उत्तराखंड के गठन में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण की प्रक्रिया को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ताजा अपडेट सामने आ रहा है। राज्य के पर्वतीय जिलों में से एक नई टिहरी से इस प्रक्रिया के तहत एक बड़ी खबर जिला प्रशासन की बैठक के बाद बाहर आई है। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में कई महीनों से अटके मामलों पर अंतिम मुहर लगाने की कोशिश की गई है, जिससे एक बार फिर उन तमाम संघर्षशील चेहरों और उनके परिवारों की उम्मीदें जाग उठी हैं जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए लंबा संघर्ष किया था।
जिलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई अहम बैठक
बुधवार को नई टिहरी के जिला सभागार में एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक की अध्यक्षता जिला कलेक्टर नितिका खंडेलवाल ने खुद की। बैठक का मुख्य एजेंडा राज्य आंदोलनकारियों के रूप में चिन्हीकरण के लिए प्राप्त हुए नए आवेदनों की गहन समीक्षा करना और उनकी पात्रता का सत्यापन करना था। प्रशासन की इस विशेष समिति के सामने कुल 28 आवेदन विचार के लिए रखे गए थे, जिन पर बिंदुवार चर्चा की गई।
राज्य आंदोलनकारी का दर्जा मिलना उन तमाम लोगों के लिए बेहद भावुक और गर्व का विषय होता है जिन्होंने उत्तराखंड राज्य के लिए अपनी जवानी और ऊर्जा को होम कर दिया था। यही वजह है कि जब भी प्रशासन स्तर पर चिन्हीकरण की सूचियां जारी होती हैं, तो सबकी निगाहें इसी बात पर टिकी होती हैं कि किसे इस सूची में स्थान मिला और किसका पत्ता कटा।
किसे मिली सूची में जगह? जानिए नाम
लंबी जांच-पड़ताल और कागजी दस्तावेजों के मिलान के बाद समिति ने कुल 28 में से 2 आवेदनों को पूरी तरह से वैध पाया और उन्हें राज्य आंदोलनकारी के रूप में चिन्हित करने की मंजूरी दे दी। स्वीकृत किए गए इन दोनों नामों में:
- ओम प्रकाश भट्ट: जो कि विधि विहार, नई टिहरी के निवासी हैं।
- स्व. तोता सिंह: जो कि ग्राम कुमालीगांव के रहने वाले थे।
इन दोनों के आवेदनों को शासन द्वारा तय किए गए तमाम मानकों और दिशा-निर्देशों के अनुरूप सही पाया गया, जिसके बाद समिति ने इनके चिन्हीकरण पर अपनी मुहर लगा दी। स्वर्गीय तोता सिंह के मामले में उनके परिजनों के लिए यह क्षण काफी संतोषजनक रहा, जिन्हें आखिरकार उनके संघर्ष की आधिकारिक मान्यता मिलने की राह खुली है।
इन 8 लोगों के आवेदन हुए सीधे तौर पर खारिज
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जहां कुछ लोगों के चेहरे पर इस फैसले से खुशी आई, वहीं दूसरी ओर कुछ आवेदकों को निराशा भी हाथ लगी है। समिति ने शासनादेश में निर्धारित किए गए पात्रता मानकों की कड़ी जांच की। जांच के दौरान यह पाया गया कि कुछ आवेदन तय मानदंडों पर खरे नहीं उतर रहे हैं।
मानक पूरे न होने के कारण कुल 8 आवेदनों को सिरे से निरस्त कर दिया गया है। इन निरस्त किए गए मामलों में मुख्य रूप से जौनपुर ब्लॉक के धनोल्टी निवासी जगत सिंह, वीरेंद्र सिंह और नई टिहरी के उस्मान जैसे नाम शामिल हैं। प्रशासन का साफ कहना है कि शासन के नियमों और शर्तों के दायरे से बाहर के किसी भी आवेदन को स्वीकार करना संभव नहीं है, और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह कड़ा कदम उठाना आवश्यक था।
18 लंबित मामलों पर आगामी बैठक में होगा विचार
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान 18 ऐसे आवेदन भी सामने आए जिन्हें तुरंत खारिज तो नहीं किया गया, लेकिन उनके दस्तावेजों में कुछ कमियां या अपूर्ण जानकारियां पाई गईं। इन सभी मामलों को फिलहाल 'पेंडिंग' या 'लंबित' श्रेणी में रखा गया है।
इन लंबित प्रकरणों में प्रमुख रूप से कीर्तिनगर ब्लॉक के ग्राम बड़ोन गांव निवासी सुंदरमणि, नई टिहरी के विक्रम सिंह बिष्ट और विद्या नेगी के नाम शामिल हैं। समिति ने यह निर्णय लिया है कि इन सभी 18 मामलों से जुड़े लोगों को अपने आवश्यक अभिलेख और पुख्ता जानकारियां जमा करने का एक और मौका दिया जाए। जैसे ही ये दस्तावेज पूरे हो जाएंगे, इन्हें आगामी बैठक में पुनर्विचार के लिए दोबारा प्रस्तुत किया जाएगा।
बैठक में मौजूद रहे प्रशासनिक अधिकारी
इस पूरी चयन और चिन्हीकरण प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न कराने के लिए जिला प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी बैठक में मौजूद रहे। बैठक में आईएएस प्रशिक्षु ज्योति, अपर जिलाधिकारी (एडीएम) शैलेंद्र सिंह नेगी, एसीएमओ डॉ. अमलेश कुमार, और एसआई शांता सजवाण ने अपनी अहम भूमिका निभाई।
इसके साथ ही, राज्य आंदोलनकारी समिति के अधिकृत सदस्य भी इस बैठक का हिस्सा रहे, जिनमें लोकेंद्र दत्त जोशी, मुरारी लाल खंडवाल, देवी सिंह पंवार और पुरुषोत्तम सिंह प्रमुख रूप से शामिल थे। इन सभी सदस्यों ने अपने-अपने अनुभवों और तर्कों के आधार पर आवेदनों की सत्यता को परखने में प्रशासन का सहयोग किया।
उत्तराखंड आंदोलनकारियों के सामने चुनौतियां और उम्मीदें
आज भी राज्य के कई कोनों से ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जो किसी न किसी कारणवश अभी तक आधिकारिक रूप से चिन्हित नहीं हो पाए हैं। दस्तावेजों की कमी, समय पर आवेदन न कर पाना या नियमों की पेचीदगियां इन लोगों के लिए सबसे बड़ी बाधा रही हैं। हालांकि, जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर इस तरह की समीक्षा बैठकें आयोजित किए जाने से उन लोगों में एक नई उम्मीद जगी है जो वर्षों से अपनी पहचान पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
प्रशासन ने साफ कर दिया है कि भविष्य में भी जो लोग अपने पूरे दस्तावेजों के साथ आएंगे, उनके मामलों पर पूरी सहानुभूति और नियमानुसार विचार किया जाएगा, बशर्ते वे शासन के तयशुदा मानकों को पूरा करते हों। नई टिहरी में हुए इस ताजा फैसले के बाद अब सबकी नजरें आगामी बैठक पर टिकी हैं, जहां उन 18 लंबित आवेदनों की किस्मत का फैसला होना है।