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छत्तीसगढ़ में बचे सिर्फ 35 बाघ! शिकार और तस्करी की CBI जांच शुरू

छत्तीसगढ़ में बचे सिर्फ 35 बाघ! शिकार और तस्करी की CBI जांच शुरू

छत्तीसगढ़ के जंगलों से आ रही एक अत्यंत गंभीर और चिंताजनक खबर ने वन्यजीव प्रेमियों और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। राज्य के घने जंगलों में अब बाघों की संख्या सिमट कर केवल 35 के आसपास रह गई है। इस बीच, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर सक्रिय बाघों के अंगों के अवैध शिकार और खतरनाक तस्करी गिरोह के खेल का पर्दाफाश करने की जिम्मेदारी देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी सीबीआई (CBI) को सौंप दी गई है। यह मामला सिर्फ वन्यजीवों के अवैध शिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार खाकी यानी पुलिस विभाग से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं, जिससे इस पूरी घटना की गंभीरता कई गुना बढ़ गई है।

घटती संख्या के बीच खौफनाक सच: सिर्फ 35 बाघ बचे

भारत में बाघों की संख्या बढ़ाने और उनके संरक्षण के लिए लगातार बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के जंगलों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, पूरे राज्य में अब बमुश्किल 35 बाघ ही बचे हैं। एक समय जिन जंगलों में बाघों की दहाड़ गूंजा करती थी, वे अब धीरे-धीरे वीरान होते जा रहे हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि अवैध शिकार का यह सिलसिला इसी रफ्तार से चलता रहा, तो आने वाले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ के जंगलों से बाघों का नामोनिशान पूरी तरह मिट जाएगा।

बाघों की इस घटती संख्या के पीछे केवल प्राकृतिक कारण नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे एक संगठित अपराधी गिरोह (Organized Crime Syndicate) का हाथ है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में बाघों की खाल, हड्डियां और अन्य अंगों की तस्करी करता है। पिछले कुछ महीनों में सीमावर्ती इलाकों से कई ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिन्होंने वन विभाग और स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय है बड़ा तस्करी नेटवर्क

छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा से लगे इलाके अपराधियों के लिए हमेशा से सेफ जोन माने जाते रहे हैं। इन भौगोलिक सीमाओं का फायदा उठाकर तस्कर आसानी से एक राज्य से दूसरे राज्य में वारदातों को अंजाम देकर फरार हो जाते हैं। हाल ही में सामने आए मामलों से यह साफ हो गया है कि यहां वन्यजीवों की खाल और अंगों की तस्करी का एक बहुत बड़ा और पुराना नेटवर्क काम कर रहा है।

तस्करों के इस अंतरराज्यीय नेटवर्क को पकड़ने के लिए स्थानीय पुलिस और वन विभाग के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे थे। यही वजह है कि इस मामले की तह तक जाने और इसके पीछे के असली मास्टरमाइंड को बेनकाब करने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी को मैदान में उतारा गया है। सीबीआई की एंट्री से अब तस्करों और उनके संरक्षकों की नींद उड़नी तय मानी जा रही है।खाकी पर भी लगे दाग: पुलिसकर्मी भी जांच के घेरे में

इस पूरे मामले का सबसे डरावना पहलू यह है कि इस अवैध तस्करी के नेटवर्क में कुछ पुलिसकर्मियों की संलिप्तता के गंभीर संकेत मिले हैं। शुरुआती जानकारियों के मुताबिक, तस्करों को स्थानीय स्तर पर सुरक्षा मुहैया कराने और पुलिस की रेड से पहले उन्हें सूचना लीक करने में कुछ वर्दीधारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है।

यदि जांच में यह साबित हो जाता है कि पुलिस विभाग के भीतर से ही तस्करों को शह मिल रही थी, तो यह वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक बहुत बड़ा घोटाला साबित होगा। सीबीआई अब उन सभी पुलिसकर्मियों और स्थानीय अधिकारियों की कुंडली खंगाल रही है, जिनकी इस बेल्ट में तैनाती रही है और जिनकी संदिग्ध गतिविधियों की शिकायतें पहले भी मिल चुकी थीं।

सीबीआई जांच से क्या उम्मीदें हैं?

  • अंतरराष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश: सीबीआई के पास आधुनिक तकनीक और देशव्यापी नेटवर्क है, जिससे तस्करों के अंतरराष्ट्रीय लिंक का आसानी से पता लगाया जा सकेगा।
  • भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा: पुलिस और प्रशासन के भीतर छिपे काले भेड़ियों को बेनकाब किया जाएगा जो अपराधियों की मदद कर रहे थे।
  • कड़ी सजा का मार्ग: पुख्ता सबूतों के आधार पर अपराधियों को कोर्ट में सजा दिलाना अब ज्यादा आसान होगा।
  • जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा: इस बड़ी कार्रवाई से अपराधियों में खौफ पैदा होगा, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगेगी।

वन्यजीव संरक्षण के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां

भारत में 'प्रोजेक्ट टाइगर' के तहत बाघों को बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और लचर सुरक्षा व्यवस्था के कारण ये प्रयास कई बार दम तोड़ देते हैं। छत्तीसगढ़ के जंगलों में जिस तरह से बाघों का शिकार किया जा रहा है, वह देश की पर्यावरण सुरक्षा के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कागजी योजनाएं बनाने से बाघ नहीं बचेंगे। इसके लिए स्थानीय आदिवासियों को विश्वास में लेना होगा, खुफिया तंत्र (Intelligence Network) को मजबूत करना होगा और वन विभाग के कर्मचारियों को आधुनिक हथियारों व संसाधनों से लैस करना होगा। जब तक शिकारियों को यह डर नहीं होगा कि कानून उनसे ऊपर है, तब तक ऐसे मामलों पर पूरी तरह से रोक लगाना असंभव है।

आगे क्या होगा?

सीबीआई के हाथ में कमान आने के बाद अब छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के उन सभी संदिग्ध ठिकानों पर छापे मारे जा सकते हैं, जहां तस्करी के तार जुड़े हैं। आने वाले दिनों में कुछ बड़े खुलासे होने की उम्मीद है, जिसमें कई रसूखदार लोगों और अधिकारियों के नाम भी सामने आ सकते हैं। देश की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि केंद्रीय एजेंसी इस हाई-प्रोफाइल वन्यजीव अपराध के मामले में कितनी जल्दी और कितनी गहराई तक पहुंचकर दोषियों को सलाखों के पीछे भेजती है।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

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रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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