सनातन संस्कृति और मोक्ष की नगरी काशी इन दिनों प्रकृति के एक विकराल रूप से रूबरू हो रही है। मां गंगा का जलस्तर लगातार खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है, जिसके चलते वाराणसी के सभी 84 घाट जलमग्न हो चुके हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि मोक्ष के द्वार कहे जाने वाले मणिकर्णिका घाट पर अब अंतिम संस्कार जमीन पर नहीं, बल्कि छतों पर करने की मजबूरी आन पड़ी है।
साल 2026 के सितंबर महीने की इस ताजा बाढ़ ने पिछले कई सालों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। गंगा के साथ-साथ वरुणा नदी भी भयंकर उफान पर है, जिससे काशी के निचले इलाकों में त्राहिमाम मचा हुआ है। आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है और लोगों की सांसे अटकी हुई हैं।मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर पानी का तांडव
वाराणसी के प्रमुख श्मशान घाट—मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट—पूरी तरह से बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं। पानी का स्तर इतना बढ़ गया है कि मणिकर्णिका घाट का मुख्य चबूतरा पूरी तरह डूब चुका है। मजबूरी में अब शोक संतप्त परिजनों को अपने स्वजनों का अंतिम संस्कार मजबूरन छतों पर करना पड़ रहा है। दृश्य बेहद हृदयविदारक हैं, जहां पानी के बीच तैरती चिताएं और आसमान की तरफ उठती लपटें इस आपदा की भयावहता को बयां कर रही हैं।
दोनों ही घाटों की ओर जाने वाली संकरी गलियों में कई फीट पानी भर चुका है। स्थिति यह है कि घाटों का आपस में और शहर के मुख्य मार्गों से संपर्क पूरी तरह टूट चुका है। आवागमन के लिए अब केवल नावों का ही सहारा बचा है। जल पुलिस थाने में भी पानी घुस जाने के कारण राहत और बचाव कार्यों में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
वरुणा नदी का उफान और 30 हजार घरों पर संकट
गंगा के अलावा वरुणा नदी भी उग्र रूप धारण कर चुकी है। वरुणा के किनारे बसे सरैया, नक्खी घाट, शैलपुत्री और शलारपुर समेत दर्जनों इलाकों के करीब 30 हजार घरों के आसपास बाढ़ का पानी पहुंच चुका है। हालात इतने गंभीर हैं कि वरुणा क्षेत्र के लगभग 10 हजार परिवारों को अपने आशियाने खाली करके सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ सकती है।
प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है, लेकिन स्थानीय लोगों का गुस्सा और चिंता साफ झलक रही है। पानी गलियों के अंदर इस कदर घुस चुका है कि अब सड़कों पर पैदल चलना नामुमकिन हो गया है और लोग गलियों में नावों के जरिए आवाजाही कर रहे हैं।
व्यापार ठप, नावों के पहिए थमे
काशी की अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी इस बाढ़ की गहरी मार पड़ी है। शहर का मुख्य व्यापारिक और पर्यटन केंद्र माने जाने वाले अस्सी घाट के दुकानदारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। पानी को दुकानों में घुसने से रोकने के लिए दुकानदार दुकानों के आगे ईंट-पत्थर की दीवारें और बोरियां लगा रहे हैं।
नाविक समुदाय की आजीविका पूरी तरह से ठप हो गई है। स्थानीय नाविक पवन ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया, "गंगा में उफान और सुरक्षा कारणों से प्रशासन ने नावों के संचालन पर रोक लगा दी है। पर्यटकों का आना-जाना बंद है। नाव ही हमारे घर का चूल्हा जलाने का इकलौता जरिया थी, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि परिवार चलाना बेहद मुश्किल हो गया है।"
स्थानीय लोगों का दर्द: 'हर साल की है यह कहानी'
प्रभावित इलाकों के लोगों का कहना है कि बाढ़ की यह विभीषिका उनके लिए कोई नई नहीं है। हर साल बरसात के मौसम में उन्हें इस त्रासदी का सामना करना पड़ता है। लेकिन प्रशासन की ओर से स्थायी समाधान न मिलने के कारण उनकी परेशानियां हर साल और बढ़ जाती हैं।
स्थानीय निवासी रमेश कुमार ने बताया कि जब बाढ़ आती है, तो मजबूरन घर छोड़कर सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर जाना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ा डर घर छोड़ने के बाद चोरी और लूटपाट का बना रहता है। लोग अपना सब कुछ छोड़कर अनजान जगहों पर शरण लेने को विवश हैं, जबकि उनकी गृहस्थी पानी में डूब रही होती है।
प्रशासन की मुस्तैदी और राहत कार्य
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन और एनडीआरएफ (NDRF) की टीमें लगातार प्रभावित क्षेत्रों में गश्त कर रही हैं। राहत शिविरों की स्थापना की जा रही है ताकि विस्थापित परिवारों को भोजन और चिकित्सा सुविधाएं समय पर मिल सकें। हालांकि, जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि ने राहत कार्यों को भी चुनौती दे दी है।
काशी के इतिहास में बाढ़ का यह रूप एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए हमारी तैयारियां कितनी पुख्ता हैं। फिलहाल, काशीवासी मां गंगा के शांत होने और जलस्तर के घटने की प्रार्थना कर रहे हैं, ताकि एक बार फिर से सामान्य जीवन पटري पर लौट सके।