल, यह मुद्दा भारत और यूरोप दोनों ही जगहों पर राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता के बीच चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।