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पटना हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी, तीन प्रमुख विभागों के सचिव तलब

पटना हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी, तीन प्रमुख विभागों के सचिव तलब

न्याय के मंदिर में जब दलीलें हवा में उड़ने लगें और रिकॉर्ड पर कुछ न मिले, तो अदालत का धैर्य टूटना स्वाभाविक है। पटना हाईकोर्ट में इन दिनों कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। बिहार न्यायिक अकादमी से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत का गुस्सा इस कदर फूटा कि राज्य के तीन प्रमुख विभागों के सचिवों को सीधे व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने का फरमान सुना दिया गया। यह मामला महज़ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि अदालती कार्यवाही की गंभीरता और प्रशासनिक लापरवाही के बीच छिड़ी एक बड़ी कानूनी जंग का रूप ले चुका है।

अदालत में क्या हुआ? सरकारी दावों की खुली पोल

घटना गुरुवार की है, जब एक्टिंग चीफ जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ इस महत्वपूर्ण जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान माहौल उस गर्म हो गया जब सरकारी पक्ष की ओर से पेश हुए अधिकारियों ने कुछ ऐसे दावे किए जो फाइल में मौजूद ही नहीं थे।

अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG-3) पीके वर्मा ने अदालत के समक्ष यह दावा किया कि महात्मा गांधी सेतु के नीचे के इलाके के विकास और सौंदर्यीकरण को लेकर पथ निर्माण विभाग के कार्यपालक अभियंता द्वारा एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल किया गया है। लेकिन, जब अदालत के न्यायाधीशों ने तुरंत फाइल और रिकॉर्ड की पड़ताल की, तो वहां ऐसा कोई भी दस्तावेज या हलफनामा मौजूद नहीं पाया गया।

बिना किसी आधिकारिक दस्तावेज के मौखिक दलीलें पेश करने के इस तरीके ने पीठ को नाराज कर दिया। अदालत ने बहुत कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक कार्यवाही में इस तरह की मनमानी और हवा-हवाई बातें बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि रिकॉर्ड से बाहर की बातों या दलीलों के आधार पर किसी भी सूरत में सुनवाई को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

महाधिवक्ता एसडी संजय ने खुद को किया मामले से अलग

अदालत की इस तीखी और सख्त टिप्पणी के बाद राज्य के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) एसडी संजय ने इस पूरे मामले से खुद को अलग करने का निर्णय लिया। अदालत में इस तरह की अप्रत्याशित स्थिति का उत्पन्न होना यह दर्शाता है कि न्यायाधीश इस मामले में कितनी संवेदनशीलता और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

पुराने वादे और डेडलाइन का उल्लंघन

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अपने ही पिछले आदेशों की कड़ियों को जोड़ा और पाया कि किस तरह प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही बरती जा रही है। अदालत ने 3 जून 2026 को दिए गए अपने एक पुराने आदेश का हवाला दिया। उस समय पथ निर्माण विभाग के एक जिम्मेदार अभियंता ने अदालत को यह भरोसा दिलाया था कि महात्मा गांधी सेतु के नीचे बाड़ लगाने (Fencing) और पौधारोपण (Plantation) का काम हर हाल में 30 जून तक पूरा कर लिया जाएगा।

लेकिन, कैलेंडर के पन्ने आगे बढ़ चुके हैं और निर्धारित समय-सीमा बीते हुए भी काफी वक्त हो चुका है, फिर भी वह काम जमीन पर पूरा होता नहीं दिखा। अदालत ने इसी बात पर कड़ा एतराज़ जताया कि आखिर सरकारी महकमों द्वारा दिए गए आश्वासनों का कोई मूल्य क्यों नहीं रह गया है?

बिहार न्यायिक अकादमी की सुरक्षा और परिवेश का मामला

मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता पीयूष लाल ने बिहार न्यायिक अकादमी की तरफ से पक्ष रखते हुए अदालत को बताया कि हाल ही में जो हलफनामे दाखिल किए गए हैं, वे केवल अकादमी की उत्तरी सीमा की दीवार (Northern Boundary Wall) तक ही सीमित हैं। पूर्वी हिस्से के विकास, सुरक्षा और सौंदर्यीकरण को लेकर उन दस्तावेजों में पूरी तरह से चुप्पी साधी गई है, या यूं कहें कि कोई ठोस कार्ययोजना पेश ही नहीं की गई है।

इस पर खंडपीठ ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कोई आम या निजी दीवानी मुकदमा नहीं है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने फायदे के लिए लड़ रहे हों। यह सीधा ताल्लुक बिहार न्यायिक अकादमी की सुरक्षा, वहां के कामकाज के माहौल और एक उचित शैक्षणिक व न्यायिक वातावरण के सृजन से जुड़ा हुआ है। ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की सुस्ती या लापरवाही को माफ नहीं किया जा सकता।

इन तीन विभागों के सचिवों को किया गया है तलब

अदालत ने अपनी शक्तियों का कड़ा इस्तेमाल करते हुए राज्य के तीन अहम विभागों के शीर्ष अधिकारियों पर शिकंजा कसा है। जिन अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का आदेश दिया गया है, उनमें शामिल हैं:

  • पथ निर्माण विभाग (Road Construction Department) के सचिव
  • वन विभाग (Forest Department) के सचिव
  • नगर विकास एवं आवास विभाग (Urban Development and Housing Department) के सचिव

इन तीनों वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे 11 सितंबर 2026 को सुबह ठीक 10:30 बजे व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित हों। केवल उपस्थित होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें इस मामले से जुड़े सभी लंबित कार्यों की एक स्पष्ट, समन्वित और एकीकृत कार्ययोजना (Integrated Action Plan) भी अपने साथ लानी होगी।

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते सवाल

यह घटनाक्रम एक बार फिर से इस बात की ओर इशारा करता है कि किस तरह से राज्य की नौकरशाही अदालती आदेशों और जनहित से जुड़े मामलों को लेकर उदासीन रवैया अपनाती है। जब तक उच्च न्यायालय का चाबुक नहीं चलता, तब तक कई बार फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। अब सबकी निगाहें 11 सितंबर 2026 पर टिकी हैं, जब ये तीनों बड़े सचिव अदालत के कटघरे में खड़े होकर अपनी कार्ययोजना पेश करेंगे और उन्हें कोर्ट के तीखे सवालों का सामना करना होगा।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

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रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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