उत्तराखंड की हसीन वादियों और देवभूमि के रूप में विख्यात क्षेत्र में इन दिनों प्रकृति प्रेम की एक अलग ही बयार बह रही है। बात चाहे पहाड़ की चोटियों की हो या वहां की संस्कृति की, हर तरफ पर्यावरण बचाने और अपनी जीवनदायिनी को संरक्षित करने का संकल्प दोहराया जा रहा है। इसी कड़ी में हाल ही में नागणी और चंबा क्षेत्र में हिमालय दिवस का आयोजन बेहद भव्य और प्रेरणादायक तरीके से किया गया। इस विशेष अवसर पर स्थानीय नागरिकों, विद्यार्थियों और पर्यावरणविदों ने मिलकर हिमालय के संरक्षण का गहरा संकल्प लियानागणी और चंबा में गूंजा पर्यावरण संरक्षण का संदेश
उत्तरांचल उत्थान परिषद देहरादून और हितायु लोक कल्याण समिति नागणी के संयुक्त तत्वावधान में मां सुरकंडा जूनियर हाईस्कूल नागणी तथा अन्नपूर्णा फूड एंड क्राफ्ट संस्थान चंबा में हिमालय दिवस को उत्सव की तरह मनाया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी के मन में पर्यावरण के प्रति प्रेम जगाना और उन्हें हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व से अवगत कराना था।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि हिमालय केवल पहाड़ नहीं है, बल्कि यह इस उपमहाद्वीप का भाल और प्राणवायु का मुख्य स्त्रोत है। यदि हिमालय सुरक्षित है, तो हमारा भविष्य सुरक्षित है। इस अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया गया, जिसमें छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिविजय जड़धारी ने बताया पर्यावरण बचाने का मूल मंत्रइस पूरे आयोजन के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे प्रसिद्ध 'बीज बचाओ आंदोलन' के प्रणेता और प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित विजय जड़धारी। उनके द्वारा कही गई बातें आज के समय में हर नागरिक के लिए एक सीख की तरह हैं।
- विजय जड़धारी ने छात्रों और स्थानीय लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि हमें पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत अपने घर और आंगन से करनी होगी। उन्होंने कुछ बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण बातें साझा कीं:पेड़ लगाने की संस्कृति हर खुशी के मौके यानी जन्मदिन, सालगिरह या किसी अन्य उत्सव पर कम से कम एक पेड़ जरूर लगाएं और उसकी अपनी संतान की तरह देखभाल करें।स्वच्छता का ध्यान: विद्यार्थी अपने गांव, घर और आसपास के परिवेश को साफ-सुथरा रखें।
- जल संरक्षण: जीवन के आधार जल को दूषित होने से बचाएं और जल स्त्रोतों की शुद्धता बनाए रखें।
- कचरा प्रबंधन: गीले और सूखे कूड़े का वैज्ञानिक और सही तरीके से निस्तारण करना सीखें।जंगलों की रक्षा: प्रकृति द्वारा प्रदत्त जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि हम इन छोटी-छोटी लेकिन अहम बातों पर ध्यान देना शुरू कर दें, तो निश्चित तौर पर हिमालय पर मंडरा रहे आज के तमाम पारिस्थितिकीय खतरों को काफी हद तक टाला जा सकता है।
निबंध प्रतियोगिता में चमके युवा प्रतिभागी
हिमालय दिवस के इस पावन अवसर पर युवाओं और बच्चों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता परखने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था। नागणी के स्कूल में आयोजित निबंध प्रतियोगिता में छात्र-छात्राओं ने अपनी लेखनी के जरिए हिमालय के दर्द और उसके समाधान को बयां किया।
प्रतियोगिता के परिणाम इस प्रकार रहे:
- प्रथम स्थान: आर्यन
- द्वितीय स्थान: शिवानी
- तृतीय स्थान: आरव
विजेता बच्चों को सम्मानित किया गया ताकि वे भविष्य में भी पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में पूरी ऊर्जा के साथ जुड़ सकें। इस दौरान समिति के सचिव दिवाकर पैन्यूली, सामाजिक कार्यकर्ता विनोद जड़धारी, प्रधानाध्यापक आरएल बहुगुणा, नरेश चंद्र बहुगुणा और अंजलि तिवारी समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहेचंबा में शिक्षाविद् सोमवारी लाल सकलानी का उद्बोधन
एक0 अन्य कार्यक्रम के तहत अन्नपूर्णा फूड एंड क्राफ्ट संस्थान चंबा में एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रख्यात शिक्षाविद् सोमवारी लाल सकलानी थे। उन्होंने अपने संबोधन में हिमालय की उत्पत्ति के इतिहास से लेकर इसके वर्तमान स्वरूप तक पर विस्तार से चर्चा की।
सोमवारी लाल सकलानी ने बताया कि किस प्रकार प्राचीन काल में टैथिज महासागर के स्थान पर भौगोलिक हलचलों के कारण हिमालय का अस्तित्व सामने आया। उन्होंने हिमालय दिवस की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि:
"हिमालय हमारे जीवन और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह है। यह देश की सदानीरा नदियों का उद्गम स्थल होने के साथ-साथ विशाल हिमानियों (ग्लेशियरों) का मुख्य स्त्रोत है। यह जैव विविधता का अनमोल खजाना है जो भारतवर्ष के सच्चे प्रहरी और संरक्षक के रूप में हमारी रक्षा करता है।"इस संगोष्ठी में राघव रमोला, संजय जलंधरी, भरत और पंकज जैसे युवा और सक्रिय कार्यकर्ता भी मौजूद रहे, जिन्होंने हिमालय को बचाने के लिए चल रहे अभियानों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लिया।
क्यों प्रासंगिक है आज के समय में हिमालय दिवस?
आज के दौर में जब ग्लोबल वार्मिंग, अनियंत्रित निर्माण कार्य और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में लगातार आपदाएं आ रही हैं, ऐसे में विजय जड़धारी और सोमवारी लाल सकलानी जैसे विचारकों की बातें अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं। हिमालयी राज्यों में बढ़ता कचरा, जंगलों में लगने वाली आग (वनाग्नि) और जल स्त्रोतों का सूखना गंभीर चिंता का विषय है।नागणी और चंबा में आयोजित इन आयोजनों ने यह साबित कर दिया है कि अगर समाज का हर वर्ग, विशेषकर युवा पीढ़ी जागरूक हो जाए, तो इस संकट से पार पाया जा सकता है। पेड़ लगाने का संकल्प और उसकी देखरेख की जिम्मेदारी केवल एक सरकारी नारा बनकर न रहे, बल्कि यह हर नागरिक की आदत बननी चाहिए। यही हिमालय को बचाने का सबसे अचूक और प्रभावी रास्ता है।