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सिंधु जल समझौते पर भारत ने हेग कोर्ट को क्यों दिखाया कड़ा रुख? जानें पूरा मामला

सिंधु जल समझौते पर भारत ने हेग कोर्ट को क्यों दिखाया कड़ा रुख? जानें पूरा मामला

सिंधु जल समझौते पर भारत और हेग कोर्ट के बीच क्यों बढ़ी तनातनी?

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इस समय एक ऐसी खबर चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जिसने भारत और हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) के संबंधों में एक नया मोड़ ला दिया है। सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर हाल ही में दिए गए फैसलों पर भारत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। नई दिल्ली ने स्पष्ट शब्दों में इस बात पर आपत्ति जताई है कि किस तरह से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के पक्ष में एकतरफा और बिना अधिकार क्षेत्र के फैसले थोपने की कोशिश की जा रही है।

साल 2026 के इस दौर में जहां एक तरफ दुनिया भर के देश कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं भारत ने अपनी जल सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप को सिरे से खारिज कर दिया है। आइए गहराई से समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है, हेग कोर्ट के फैसलों में ऐसा क्या था जिस पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी और इसके भू-राजनीतिक मायने क्या हैं।

क्या है सिंधु जल समझौता और क्यों है यह इतना संवेदनशील?

भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से सिंधु जल समझौता हुआ था। इसे दुनिया के सबसे सफल जल-बंटवारा समझौतों में से एक माना जाता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच कई युद्धों और तनावों के बावजूद यह समझौता लंबे समय तक सुचारू रूप से चलता रहा।

इस समझौते के तहत:

  • पूर्वी नदियाँ (रावी, व्यास, सतलुज): इनका अधिकांश पानी भारत के उपयोग के लिए तय किया गया।
  • पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाव): इनका पानी पाकिस्तान के उपयोग के लिए आरक्षित किया गया, हालांकि भारत को इन नदियों पर कुछ विशेष शर्तों के तहत रन-ऑफ-द-रिवर (Run-of-the-river) पनबिजली परियोजनाओं के विकास की अनुमति दी गई है।

समय के साथ जैसे-जैसे भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पनबिजली परियोजनाओं का निर्माण शुरू किया, वैसे-वैसे पाकिस्तान ने इन पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी। पाकिस्तान की मंशा हमेशा से द्विपक्षीय बातचीत के रास्ते को छोड़कर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के जरिए भारत के विकास कार्यों को बाधित करने की रही है।

हेग कोर्ट का हालिया फैसला और भारत की कड़ी आपत्ति

हाल के दिनों में हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल समझौते से जुड़े एक मामले में ऐसा फैसला सुनाया, जिसे पाकिस्तान के पक्ष में झुका हुआ माना गया। इस फैसले के बाद भारत के विदेश मंत्रालय और संबंधित तकनीकी विशेषज्ञों ने बेहद आक्रामक और स्पष्ट रुख अपनाया है।

भारत का पक्ष शुरू से ही यह रहा है कि:

  • संधि के प्रावधानों के अनुसार, किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए एक तय कानूनी प्रक्रिया (Neutral Expert mechanism) है।
  • हेग कोर्ट का इस मामले में बिना अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) के सुनवाई करना और फैसले देना संधि की मूल आत्मा के खिलाफ है।
  • भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ऐसी किसी भी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करेगा जो द्विपक्षीय तंत्र को दरकिनार करने का प्रयास करती है।

भारत ने क्यों लगाई कड़ी फटकार?

नई दिल्ली ने कूटनीतिक माध्यमों से यह संदेश दे दिया है कि भारत अपनी जल संप्रभुता के मामलों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में आने वाला नहीं है। हेग कोर्ट के रवैये को लेकर भारत ने जिस तरह से अपनी असहमति दर्ज कराई है, उसने यह साबित कर दिया है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के उन फैसलों को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगा जो एकतरफा और तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल करके भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने की पुरानी रणनीति पर काम कर रहा है। लेकिन भारत की तरफ से मिले इस कड़े जवाब ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान की यह चाल अब कामयाब नहीं होने वाली है।

संधि में संशोधन की मांग और भविष्य की दिशा

यह विवाद केवल एक फैसले तक सीमित नहीं है। भारत ने पहले ही पाकिस्तान को सिंधु जल समझौते में संशोधन (Modification of IWT) के लिए औपचारिक नोटिस जारी किया है। भारत का तर्क है कि पिछले छह दशकों में पर्यावरण, जनसंख्या वृद्धि, और पनबिजली तकनीक में भारी बदलाव आए हैं, जिसके कारण इस संधि की समीक्षा करना बेहद जरूरी हो गया है।

पाकिस्तान की तरफ से लगातार असहयोग और अड़ंगेबाजी के कारण भारत के पास अब यह कानूनी और रणनीतिक अधिकार बचता है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाए। हेग कोर्ट के हालिया रुख के बाद भारत का यह तेवर और अधिक मुखर हो गया है।

निष्कर्ष

सिंधु जल समझौते पर हेग कोर्ट के फैसले और उसपर भारत की तीखी प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को एक नई दिशा दे सकती है। यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत अब अपनी जल सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर किसी भी बाहरी या अनधिकृत दबाव को बर्दाश्त नहीं करेगा। आने वाले हफ्तों में इस मोर्चे पर और भी बड़े कूटनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं, जिन पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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