लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका मतदाता और उसका मताधिकार होता है। जब इसी मताधिकार की पारदर्शिता और सुरक्षा पर सवाल खड़े होने लगें, तो राजनीति का पारा चढ़ना स्वाभाविक है। जामताड़ा से एक बड़ी राजनीतिक खबर सामने आ रही है, जहाँ देश की चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पूर्व सांसद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता फुरकान अंसारी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर बेहद तीखा रुख अपनाया है। उनका साफ कहना है कि जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उठे गंभीर सवाल
शुक्रवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से फुरकान अंसारी ने देश की चुनावी प्रक्रिया पर कई बड़े आरोप लगाए। उनका मुख्य तर्क यह है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया के चलते आम मतदाताओं के मताधिकार सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। अंसारी के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया से जमीनी स्तर पर मतदाताओं के मन में एक गहरी आशंका और असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।
उन्होंने मांग की है कि इस भ्रामक और कथित रूप से त्रुटिपूर्ण एसआईआर प्रक्रिया को बिना किसी देरी के तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने पुरानी और भरोसेमंद मतदाता सूची को तुरंत बहाल करने की पुरजोर वकालत की है, ताकि देश का कोई भी नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रह सके।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधा हमला और मुक़दमे की मांग
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और सनसनीखेज बयान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर आया है। फुरकान अंसारी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सीधे तौर पर मोर्चा खोलते हुए उनके ऊपर देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के विपरीत काम करने का गंभीर आरोप लगाया है।
अंसारी ने प्रेस विज्ञप्ति में यहाँ तक मांग कर डाली कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करते हुए मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए और उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए। उनका आरोप है कि निर्वाचन आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था वर्तमान में केंद्र सरकार के कथित प्रभाव के तहत काम कर रही है, जिससे निष्पक्ष चुनावों की निष्ठा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
सत्तापक्ष पर चुनावी प्रक्रिया के दुरुपयोग का आरोप
कांग्रेस नेता ने देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सत्तापक्ष अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए चुनावी तंत्र का दुरुपयोग कर रहा है। राज्यों में सत्ता हासिल करने के लिए यदि इस प्रकार से लोकतांत्रिक संस्थाओं और नियमों में बदलाव किए जाएंगे, तो देश का संविधान खतरे में पड़ जाएगा।
- संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा: देश के हर नागरिक को संविधान ने वोट देने का जो अधिकार दिया है, उसकी रक्षा करना हर राजनीतिक दल और संस्था का दायित्व है।
- पारदर्शिता की कमी: एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच जो डर और कन्फ्यूजन है, उसे दूर करने के लिए निर्वाचन आयोग को पूरी तरह से पारदर्शी रवैया अपनाना चाहिए था।
- अनियमितताओं की जांच: पूरी चुनावी प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं की एक निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जानी चाहिए ताकि सच सामने आ सके।
व्यापक जनआंदोलन की चेतावनी
माहौल को भांपते हुए फुरकान अंसारी ने सरकार और निर्वाचन व्यवस्था दोनों को ही कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों और हुक्मरानों ने जनता की इन वाजिब और गंभीर मांगों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया, तो यह असंतोष एक बड़े और व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
उन्होंने देश के नागरिकों और कार्यकर्ताओं से भी अपील की है कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहें। आने वाले दिनों में यह मुद्दा झारखंड ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी बहस का विषय बन सकता है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर देश की सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था यानी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया गया है।
फिलहाल, देखना यह होगा कि निर्वाचन आयोग या सरकार की तरफ से इस तीखे बयान पर क्या प्रतिक्रिया सामने आती है, और क्या एसआईआर को लेकर उठे इन सवालों का कोई संतोषजनक समाधान निकल पाता है या नहीं।