वाराणसी में मॉनसून की सक्रियता और लगातार हो रही बारिश ने शहर के विकास दावों की पोल खोलकर रख दी है। प्रशासनिक स्तर पर भले ही शहर को स्मार्ट और आधुनिक बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर पानी फेरती नजर आ रही है। ताजा मामला सत्ता के गलियारों से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और विधान परिषद सदस्य (MLC) हंसराज विश्वकर्मा के वार्ड में पिछले करीब दो सप्ताह से जलभराव की गंभीर समस्या बनी हुई है। इतने दिन बीत जाने के बाद भी पानी की निकासी न होना प्रशासन और नगर निगम की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है.
दो हफ्ते से जलभराव, नारकीय जीवन जीने को मजबूर स्थानीय लोग
मिली जानकारी के अनुसार, मंत्री के अपने वार्ड के कई हिस्सों में पिछले चौदह दिनों से बारिश का गंदा पानी सड़कों और गलियों में जमा है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि लोगों का घरों से बाहर निकलना मुहाल हो गया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जलभराव की यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि हर हल्की या भारी बारिश के बाद यहां के बाशिंदों को इस आपदा से जूझना पड़ता है। लेकिन इस बार स्थिति तब और असहनीय हो गई जब दो हफ्ते बीत जाने के बावजूद पानी की एक बूंद भी कम नहीं हुई, बल्कि आसपास के नालियों का ओवरफ्लो पानी भी सड़कों पर फैलने लगा है.
पैदल चलने वाले राहगीरों के लिए तो यह रास्ता किसी संघर्ष से कम नहीं है। बच्चों का स्कूल जाना बंद सा हो गया है और बुजुर्ग घरों में कैद रहने को मजबूर हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों को पानी के अंदर छिपे गड्ढों का अंदाजा न होने के कारण आए दिन दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है। पानी के लंबे समय तक खड़े रहने के कारण अब उसमें से दुर्गंध भी आने लगी है, जिससे स्थानीय स्तर पर महामारी फैलने का खतरा मंडराने लगा है.
स्मार्ट सिटी के दावों पर उठे गंभीर सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को देश के चुनिंदा स्मार्ट शहरों में गिना जाता है। शहर के सौंदर्यीकरण और बुनियादी ढांचा सुधारने के लिए अरबों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। ऐसे में, एक वीआईपी और खुद सरकार के मंत्री के वार्ड में दो सप्ताह तक जलभराव की स्थिति का बने रहना पूरे स्मार्ट सिटी मॉडल की पोल खोलता है। सवाल यह उठता है कि जब वीआईपी इलाकों और रसूखदार जनप्रतिनिधियों के वार्डों का यह हाल है, तो शहर के दूर-दराज के इलाकों या पिछड़ी बस्तियों में क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.
क्षेत्रवासियों का कहना है कि नगर निगम के अधिकारी कागजों पर तो शहर को जलभराव मुक्त दिखाने के तमाम दावे करते हैं, लेकिन ज़मीन पर कोई ठोस और स्थायी इंजीनियरिंग सॉल्यूशन नजर नहीं आता। अगर मानसून से पहले नालियों और सीवर लाइनों की सही तरीके से डी-सिल्टिंग (सफाई) की जाती, तो शायद आज यह नौबत न आती.
प्रशासन की सुस्ती से बढ़ रहा आक्रोश
स्थानीय लोगों का गुस्सा अब फूटने लगा है। जनता का आरोप है कि समस्या की पुकार कई बार स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाई गई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके पर आकर हालात का जायजा लेना जरूरी नहीं समझा। स्थानीय निवासियों का कहना है कि क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है, तब जाकर नगर निगम की नींद खुलेगी?
- सड़कों पर दो सप्ताह से जमा है गंदा और बदबूदार पानी।
- मच्छरों के पनपने से मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का बढ़ा खतरा।
- व्यापारियों के धंधे पर भी पड़ रहा है बुरा असर, ग्राहक दुकान तक नहीं पहुंच पा रहे।
- प्रशासन और नगर निगम के अधिकारियों की तरफ से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं।
तत्काल स्थायी समाधान की मांग
परेशानहाल जनता ने अब आर-पार की मांग करते हुए प्रशासन को चेताया है। क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि नगर निगम तुरंत प्रभाव से मौके पर हाई-पावर पंप लगाए और जमा हुए पानी की निकासी सुनिश्चित करे। इसके साथ ही, नालियों के अवरोधों को दूर करने के लिए विशेष सफाई अभियान चलाया जाए ताकि आने वाले दिनों में अगर फिर से बारिश होती है, तो लोगों को इस तरह के नरक जैसे हालात का सामना न करना पड़े।
जनता का यह भी कहना है कि केवल मौखिक बयानों या कागजी दौरों से काम नहीं चलेगा, बल्कि ज़मीन पर उतरकर जल निकासी के लिए एक मजबूत और स्थायी ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण किया जाना चाहिए। अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद क्या प्रशासन और संबंधित मंत्री सुस्त पड़ी मशीनरी को जगा पाते हैं या फिर वाराणसी की जनता को यूं ही जलभराव के बीच अपनी किस्मत के भरोसे जीना पड़ेगा।