झारखंड के धनबाद जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक और लापरवाह तस्वीर सामने आई है। यहां के प्रतिष्ठित शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एसएनएमएमसीएच) में जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) जैसी खतरनाक बीमारी के संदिग्ध मरीज को बिना इलाज के ही मायूस होकर घर लौटना पड़ा। हालात इतने बदतर हो गए कि थक-हार कर परिजनों को अपनी बीमार बच्ची को अस्पताल से चुपचाप घर भगाना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की पोल खोल दी है और स्वास्थ्य विभाग के तमाम दावों की हवा निकाल दी है.
अस्पताल में न डॉक्टर मिले, न दवा: भड़के परिजन
पूरा मामला मंगलवार का है, जब एसएनएमएमसीएच में इलाज के अभाव में अफरा-तफरी मच गई। बाघमारा स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने सोमवार को ही आठ वर्षीय लखी कुमारी को जापानी इंसेफेलाइटिस के संदेह में बेहतर इलाज के लिए एसएनएमएमसीएच रेफर किया था। परिजन उम्मीद लेकर बच्ची को अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की उदासीनता का सामना करना पड़ा।
बच्ची के पिता रंजीत तुरी ने बेहद दर्द और गुस्से के साथ बताया कि अस्पताल में भर्ती कराने के बाद उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। न तो कोई डॉक्टर बच्ची को देखने आया और न ही अस्पताल में कोई दवा उपलब्ध थी। रंजीत तुरी का कहना था, "जब अस्पताल में इलाज की कोई व्यवस्था ही नहीं थी और न ही कोई डॉक्टर देखने वाला था, तो ऐसे में बच्ची को वहां रोककर उसकी जान खतरे में डालने का क्या मतलब था? मजबूरी में हमें अपनी बच्ची को उठाकर घर लाना पड़ा।"
सुबह स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची तो उड़ गए होश
मंगलवार की सुबह जब स्वास्थ्य विभाग की एक विशेष टीम एसएनएमएमसीएच में उस संदिग्ध बच्ची की स्थिति का जायजा लेने पहुंची, तो वे हैरान रह गए। अस्पताल के बेड पर कोई मरीज नहीं था। पूछताछ करने पर पता चला कि परिजन बच्ची को पहले ही अस्पताल से अपने घर ले जा चुके हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सिविल सर्जन के निर्देश पर तत्काल एक मेडिकल टीम को तेलमच्चो गांव भेजा गया। टीम ने बच्ची के घर जाकर उसका रक्त का नमूना (ब्लड सैंपल) लिया है। अब इस नमूने की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि बच्ची वास्तव में जापानी इंसेफेलाइटिस से संक्रमित है या नहीं।
कन्हाई तुरी की मौत के बाद भी नहीं खुली नींद
यह लापरवाही का इकलौता मामला नहीं है। कुछ दिन पहले ही इसी इलाके (तेलमच्चो बस्ती) के रहने वाले 12 वर्षीय कन्हाई तुरी की जापानी इंसेफेलाइटिस से दर्दनाक मौत हो चुकी है। वह बच्चा एसएनएमएमसीएच में पूरे चार दिनों तक भर्ती रहा था, लेकिन सिस्टम की सुस्ती देखिए कि बच्चे की जेई संक्रमण की जांच रिपोर्ट उसकी मौत के एक दिन बाद आई थी। यानी इलाज के दौरान डॉक्टरों को समय पर यह पता ही नहीं चल पाया कि बीमारी असल में है क्या।
कन्हाई तुरी की मौत के बाद स्टेट सर्विलांस की टीम ने तेलमच्चो गांव का दौरा किया था। टीम ने मृतक के परिजनों से मिलकर पूरी जानकारी ली और गांव में फैली गंदगी, सुअर तथा मुर्गी पालन के स्थानों का जायजा लिया। इन तमाम खामियों की रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंपी जानी है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई होती नजर नहीं आ रही है।
100 प्रतिशत टीकाकरण के दावों की खुली पोल
स्वास्थ्य विभाग हमेशा से यह दावा करता आया है कि जिले में जापानी इंसेफेलाइटिस और अन्य गंभीर बीमारियों के खिलाफ 100 प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। लेकिन जब स्वास्थ्य विभाग की टीमें धरातल पर उतरकर गांवों की जांच करती हैं, तो इन दावों की कलई खुल जाती है।
ताजा जांच में सामने आया है कि तेलमच्चो गांव के आसपास लगभग 20 ऐसे बच्चों को चिन्हित किया गया है, जिन्हें जापानी इंसेफेलाइटिस का टीका लगा ही नहीं है। सोचने वाली बात यह है कि जब विभाग को पहले से ही इन क्षेत्रों की संवेदनशीलता का पता था, तो समय रहते इन बच्चों का टीकाकरण क्यों नहीं कराया गया? क्या स्वास्थ्य विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा था?
प्रशासन की सफाई और निर्देश
इस पूरे मामले पर जब धनबाद के सिविल सर्जन डॉ. आलोक विश्वकर्मा से बात की गई, तो उन्होंने अपनी सफाई देते हुए कहा कि बच्ची की निगरानी के लिए मेडिकल टीम को उसके घर भेजा गया है। इसके अलावा, जिन बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस का टीका नहीं लगा है, उन्हें तुरंत टीका लगाने का निर्देश दे दिया गया है। साथ ही एसएनएमएमसीएच प्रबंधन को भी ऐसे मामलों में विशेष सतर्कता बरतने की हिदायत दी गई है।
ग्रामीणों में दहशत का माहौल
लगातार सामने आ रहे मामलों के बाद तेलमच्चो और आसपास के ग्रामीण इलाकों में भारी दहशत का माहौल है। लोगों का कहना है कि अगर स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल इसी तरह अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते रहे, तो गरीब परिवारों के बच्चे यूं ही बिना इलाज के दम तोड़ने को मजबूर हो जाएंगे। अब देखना यह होगा कि इस घटना के बाद जिला प्रशासन और स्वास्थ्य मंत्री इस दिशा में कितनी सख्ती दिखाते हैं, या फिर यह मामला भी कुछ दिनों की कागजी कार्रवाई के बाद ठंडे बस्ते में चला जाएगा।