सांस्कृतिक नगरी मुंबई की व्यस्तता के बीच हाल ही में एक ऐसी शाम गुजरी, जिसने संगीतप्रेमियों को भारतीय शास्त्रीय परंपरा की मूल जड़ों से जोड़ दिया। मौका था कला और संस्कृति को समर्पित अग्रणी संस्था 'समन्वय' द्वारा आयोजित भव्य 'तृतीय नंदोत्सव' का। मुंबई के प्रतिष्ठित भारतीय विद्या भवन में आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम ने शहर के सांस्कृतिक गलियारों में एक नई ऊर्जा और मिठास भर दी। इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसने आधुनिकता की दौड़ से दूर, हमारी प्राचीन कला, ध्रुपद गायन और हवेली संगीत को मंच प्रदान किया, जिसने हर सुनने वाले के दिल को छू लिया।
गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति से चमकी शाम
इस भव्य सांस्कृतिक संध्या की गरिमा बढ़ाने के लिए देश के जाने-माने उद्योगपति, कला जगत के दिग्गज और समाज के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियां मौजूद थीं। कार्यक्रम में मुख्य रूप से मशहूर और मंजे हुए अभिनेता टीकू तलसानिया ने अपनी उपस्थिति से चार चांद लगाए। इसके अलावा, नंदोत्सव की नींव रखने वाली प्रख्यात विचारक, समाजसेवी एवं कवयित्री डॉ. मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा ने भी शिरकत की और आयोजकों की इस अनूठी पहल की भूरी-भरी प्रशंसा की।
समारोह में समाज सेवी उद्योगपति सुरेश चतुर्वेदी, उद्योगपति अभिषेक चतुर्वेदी, कार्यक्रम के सूत्रधार अशोक मेहता (लालू भाई), रूपा बावरी, घनश्याम एवं श्रीमती रमा पहेलाजानी, अनिल त्रिवेदी, श्रीमती अश्विनी जैन, जयेश भाई दंड, और प्रसिद्ध कॉलमिस्ट अलाईशा खान जैसे गणमान्य लोग विशेष रूप से उपस्थित रहे। इन सभी दिग्गजों ने न केवल कार्यक्रम का आनंद लिया, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के इस प्रयास को सराहनीय बताया।
मधुराष्टकम् और भरतनाट्यम की त्रिवेणी से हुआ आगाज
कार्यक्रम का शुभारंभ बेहद आध्यात्मिक और मंत्रमुग्ध करने वाले अंदाज में हुआ। मंच पर उपस्थित 20 प्रतिभाशाली कलाकारों ने एक स्वर में मधुर 'मधुराष्टकम्' का गायन किया। इस दिव्य और कर्णप्रिय गायन के साथ ही विदुषी मिनीयाज्ञिक कांटावाला ने बेहद खूबसूरत और भावपूर्ण भरतनाट्यम नृत्य प्रस्तुत किया। संगीत की धुनों पर नृत्यांगना के सधे हुए कदमों और मुद्राओं ने दर्शकों को मानो किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया। इस अद्भुत समन्वय ने सभागार में मौजूद हर शख्स को भावविभोर कर दिया।
पंडित सुखदेव चतुर्वेदी के 'चौमुखी गायन' ने मोहा सबका मन
इस संध्या का सबसे बड़ा और मुख्य आकर्षण देश के प्रख्यात ध्रुपद गायक पंडित सुखदेव चतुर्वेदी की मनमोहक प्रस्तुति रही। उनके साथ मंच पर लगभग 40 कलाकारों का बड़ा दल मौजूद था, जिन्होंने ध्रुपद और हवेली संगीत की एक अद्भूत छटा बिखेरी। पंडित सुखदेव चतुर्वेदी ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं और उनके जीवन चरित्र पर आधारित 'हवेली संगीत' के पदों और भक्तिपूर्ण भजनों की ऐसी अविरल धारा बहाई कि पूरा सभागार कृष्णमय हो गया।
उनके प्रभावशाली और विशिष्ट 'चौमुखी गायन' ने वहां मौजूद संगीत प्रेमियों को पूरी तरह से मंत्रमुग्ध कर दिया। ध्रुपद गायन की जो गहराई और गंभीरता इस प्रस्तुति में देखने को मिली, वह आज के दौर में बेहद दुर्लभ है। सुर और ताल के इस संगम ने श्रोताओं को भक्ति रस में पूरी तरह से सराबोर कर दिया।
प्रतिभाशाली शिष्यों और बाल कलाकारों का शानदार योगदान
गुरु पंडित सुखदेव चतुर्वेदी के साथ मंच पर सुर से सुर मिलाने में उनकी युवा और प्रतिभावान शिष्य मंडली ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इस मंडली में रश्मि शुक्ला, नेहल गांधी, अधिष्ठा, वरुणा, अभिषेक, पौरुषी, पीहू, पंकज और शेखर जैसे नाम शामिल रहे। इन युवा कलाकारों ने अपनी सुरीली और सधी हुई प्रस्तुतियों से ध्रुपद गायन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, जिसे देखकर यह विश्वास पुख्ता हो गया कि हमारी शास्त्रीय संगीत परंपरा सुरक्षित हाथों में है।
इसके साथ ही, कार्यक्रम में बाल कलाकार अमानी चतुर्वेदी ने 'छोटी गोपी' के रूप में अपनी बेहद मनमोहक और नटखट प्रस्तुति से सभी का दिल जीत लिया। बच्चों की इस कलाकारी ने दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान ला दी और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा।
सहज संचालन और भव्य आतिथ्य
इस पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में पिरोने का काम श्रीमती जानवी जोशी ने किया। उन्होंने अपनी सहज और सुसंस्कृत शैली में बेहद सुंदर मंच संचालन (एंकरिंग) किया, जिससे दर्शक पूरे समय कार्यक्रम से जुड़े रहे। 'समन्वय' संस्था की ओर से श्री लोकेश चतुर्वेदी एवं आदित्य चतुर्वेदी ने आगे आकर कार्यक्रम में पधारे सभी विशिष्ट अतिथियों का गर्मजोशी से भावभीना स्वागत किया।
कार्यक्रम के अंत में संस्था के मुख्य आयोजक गगन चतुर्वेदी एवं अधिष्टा चतुर्वेदी ने इस सांस्कृतिक संध्या को ऐतिहासिक और सफल बनाने के लिए सभी कलाकारों, अतिथियों और दूर-दूर से आए दर्शकों का हार्दिक आभार व्यक्त किया और धन्यवाद ज्ञापन किया। इस सफल आयोजन के प्रचार-प्रसार में निपम आशाद ने अपनी पूरी टीम के साथ महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।
निष्कर्ष: संस्कृति को सहेजने की एक अनूठी पहल
मुंबई जैसे महानगर में, जहां लोग आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, 'समन्वय' संस्था द्वारा आयोजित यह 'तृतीय नंदोत्सव' एक सुखद अहसास कराता है। इस तरह के आयोजन न केवल हमारी प्राचीन शास्त्रीय कलाओं, ध्रुपद और हवेली संगीत को जीवित रखते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी समृद्ध संस्कृति से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बनते हैं। पंडित सुखदेव चतुर्वेदी की गूंजती आवाज और हवेली संगीत की मिठास लंबे समय तक मुंबई के संगीत प्रेमियों के दिलों और जेहन में ताजा रहेगी।