इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें ऐसी दर्ज होती हैं, जिनका असर सदियों तक पूरी दुनिया की तकदीर और तस्वीर पर साफ दिखाई देता है। ऐसी ही एक बेहद अहम तारीख 22 सितंबर है। आज से सदियों पहले 22 सितंबर के दिन ही उस खामोश साजिश की नींव रखी गई थी, जिसने आगे चलकर भारत को सोने की चिड़िया से एक गुलाम देश में बदल दिया था। यह कहानी सिर्फ एक व्यापारिक कंपनी के गठन की नहीं है, बल्कि उस दूरगामी रणनीति की है जिसने दुनिया के सबसे बड़े उपमहाद्वीप के राजनीतिक भूगोल को हमेशा के लिए उलट-पलट कर रख दिया था।
22 सितंबर 1599: लंदन के फाउंडर हॉल में रची गई थी भारत के शोषण की पृष्ठभूमि
वर्ष 1599 का वह दौर था जब यूरोप में पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने की होड़ मची हुई थी। ब्रिटेन पीछे नहीं रहना चाहता था। ठीक इसी कड़ी में 22 सितंबर 1599 को लंदन के फाउंडर हॉल में ब्रिटेन के 21 दबंग और असरदार कारोबारियों की एक गोपनीय बैठक हुई। इस बैठक का मुख्य एजेंडा भारत और पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए एक नए कॉरपोरेट निकाय यानी कंपनी का गठन करना था।
इसे इतिहासकार ईस्ट इंडिया कंपनी के गठन की दिशा में पहला आधिकारिक और निर्णायक कदम मानते हैं। हालांकि शुरुआत में इस कंपनी का उद्देश्य केवल मसालों और सूती कपड़ों का व्यापार करना था, लेकिन भारत की रियासतों के बीच आपसी फूट, राजनीतिक अस्थिरता और सुदृढ़ केंद्रीय नेतृत्व के अभाव ने इन व्यापारियों की महत्वकांक्षाओं को हवा दे दी। व्यापार करने आए ये विदेशी धीरे-धीरे यहां के शासक बन बैठे और भारत के इतिहास का एक काला अध्याय शुरू हुआ।
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का महाप्रयाण (1539)
22 सितंबर की तारीख केवल राजनीतिक षड्यंत्रों की ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक क्षति की भी गवाह रही है। साल 1539 में इसी दिन सिख पंथ के पहले गुरु और मानवता के महान संदेशवाहक गुरु नानक देव जी ने करतारपुर (वर्तमान पाकिस्तान) में अपनी अंतिम सांस ली थी। गुरु नानक देव जी ने अपने जीवनकाल में समानता, भाईचारे और एक ओंकार का संदेश पूरी दुनिया को दिया। वर्तमान में करतारपुर साहिब का यह पवित्र स्थल सिखों के लिए दुनिया भर में आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है, जिसे डेरा बाबा नानक के नाम से भी जाना जाता है।
आइसक्रीम कोन के आविष्कार से लेकर वैश्विक कूटनीति तक: 22 सितंबर की अन्य बड़ी घटनाएं
कालचक्र के पहिए ने 22 सितंबर को कई ऐसे मोड़ दिए जिन्होंने आधुनिक दुनिया को आकार दिया। आइए नजर डालते हैं इस तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं पर:
- 1903: आधुनिक खानपान की दुनिया से जुड़ा एक बड़ा दिन। अमेरिकी नागरिक इटालो मार्चिओनी को आधिकारिक रूप से 'आइसक्रीम कोन' के लिए पेटेंट प्राप्त हुआ, जिसने गर्मियों के इस लोकप्रिय मिष्ठान खाने का तरीका हमेशा के लिए बदल दिया।
- 1914: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध की विभीषिका तब देखने को मिली जब मद्रास (अब चेन्नई) बंदरगाह पर जर्मनी के खतरनाक युद्धपोत 'इमदेन' ने ताबड़तोड़ बमबारी की।
- 1949: शीत युद्ध के दौर में वैश्विक सामरिक संतुलन तब डगमगा गया जब सोवियत संघ ने अपने पहले परमाणु बम का सफलतापूर्वक परीक्षण करके दुनिया को चौंका दिया।
- 1955: ब्रिटेन में जनसंचार के क्षेत्र में एक नया युग शुरू हुआ जब वहां टेलीविजन प्रसारण का व्यावसायिकरण आधिकारिक रूप से शुरू कर दिया गया।
- 1965: भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे भयंकर युद्ध पर संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के हस्तक्षेप के बाद आखिरकार विराम लगा और युद्धविराम लागू हुआ।
- 1977: फुटबॉल के जादूगर कहे जाने वाले महान खिलाड़ी पेले अपनी कप्तानी में अमेरिका की कॉसमॉस फुटबॉल टीम के साथ दो प्रदर्शनी मैच खेलने के लिए ऐतिहासिक नगरी कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचे। इस दौरे को भारतीय खेल प्रेमी आज भी याद करते हैं।
- 1980: पश्चिम एशिया में अस्थिरता का एक लंबा दौर तब शुरू हुआ जब ईरान और इराक के बीच सीमा विवाद ने विकराल रूप धारण कर लिया और दोनों देशों के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध छिड़ गया।
- 2011: भारतीय क्रिकेट जगत के लिए यह दिन बेहद मनहूस साबित हुआ। देश के महान ऑलराउंडर और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मंसूर अली खान पटौदी ('टाइगर' पटौदी) का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।
- 2018: ईरान के अहवाज शहर में आयोजित एक वार्षिक सैन्य परेड के दौरान आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें महिलाओं और बच्चों समेत 29 लोगों की जान चली गई। इस नृशंस हमले की जिम्मेदारी कुख्यात आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने ली थी।
- 2020: भारतीय रंगमंच और मराठी सिनेमा जगत की जानी-मानी दिग्गज अदाकारा आशालता वाबगांवकर का कोरोना संक्रमण के चलते निधन हो गया, जिससे कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
- 2025: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा बदलाव आया जब फ्रांस ने औपचारिक तौर पर फलस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी, जिससे वैश्विक राजनीति में नए समीकरण उभरकर सामने आए।
इतिहास हमें क्या सिखाता है?
22 सितंबर के इतिहास को अगर गहराई से टटोला जाए तो यह दिन हमें एक तरफ जहां गुरु नानक देव जी के आध्यात्मिक और शांतिपूर्ण मार्ग का स्मरण कराता है, वहीं दूसरी तरफ यह चेताता भी है कि कैसे आपसी कलह और आंतरिक कमजोरियों के कारण बाहरी ताकतों को देश पर हावी होने का मौका मिलता है। लंदन के फाउंडर हॉल में हुई वह छोटी सी बैठक इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि जब इरादे और नीयतें गलत हों, तो उनका परिणाम पूरी सभ्यताओं के पतन का कारण बन सकता है। आज के इस दौर में इन ऐतिहासिक सच्चाइयों से रूबरू होना और उनसे सीख लेना प्रत्येक नागरिक के लिए बेहद आवश्यक है।