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उत्तराखंड के 'हरदा': ब्लॉक स्तर से शुरू किया सफर, 3 बार संभाली सीएम की कमान

उत्तराखंड के 'हरदा': ब्लॉक स्तर से शुरू किया सफर, 3 बार संभाली सीएम की कमान

भारतीय राजनीति के गलियारों में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनका नाम सुनते ही एक खास इलाके का पूरा राजनीतिक इतिहास आंखों के सामने घूमने लगता है। उत्तराखंड की राजनीति की जब भी बात होगी, तो एक ऐसा नाम जो हर जुबान पर सबसे पहले आता है, वह है हरीश रावत का। जिन्हें उत्तराखंड की जनता और उनके समर्थक प्यार से 'हरदा' पुकारते हैं, उनका यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं है। अल्मोड़ा के एक छोटे से गांव से निकलकर देश की राजधानी के सत्ता के गलियारों तक का यह सफर उनके कड़े संघर्ष, अटूट राजनीतिक सूझबूझ और कभी हार न मानने वाले जज्बे की गवाही देता है। साल 2026 में भी उत्तराखंड की सियासी फिजाओं में हरदा का कद और उनका अनुभव आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना दशकों पहले हुआ करता था। आइए, आज तफसील से जानते हैं हरीश रावत के शुरुआती जीवन, संघर्ष और उनके उस सियासी सफर के बारे में जिसने उन्हें पहाड़ी राज्य का सबसे बड़ा कांग्रेस नेता बना दिया।

अल्मोड़ा की वादियों से निकला एक जुझारू युवा

हरीश रावत की जड़ों की तलाश की जाए तो हमें उत्तराखंड के खूबसूरत जिले अल्मोड़ा के एक सुदूर गांव 'मोहनरी' पहुंचना होगा। 27 अप्रैल 1948 को एक साधारण कुमाऊंनी राजपूत परिवार में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता राजेंद्र सिंह रावत और माता देवकी देवी ने अपने बच्चों को उच्च संस्कारों के साथ-साथ शिक्षा का महत्व भी समझाया। हरीश रावत की शुरुआती पढ़ाई लिखाई गवर्नमेंट इंटर कॉलेज चौनलिया से पूरी हुई। इसके बाद, उच्च शिक्षा की ललक उन्हें उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ले आई। उस दौर में जब आज का उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का ही एक अहम हिस्सा हुआ करता था, तब हरीश रावत ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से कला में स्नातक (BA) और उसके बाद वकालत की डिग्री यानी एलएलबी (LLB) हासिल की।

कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पास एक पारंपरिक करियर चुनने का विकल्प था, लेकिन उनके भीतर सुलग रही सामाजिक बदलाव की आग उन्हें राजनीति और जनसेवा की ओर खींच लाई। उन्होंने अपनी वैवाहिक जीवन की शुरुआत रेणुका रावत के साथ की। उनके परिवार में तीन संतानें हैं। उनके बेटे आनंद सिंह रावत ने भी राजनीति की राह चुनी है, जबकि उनकी बेटियां अनुपमा रावत और आरती रावत अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं। अनुपमा रावत ने आईटी सेक्टर के साथ-साथ सक्रिय राजनीति में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई है और जनता के बीच अपनी पैठ मजबूत की है।

जब दिग्गज मुरली मनोहर जोशी को दी करारी मात

किसी भी राजनेता के करियर में एक ऐसा टर्निंग पॉइंट आता है, जो उसके भविष्य की दिशा तय कर देता है। हरीश रावत के जीवन में वह ऐतिहासिक क्षण साल 1980 में आया। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बेहद जमीनी स्तर यानी ब्लॉक स्तर से की थी। युवा कांग्रेस के साथ जुड़कर उन्होंने संगठन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत की। 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने उन्हें अल्मोड़ा लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा। उनके सामने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बेहद कद्दावर और दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी थे।

राजनीतिक पंडितों का मानना था कि एक युवा नेता के लिए मुरली मनोहर जोशी जैसे अनुभवी और भारी-भरकम कद वाले नेता को हराना लगभग नामुमकिन होगा। लेकिन हरीश रावत के इरादे कुछ और ही थे। उन्होंने चुनाव में ऐसा करिश्मा दिखाया कि दिग्गजों के होश उड़ गए। हरीश रावत ने मुरली मनोहर जोशी को शिकस्त देकर संसद का दरवाजा खटखटाया। यह जीत सिर्फ एक सीट की जीत नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक नए सियासी सितारे के उदय का ऐलान था। उनका यह विजय रथ यहीं नहीं रुका। इसके बाद 1984 के आम चुनावों में उन्होंने एक बार फिर से मुरली मनोहर जोशी को धूल चटाई और संसद पहुंचे। इसके बाद 1989 में भी उन्होंने अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा और तीसरी बार लोकसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। संसद में उनके भाषणों और जनता के मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाने की शैली ने उन्हें दिल्ली के राजनीतिक हलकों में एक दमदार नेता के रूप में स्थापित कर दिया।

मंत्रिमंडल में बढ़ता कद और केंद्रीय जिम्मेदारियांसंसद में अपनी आक्रामक और मुखर शैली के दम पर हरीश रावत ने केंद्र सरकार में भी तेजी से सीढ़ियां चढ़ीं। उन्हें केंद्र में श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। जैसे-जैसे समय बीतता गया, पार्टी संगठन और सरकार दोनों में उनका कद लगातार बढ़ता चला गया। आइए उनके राजनीतिक सफर के कुछ प्रमुख पड़ावों पर नजर डालते हैं:

  • 1990: उन्हें देश का संचार मंत्री बनाया गया, जो उनके प्रशासनिक अनुभव का एक बड़ा मील का पत्थर था।
  • मार्च 1990: उन्हें महत्वपूर्ण राजभाषा कमेटी का सदस्य नियुक्त किया गया।
  • 1992: अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर डाली गई।
  • 1999: संसद की हाउस कमेटी के सदस्य के रूप में उन्होंने कार्य किया।
  • 2001: उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने राज्य में पार्टी संगठन को मजबूत करने का बीड़ा उठाया।
  • 2002: वह देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा के लिए चुने गए।
  • 2009: केंद्र की सत्ता में वापसी के बाद उन्हें एक बार फिर लेबर एंड एंप्लॉयमेंट (श्रम एवं रोजगार) विभाग में राज्य मंत्री बनाया गया।
  • 2011: उन्हें कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण इंडस्ट्री विभाग के साथ-साथ संसदीय कार्य मंत्री का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया।
  • 2012 से 2014: केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहते हुए उन्होंने जल संसाधन मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जल नीतियों और परियोजनाओं की देखरेख की।

उत्तराखंड की राजनीति के शिखर पर और 'हरदा' का मुख्यमंत्री कार्यकाल

भले ही हरीश रावत ने अपनी राजनीतिक पहचान केंद्र की राजनीति से बनाई हो, लेकिन उनका दिल हमेशा अपनी मातृभूमि उत्तराखंड के लिए धड़कता रहा। जब अलग राज्य के रूप में उत्तराखंड का गठन हुआ, तो स्थानीय राजनीति में उनकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। राज्य के गठन के बाद के शुरुआती दशकों में कांग्रेस पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद के लिए कई दिग्गज दावेदार थे, लेकिन अंततः पार्टी आलाकमान ने हरीश रावत के अनुभव और जनसमर्थन पर भरोसा जताया।

उनके मुख्यमंत्री बनने का सफर काफी नाटकीय और उतार-चढ़ाव भरा रहा:

  • पहली बार सीएम (1 फरवरी 2014): हरीश रावत ने पहली बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और राज्य की बागडोर अपने हाथों में संभाली। उन्होंने पहाड़ी राज्य के विकास के लिए कई नई योजनाओं की रूपरेखा तैयार की।
  • दूसरी बार सीएम (1 अप्रैल 2016): राजनीतिक अस्थिरता और दल-बदल के दौर के बीच, एक बार फिर परिस्थितियों ने उन्हें राज्य की कमान सौंपी।
  • तीसरी बार सीएम (11 मई 2016 से 18 मार्च 2017): कानूनी और राजनीतिक लड़ाइयों के बाद एक बार फिर उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। वह इस पद पर 18 मार्च 2017 तक बने रहे।

हालांकि, हरीश रावत अपने तीनों ही कार्यकालों में पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। उत्तराखंड की भू-राजनीतिक परिस्थितियां, दलबदल कानून के पेंच और पार्टी के भीतर की आंतरिक उठापटक ने अक्सर उनकी सरकार के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कीं। इसके बावजूद, जनता के बीच उनकी लोकप्रियता पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा। लोग आज भी उन्हें 'हरदा' के नाम से संबोधित करते हैं, जो उनके और आम जनता के बीच की अनौपचारिक और आत्मीय जुड़ाव का प्रतीक है।

निष्कर्ष: राजनीति में आज भी प्रासंगिक हैं हरदा

युवा कांग्रेस के एक आम कार्यकर्ता से लेकर देश के केंद्रीय मंत्री और तीन बार एक राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का यह सफर तय करना किसी भी राजनेता के लिए आसान नहीं होता। हरीश रावत ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बड़ी लड़ाइयां लड़ी हैं, कई बड़े राजनीतिक झटके भी झेले हैं, लेकिन उनका राजनीतिक वजूद आज भी उत्तराखंड के राजनीतिक पटल पर अमिट है। उनकी कार्यशैली, हर उम्र के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित करने की कला और जमीन से जुड़ाव उन्हें आज भी कांग्रेस पार्टी का एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। आने वाले समय में उत्तराखंड की सियासत करवटें चाहे जो भी ले, लेकिन 'हरदा' का राजनीतिक इतिहास हमेशा भारतीय लोकतंत्र के पन्नों में एक मिसाल के तौर पर दर्ज रहेगा।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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