मध्य प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर एक दिलचस्प स्थिति सामने आई है। राज्य में सरकारी शिक्षकों की कुल संख्या डेढ़ लाख के करीब है, लेकिन इस परीक्षा के लिए अब तक केवल 34 हजार 500 आवेदन ही प्राप्त हुए हैं। इनमें भी सरकारी शिक्षकों की संख्या महज 20 हजार के आसपास है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रदेश के गुरुजी इस परीक्षा से दूरी क्यों बना रहे हैं।
परीक्षा की संभावित तिथि और तैयारियां
मध्य प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा का आयोजन 10 दिसंबर 2026 के बाद किए जाने की संभावना है। माध्यमिक शिक्षा मंडल ने इस परीक्षा के संचालन से जुड़ी सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं और इस सिलसिले में शिक्षण संचालनालय को आधिकारिक पत्र भी भेजा जा चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परीक्षा के लिए अब तक कुल 30 हजार से अधिक आवेदन आ चुके हैं, जिनमें से लगभग 20 हजार आवेदन सेवारत सरकारी शिक्षकों के हैं। प्रदेश में कार्यरत शिक्षकों के बड़े आंकड़े को देखते हुए यह संख्या काफी कम मानी जा रही है।
शिक्षक संगठनों का बहिष्कार और कानूनी पेंच
शिक्षकों की ओर से आवेदन न करने के पीछे शिक्षक संगठनों का कड़ा रुख भी एक बड़ा कारण है। विभिन्न शिक्षक संगठनों ने शिक्षकों से टीईटी के फॉर्म न भरने की अपील की है। गुरुजी शिक्षक संघ के प्रदेशाध्यक्ष राकेश पटेल का कहना है कि जब तक इस मामले में कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक शिक्षकों को इस प्रक्रिया से बचना चाहिए।
संगठन के मुताबिक, सरकार की ओर से करीब 75 हजार शिक्षकों के पक्ष में अदालत में याचिका दायर की गई है, क्योंकि ये शिक्षक पूर्व में पहले ही पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं। शिक्षकों का तर्क है कि उनकी मूल नियुक्तियां पहले ही व्यापमं यानी मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल की पारदर्शी चयन प्रक्रिया के माध्यम से हुई थीं। ऐसे में लंबी सेवा दे चुके शिक्षकों पर दोबारा पात्रता परीक्षा पास करने की अनिवार्यता लागू करने को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
उम्र, कार्यभार और नौकरी की अनिश्चितता
सेवारत शिक्षकों के परीक्षा से बचने के पीछे व्यावहारिक और मानसिक दोनों तरह के कारण शामिल हैं। कई शिक्षक ऐसे हैं जो पिछले लंबे समय से शिक्षण कार्य कर रहे हैं और अब अपनी सेवा के अंतिम चरण यानी रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके हैं। इस उम्र में आकर दोबारा परीक्षा की तैयारी करना और प्रतियोगी परीक्षाओं के पैटर्न पर खुद को ढालना उनके लिए कठिन साबित हो रहा है।
इसके अलावा, स्कूलों में पढ़ाने की नियमित जिम्मेदारियों के साथ-साथ जनगणना जैसे अन्य गैर-शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों का दबाव भी शिक्षकों पर बना रहता है। शिक्षकों के मन में यह आशंका भी घर कर गई है कि यदि वे इस परीक्षा को पास नहीं कर पाए, तो उनकी वर्तमान नौकरी, वरिष्ठता या आगामी पदोन्नति पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसी असमंजस और डर के चलते बड़ी संख्या में शिक्षकों ने फिलहाल इस परीक्षा से दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा है।