सनातन संस्कृति के केंद्र और मोक्षदायिनी नगरी वाराणसी में आस्था का सैलाब उस वक्त देखने को मिला जब पंचकोशी मार्ग स्थित प्रतिष्ठित आदि शंकराचार्य महासंस्थानम में हरतालिका तीज के पावन पर्व पर विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया। इस अवसर पर यहाँ सहस्र चंडी महायज्ञ के अंतर्गत भगवान शिव और माता शक्ति का विधि-विधान से विशेष पूजन-अर्चन, वैदिक पाठ और हवन संपन्न हुआ, जिससे संपूर्ण काशी का वातावरण पूरी तरह से अध्यात्मिक और भक्तिमय हो उठा।
वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा आदि शंकराचार्य महासंस्थानम
वर्ष 2026 के इस पावन पर्व पर आयोजित इस भव्य अनुष्ठान की शुरुआत गौरी-गणेश पूजन और चतुर्वेद स्वस्ति उद्घोष के साथ हुई। संस्थान परिसर में गूंजते वैदिक मंत्रों और शंखनाद ने उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। विद्वान आचार्यों और वेदपाठी ब्राह्मणों के स्वर से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो गया। हरतालिका तीज का यह पर्व महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना का सबसे बड़ा दिन माना जाता है, और इस बार वाराणसी में इसका स्वरूप और भी अधिक भव्य और विराट रहा।
इस धार्मिक अनुष्ठान में देश और समाज के कई प्रतिष्ठित दिग्गज भी सम्मिलित हुए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रांत प्रचारक रमेश और काशी विद्वत परिषद के महामंत्री राम नारायण द्विवेदी ने विशेष रूप से इस यज्ञ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। दोनों ने अत्यंत श्रद्धा भाव के साथ विधि-विधान से पूजन-अर्चन में सहभागिता की और जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया।
शिव और शक्ति का मिलन: तप, निष्ठा और समर्पण का प्रतीक
अनुष्ठान के मुख्य प्रस्तोता और मार्गदर्शक जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती महाराज ने इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने आशीर्वचन से अभिभूत किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भगवान शिव और माता शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं। उनके बिना सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
"हरतालिका तीज केवल एक व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा, तप, निष्ठा और समर्पण का एक महात्म्य पर्व है। माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए बालू के शिवलिंग की स्थापना कर कठोर तपस्या की थी। शिव और शक्ति की यह आराधना न केवल पारिवारिक सुख-शांति को सुनिश्चित करती है, बल्कि समाज में मंगल और लोककल्याण की भावना को भी प्रबल बनाती है।" — जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती महाराज
उन्होंने आगे बताया कि सनातन परंपरा में हरतालिका तीज के दिन मंडप निर्माण, स्तंभ और वेदियों का पूजन, वैदिक ग्रंथों का पाठ तथा हवन का विशेष महत्व बताया गया है। इन अनुष्ठानों के माध्यम से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
36 विद्वान पंडितों के आचार्यत्व में संपन्न हुआ हवन
इस महायज्ञ और अनुष्ठान को पूर्ण निष्ठा और विधि-विधान के साथ संपन्न कराने की जिम्मेदारी यज्ञाचार्य तेजमणि त्रिपाठी ने संभाली। उनके कुशल आचार्यत्व में 36 प्रतिष्ठित विद्वान पंडितों एवं वेदपाठी ब्राह्मणों ने पूरी शुचिता के साथ पूजन, पाठ और हवन कराया।
- गौरी-गणेश पूजन: अनुष्ठान के प्रथम चरण में विघ्नहर्ता गणेश और माता गौरी का आह्वान किया गया।
- चतुर्वेद स्वस्ति उद्घोष: चारों वेदों के मंत्रों के उच्चारण से वातावरण को पवित्र किया गया।
- विशेष हवन: राष्ट्र की सुख-समृद्धि, वैश्विक शांति और सर्वजन कल्याण की कामना के साथ पवित्र अग्नि में आहुतियां दी गईं।
- सायंकालीन महाआरती: दिनभर चले धार्मिक अनुष्ठानों के पश्चात संध्याकाल में भगवान शिव और माता शक्ति की भव्य आरती की गई।
श्रद्धालुओं ने की अखंड सौभाग्य की कामना
यज्ञशाला और मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। विशेषकर महिलाओं ने व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती का दर्शन-पूजन किया और अपने परिवार की सुख-शांति, दीर्घायु तथा अखंड सौभाग्य के लिए प्रार्थना की। इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर वाराणसी की प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को जीवंत कर दिया, जहाँ हर पर्व पर समूची सृष्टि के कल्याण की कामना करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।