भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापार समझौते (Trade Deal) की बातचीत को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच ट्रेड डील की बातचीत अब एक ऐसे पड़ाव पर पहुंच गई है जहां से आगे बढ़ना या किसी तरह का समझौता करना बेहद कठिन हो गया है। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (MSC) के दौरान वित्त मंत्री के इस बयान ने वैश्विक व्यापार गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।
कठिन दौर से गुजर रही हैं भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताएं
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत बेहद कड़ी और कड़े नियमों के तहत की गई है। यह वार्ताएं अभी भी जारी हैं, लेकिन दोनों पक्ष अब एक ऐसे 'प्लेटो' (Plateau) यानी स्थिरता या सीमा पर पहुंच चुके हैं, जिसके आगे रियायतें देना या लेना बहुत ही मुश्किल साबित हो रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिए कि यदि दोनों पक्षों के बीच कुछ और गुंजाइश बनती है, तो इस पर विचार किया जा सकता है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब कुछ दिन पहले ही अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमियन ग्रीर ने कहा था कि इस डील पर मुहर लगना अभी 'आसन्न' (Imminent) यानी तुरंत संभव नहीं है। दोनों देशों ने उन तमाम वस्तुओं और मुद्दों की पहचान कर ली है जो इस डील में सबसे बड़े रोड़े (Sticking Points) बने हुए हैं।
टैरिफ के हथियार बनने पर जताई चिंता
अपने संबोधन में वित्त मंत्री ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि दोनों देशों के बीच व्यापार का पलड़ा भारत के पक्ष में झुकता है, जबकि चीन के साथ व्यापार में भारत को भारी असंतुलन का सामना करना पड़ता है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर टैरिफ के इस्तेमाल को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी।
सीतारमण ने कहा, "बातचीत वह एकमात्र मंच हुआ करता था जिसके जरिए देश अपनी विसंगतियों को उजागर कर सकते थे... लेकिन अब, इस असंतुलन को दूर करने के लिए दूसरे तरीकों का सहारा लिया जा रहा है, जहां टैरिफ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। जबकि, टैरिफ मूल रूप से बातचीत का एक साधन हुआ करता था।"
ग्राहम बिल और रूस से तेल खरीद का पेंच
भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों के सामने नई चुनौतियां तब खड़ी हुईं जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' कानून पर हस्ताक्षर किए। इस नए कानून के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार मिल गया है कि वे भारत और चीन जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (Tariff) लगा सकते हैं, जो रूस से लगातार तेल और गैस की खरीद जारी रखे हुए हैं।
इस बीच, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल जी-20 व्यापार मंत्रियों की बैठक और द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ताओं के सिलसिले में पिछले कई दिनों से अमेरिका में मौजूद हैं। वित्त मंत्रालय ने भी अपनी हालिया मासिक आर्थिक समीक्षा (Monthly Economic Review) में इस बात को स्वीकार किया है कि ग्राहम बिल के पारित होने और अमेरिकी राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद से अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं.
सेक्शन 301 और भारतीय निर्यातकों की चिंताएं
रूस से जुड़े शुल्कों के अलावा, भारत एक अन्य अमेरिकी टैरिफ तंत्र यानी 'ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 की धारा 301' (Section 301) के तहत शुरू की गई जांच के फैसले का भी इंतजार कर रहा है। इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या भारत के पास अत्यधिक औद्योगिक क्षमता है और क्या उसका उत्पादन अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे पहले सेक्शन 301 के तहत की गई कार्रवाई से 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया था।
भारतीय कारोबार पर इसका क्या असर पड़ रहा है?
- बल्क ऑर्डर में कमी: अमेरिकी खरीदार अब बड़े पैमाने पर थोक ऑर्डर देने से बच रहे हैं और अपने आयात के स्रोतों में विविधता (Diversify) ला रहे हैं।
- लंबी अवधि की अनिश्चितता: जब तक ट्रेड डील फाइनल नहीं हो जाती, तब तक भारतीय निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।
- आदेशों की प्रकृति में बदलाव: अमेरिकी खरीदार अब छोटी खेप में ऑर्डर बुक कर रहे हैं, जिससे भारतीय लघु और मध्यम उद्योगों पर असर पड़ रहा है।
आगे की क्या है संभावना?
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमियन ग्रीर ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ अपनी बैठक को सकारात्मक बताया था और कहा था कि दोनों देश इस प्रक्रिया के अंतिम चरण में हैं। उन्होंने संकेत दिए थे कि इस गतिरोध को तोड़ने और प्रगति का आकलन करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच जल्द ही एक और उच्च-स्तरीय टेलीफोन वार्ता हो सकती है।
फिलहाल, आर्थिक विश्लेषकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश कड़े कूटनीतिक दबाव के बीच बीच का कोई रास्ता निकाल पाते हैं या फिर यह व्यापार समझौता ठंडे बस्ते में जाता है। भारत के रुख से साफ है कि देश अपने आर्थिक हितों से समझौता किए बिना ही किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते को अंतिम रूप देने के पक्ष में है।