भारतीय इतिहास में कई ऐसी तारीखें दर्ज हैं, जिन्होंने देश की दशा और दिशा दोनों को बदलकर रख दिया। जब भी हम पन्नों को पलटते हैं, तो कुछ तिथियां ऐसी मिलती हैं जो अपने गर्भ में ऐसे व्यक्तित्वों को समेटे होती हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से पूरी दुनिया में अमिट छाप छोड़ी। आज यानी 26 सितंबर 2026 का दिन भी कुछ ऐसा ही खास महत्व रखता है। आज ही के दिन भारतीय राजनीति को एक नई आर्थिक दिशा देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और भारतीय सिनेमा के सदाबहार, एवरग्रीन सुपरस्टार देव आनंद का जन्म हुआ था। राजनीति के गलियारों से लेकर मायानगरी की चकाचौंध तक, इन दोनों दिग्गजों ने अपने-अपने क्षेत्र में जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बना हुआ है।
अर्थव्यवस्था के मसीहा और मौन राजनेता: डॉ. मनमोहन सिंह
भारतीय राजनीति में जब भी कभी दूरदर्शिता, ईमानदारी और सादगी की मिसाल दी जाती है, तो सबसे पहला नाम डॉ. मनमोहन सिंह का आता है। 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में जन्मे मनमोहन सिंह ने अपनी विद्वत्ता के दम पर दुनिया भर में लोहा मनवाया। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले मनमोहन सिंह ने अपनी कड़ी मेहनत और बौद्धिक क्षमता के बल पर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर को छुआ।
उन्होंने कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की और देश के वित्त सचिव, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष जैसे अहम पदों की शोभा बढ़ाई। लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साल 1991 में आया, जब देश एक भयंकर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश दिवालिया होने की कगार पर था।
1991 के आर्थिक सुधार और एलपीजी (LPG) पॉलिसी
उस मुश्किल दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने देश के वित्त मंत्रालय की कमान डॉ. मनमोहन सिंह को सौंपी। एक अर्थशास्त्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने जो कदम उठाए, उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर हमेशा के लिए बदल दी। उन्होंने देश में उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) और वैश्वीकरण (Globalization) यानी एलपीजी पॉलिसी की नींव रखी।
उनके इन साहसिक सुधारों ने बंद अर्थव्यवस्था के दरवाजे दुनिया के लिए खोल दिए, जिसके बाद भारत में विदेशी निवेश आया, तकनीक बढ़ी और देश तरक्की की राह पर तेजी से दौड़ पड़ा। यही कारण है कि आज भी उन्हें 'भारतीय आर्थिक सुधारों के जनक' के रूप में याद किया जाता है। बाद में, साल 2004 से 2014 तक उन्होंने देश के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में देश का सफल नेतृत्व किया। उनके राजनीतिक विरोधी भी उनकी सादगी और अर्थशास्त्र की गहरी समझ का लोहा मानते हैं।
सदाबहार नायक और सिनेमा के 'रोमैंटिक हीरो': देव आनंद
राजनीति के मंच से जरा हटकर अगर हम कला और संस्कृति की दुनिया में कदम रखें, तो 26 सितंबर का यह दिन एक और महान शख्सियत की याद दिलाता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के पहले 'एवरग्रीन स्टार' देव आनंद की। उनका जन्म 26 सितंबर 1923 को पंजाब के शकरगढ़ (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनका असली नाम धरम देव पशोरीमल आनंद था, लेकिन पर्दे पर आते ही वे 'देव आनंद' बन गए और करोड़ों दिलों की धड़कन बन गए।
देव आनंद का अंदाज, उनकी चाल, बात करने का उनका अनूठा तरीका और सिर पर पहनी जाने वाली उनकी कैप, उस दौर के युवाओं के लिए स्टाइल स्टेटमेंट बन गई थी। कहा जाता है कि उनके इतने दीवाने थे कि अदालत ने उनकी 'काला कोट' पहनने वाली छवि पर एक समय के लिए रोक लगा दी थी, क्योंकि लड़कियां उन्हें देखने के लिए छतों से कूद सकती थीं।
मायानगरी में संघर्ष और सफलता की अनकही दास्तान
देव आनंद अपने सपनों को पंख देने के लिए सिर्फ अपनी जेब में कुछ रुपए लेकर मुंबई (तब बॉम्ब) पहुंचे थे। शुरुआती दिनों में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा, यहां तक कि कुछ दिनों तक उन्हें मिलिट्री सेंसर ऑफिस में नौकरी भी करनी पड़ी। लेकिन उनकी जिद और अभिनय के प्रति जुनून ने उन्हें ज्यादा दिनों तक गुमनाम नहीं रहने दिया।
साल 1946 में फिल्म 'हम एक हैं' से अपने करियर की शुरुआत करने वाले देव आनंद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'जिद्दी', 'बाज़ी', 'सीआईडी', 'गाइड', 'ज्वेल थीफ', और 'टैक्सी ड्राइवर' जैसी अनगिनत फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय का जादू बिखेरा। खास तौर पर फिल्म 'गाइड' (1965) में राजू गाइड का उनका किरदार भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे जटिल और बेहतरीन किरदारों में गिना जाता है।
दो अलग दुनिया, पर एक सी प्रेरणा
इतिहास के पन्नों में 26 सितंबर का दिन यह साबित करता है कि अगर इंसान के भीतर लगन, ईमानदारी और अपने काम के प्रति निष्ठा हो, तो वह किसी भी पृष्ठभूमि से आकर इतिहास रच सकता है। डॉ. मनमोहन सिंह ने जहां अपनी बौद्धिक क्षमता और नीतियों से भारत को वैश्विक पटल पर आर्थिक रूप से मजबूत बनाया, वहीं देव आनंद ने अपनी कला और ऊर्जा से भारतीय जनमानस को जीना सिखाया।
आज के समय में जब युवा पीढ़ी शॉर्टकट और तुरंत सफलता की तलाश में रहती है, इन दोनों दिग्गजों का जीवन हमें यह सिखाता है कि लंबी और टिकाऊ सफलता केवल और केवल निरंतर मेहनत, धैर्य और अपने उसूलों के साथ खड़े रहने से ही मिलती है। 26 सितंबर का यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की मिट्टी में ऐसे अनमोल रत्न पैदा हुए हैं, जिन पर हर देशवासी को हमेशा गर्व रहेगा।