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ब्रिक्स सम्मेलन 2026: भारत का मास्टरस्ट्रोक, डॉलर को मात देने की तैयारी और रूस-ईरान के साथ बड़े समझौते

ब्रिक्स सम्मेलन 2026: भारत का मास्टरस्ट्रोक, डॉलर को मात देने की तैयारी और रूस-ईरान के साथ बड़े समझौते

वैश्विक कूटनीति के केंद्र में इस समय नई दिल्ली मजबूती के साथ खड़ी है। साल 2026 के बहुप्रतीक्षित ब्रिक्स सम्मेलन का आगाज़ भारत की राजधानी में हो चुका है, और दुनिया भर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस बड़े मंच से भारत क्या संदेश देने वाला है। अमरीका के साथ टैरिफ को लेकर चल रही तल्खी और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, भारत ने इस बार अपनी प्राथमिकताओं में ऐतिहासिक बदलाव किया है। पारंपरिक राजनीतिक बयानबाजी से हटकर, इस बार का पूरा फोकस 'व्यापार, भुगतान और मजबूत आर्थिक तंत्र' पर है।

राजधानी के प्रतिष्ठित 'भारत मंडपम' को छावनी में तब्दील कर दिया गया है। मेहमानों का आना शुरू हो चुका है और शहर के प्रीमियम होटल पूरी तरह बुक हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच 11 सितंबर से कई अहम रूटों को डायवर्ट भी किया गया है। लेकिन इन सबके पीछे जो सबसे बड़ी हलचल है, वह पर्दे के पीछे चल रही कूटनीतिक और आर्थिक बैठकों की है, जो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की दिशा तय करने वाली हैं।


डॉलर की बादशाहत को चुनौती और स्थानीय मुद्राओं का जाल

आज के दौर में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति और महाशक्तियों के बीच आर्थिक खींचतान से जूझ रही है, तब भारत ने एक ऐसा दांव चला है जो अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को सीधे तौर पर चुनौती देता है। ब्रिक्स देशों (जिनकी संख्या अब बढ़कर 11 हो गई है और साथ ही 10 नए साझेदार देश भी जुड़े हैं) के बीच सीमा-पार कारोबार को आसान बनाना इस सम्मेलन का मुख्य एजेंडा है।

भारत की कोशिश है कि सदस्य देश डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में व्यापार करें। इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका और अधिक मजबूत हो जाएगी। आइए जानते हैं कि इस बहुपक्षीय मंच पर भारत के द्विपक्षीय एजेंडे में कौन-से देश और कौन-से बड़े मुद्दे सबसे ऊपर हैं।


रूस के साथ रक्षा सौदों और रुपया-रूबल ट्रेड पर महामंथन

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारतीय नेतृत्व के बीच होने वाली बैठकों में रक्षा सहयोग सबसे अहम रहने वाला है। भारत और रूस के बीच उन्नत किस्म के सुखोई एसयू-57 (Su-57) लड़ाकू विमान की खरीद को लेकर बातचीत अपने बेहद संवेदनशील और निर्णायक दौर में है।

इसके अलावा, दोनों देशों के बीच कच्चे तेल के भुगतान और 'रुपया-रूबल' व्यापार तंत्र को धार देने पर भी गंभीर चर्चा होगी। अमरीकी प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करने के मूड में नहीं है। परमाणु ऊर्जा, उर्वरक और परिवहन गलियारे (Transport Corridors) जैसे मुद्दों पर भी मुहर लगने की पूरी संभावना है।

ईरान और चाबहार बंदरगाह: मध्य एशिया का नया द्वार

ईरान के साथ भारत के रिश्ते कूटनीतिक रूप से हमेशा से अहम रहे हैं, लेकिन इस बार का ब्रिक्स सम्मेलन इसे एक नए मुकाम पर ले जाने के लिए तैयार है। ईरान के साथ होने वाली बैठकों में चाबहार बंदरगाह का विकास और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) मुख्य केंद्र में हैं।

भारत चाबहार के जरिए मध्य एशिया और रूस तक निर्बाध व्यापार मार्ग स्थापित करना चाहता है। ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भी ईरान के साथ स्थानीय मुद्रा में लेन-देन को बढ़ावा देने पर बातचीत जारी है, जिससे पश्चिमी प्रतिबंधों के असर को बेअसर किया जा सके।

चीन के साथ कूटनीति: सीधी उड़ानें और व्यापार संतुलन पर पैनी नजर

वर्ष 2020 के सीमा संघर्ष के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यह पहली भारत यात्रा है, इसलिए इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें हैं। हालांकि कड़वाहट अभी पूरी तरह मिटी नहीं है, लेकिन कूटनीति व्यावहारिक रुख अपना चुकी है।

दोनों देशों के बीच पिछले साल करीब 155 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। इस सम्मेलन में 2020 से पहले की तरह सीधी उड़ानों को पूरी तरह बहाल करने और व्यापार विस्तार पर चर्चा हो रही है। हालांकि, भारत डेटा सुरक्षा और अलीपे-प्लस को यूपीआई से जोड़ने जैसे प्रस्तावों पर बेहद सतर्क कदम उठा रहा है।

चीन वार्ता के प्रमुख बिंदु:

  • व्यापार घाटे को कम करने और संतुलन बनाने की रणनीति।
  • चीनी कंपनियों के लिए भारत में सख्त और पारदर्शी शर्तें।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र में सप्लाई चेन की सुरक्षा।
  • सीमा पर शांति और स्थिरता के साथ प्रत्यक्ष उड़ानों का दायरा बढ़ाना।

खाड़ी देशों और अन्य साझेदारों के साथ मजबूत होती आर्थिक धुरी

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ भारत का स्थानीय मुद्राओं (रुपया-दिरहम) में व्यापार पहले से ही एक सफल मॉडल बन चुका है। ब्रिक्स के मंच पर भारत इस मॉडल को अन्य देशों के लिए एक मिसाल के रूप में पेश कर रहा है। वहीं सऊदी अरब के साथ कच्चे तेल, पेट्रो-रसायन और भारी निवेश पर फोकस है।

इंडोनेशिया के साथ समुद्री व्यापार, पाम तेल और महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) पर बात हो रही है, तो ब्राजील के साथ खाद्य सुरक्षा और जैव ईंधन पर जोर दिया जा रहा है। मिस्र, इथियोपिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे अफ्रीकी देशों के साथ कृषि, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और संयुक्त राष्ट्र सुधारों जैसे वैश्विक मुद्दों को उठाया जा रहा है।

ब्रिक्स का बढ़ता कुनबा: अब 11 सदस्य और 10 साझेदार देश

ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का संगठन नहीं रहा है। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया भी शामिल होकर इसके 11 पूर्ण सदस्य बन चुके हैं। इसके अतिरिक्त, बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाखस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम जैसे 10 देश इसके साझेदार देशों के रूप में जुड़े हैं।

इतने बड़े और विविधतापूर्ण समूह के एक मंच पर आने से वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज मजबूत हुई है। भारत इस सम्मेलन के जरिए यह साबित करने की पूरी कोशिश कर रहा है कि वह पश्चिमी देशों के पाले में झुके बिना, पूरी निष्पक्षता और दृढ़ता के साथ अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रख सकता है।

निसंदेह, दिल्ली में हो रहा यह ब्रिक्स सम्मेलन आने वाले दशकों की आर्थिक और भू-राजनीतिक तस्वीर बदलने की कुव्वत रखता है। चाबहार की लहरों से लेकर सुखोई की गड़गड़ाहट तक, और डिजिटल भुगतान के सर्वर से लेकर स्थानीय मुद्राओं के लेन-देन तक, भारत ने एक ऐसा चक्रव्यूह रचा है जो देश की आर्थिक महाशक्ति बनने की राह को और अधिक प्रशस्त करेगा।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

Content Writer (देश खबरें)

अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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