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छोटी हिंदी फिल्मों को स्क्रीन न मिलने पर छलका तनिष्ठा चटर्जी का दर्द

छोटी हिंदी फिल्मों को स्क्रीन न मिलने पर छलका तनिष्ठा चटर्जी का दर्द

मुंबई में आयोजित जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान अभिनेत्री तनिष्ठा चटर्जी ने भारतीय सिनेमा में कम बजट की स्वतंत्र और आर्ट फिल्मों के सामने आ रही वितरण संबंधी चुनौतियों पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि बड़े बजट की फिल्मों और पांच करोड़ रुपये से कम में बनने वाली छोटी फिल्मों के लिए एक जैसे पैमाने और वितरण मॉडल नहीं अपनाए जा सकते हैं।

भारतीय फिल्म उद्योग में जहां एक तरफ हजारों करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली ब्लॉकबस्टर फिल्मों की चर्चा जोरों पर रहती है, वहीं दूसरी तरफ स्वतंत्र फिल्मकारों और छोटे बजट की फिल्मों को सिनेमाघरों में पर्याप्त स्क्रीन पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। 'गुलाब गैंग' और 'मानसून शूटआउट' जैसी चर्चित फिल्मों में अपनी कला का जौहर दिखा चुकीं अभिनेत्री तनिष्ठा चटर्जी ने इस व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए देश में फिल्म वितरण के वैकल्पिक और आधुनिक तौर-तरीकों को अपनाए जाने की सख्त आवश्यकता है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चमक रहा है क्षेत्रीय सिनेमा

जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026 के मंच पर विशेष अतिथि के तौर पर शामिल हुईं तनिष्ठा चटर्जी ने दैनिक जागरण से हुई बातचीत में कहा कि मौजूदा दौर में एक तरफ जहां एक हजार से दो हजार करोड़ रुपये तक का बजट रखने वाली फिल्मों की बात होती है, वहीं कम संसाधनों में बनी छोटी फिल्में भी दर्शकों के बीच अपनी मजबूत जगह बना रही हैं। उन्होंने क्षेत्रीय सिनेमा की तारीफ करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से आई छोटी फिल्मों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई है। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विस्तार से भी क्षेत्रीय सिनेमा को एक नई और तेज रफ्तार मिली है।

वितरण के लिए नए और अलग विकल्पों की दरकार

क्षेत्रीय फिल्मों की सफलता के विपरीत हिंदी की इंडिपेंडेंट और कम बजट वाली फिल्मों की राह अभी भी आसान नहीं है। अभिनेत्री ने स्पष्ट किया कि हिंदी सिनेमा में आज भी छोटी फिल्मों को सिनेमाघरों में जगह दिलाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने कहा, "बदलते समय के साथ हमें अपनी फिल्मों के वितरण के ढांचे को बिल्कुल नए नजरिए से देखना होगा। एक हजार करोड़ के भारी-भरकम बजट वाली फिल्म और पांच करोड़ रुपये से भी कम में तैयार हुई फिल्म के वितरण के पैमाने कभी एक जैसे नहीं हो सकते। हमें वितरण के क्षेत्र में अधिक से अधिक विकल्पों की जरूरत है।"

तनिष्ठा ने विदेशी फिल्म बाजारों का उदाहरण देते हुए बताया कि दुनिया के कई अन्य देशों में ऐसे विशेष सिनेमाघर संचालित होते हैं, जो केवल स्वतंत्र और आर्ट फिल्मों के प्रदर्शन के लिए ही समर्पित होते हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जागरण फिल्म फेस्टिवल जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक और कलात्मक मंच इस दिशा में जागरूकता फैलाने और संवाद स्थापित करने में बेहद मददगार साबित हो सकते हैं।

स्वतंत्र सिनेमा से जुड़ा रहा है तनिष्ठा का सफर

तनिष्ठा चटर्जी के अभिनय करियर की बात करें तो उन्होंने मुख्यधारा के साथ-साथ कई हिंदी और अंग्रेजी स्वतंत्र फिल्मों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। उन्होंने अपने अभिनय सफर की शुरुआत वर्ष 2003 में आई फिल्म 'स्वराज' से की थी। इसके बाद उन्होंने 'बस यूं ही', 'शैडोस ऑफ टाइम' और 'बीबर' जैसी कई सराहनीय फिल्मों में काम किया। फिल्म 'देख इंडियन सर्कस' में उनके द्वारा निभाए गए शानदार और प्रभावी किरदार के लिए उन्हें प्रतिष्ठित नेशनल फिल्म अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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