उत्तराखंड के प्रख्यात पर्वतीय जिले नई टिहरी में आज यानी रविवार, 13 सितंबर 2026 को एक बेहद खास और आध्यात्मिक आयोजन का आगाज हो चुका है। हिमालय के जाने-माने संत डॉ. दुर्गेश आचार्य गंगा विश्व सद्भावना समिति के बैनर तले जिला मुख्यालय के बौराड़ी स्थित शहीद स्मारक पर 11 दिवसीय भव्य शिव महापुराण कथा का रसपान कराएंगे। यह आयोजन महज़ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि देश के वीर शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पावन स्मृति को समर्पित एक बड़ा सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश भी है।कलश यात्रा के साथ हुआ भव्य शुभारंभ
आयोजन के पहले दिन आज अपराह्न 2 बजे सत्येश्वर महादेव मंदिर बौराड़ी से कथा स्थल तक एक विशाल और भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस यात्रा में बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाओं और श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर पूरे शहर में मंगल गीत गाए, जिससे पूरा क्षेत्र शिवमय हो उठा। आयोजकों के मुताबिक, इस 11 दिवसीय अनुष्ठान के दौरान शिव महापुराण के विभिन्न प्रसंगों के साथ-साथ आज के दौर के सबसे गंभीर मुद्दों पर भी मंथन किया जाएगा।
हिमालय के डोलते वजूद पर संत दुर्गेश की गहरी चिंता
कथा के आरंभ से ठीक पहले पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत करते हुए संत दुर्गेश आचार्य ने मौजूदा समय में हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरों को लेकर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज हिमालय के पर्यावरण और हमारी प्राचीन संस्कृति को बचाने के लिए किसी एक व्यक्ति या सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के सामूहिक प्रयास की सख्त जरूरत है।
उन्होंने हालिया प्राकृतिक आपदाओं का जिक्र करते हुए बेहद गंभीर लहजे में कहा, "जिस तरह से आज हिमालय डोल रहा है, वह हम सभी के लिए एक अत्यंत चिंतनीय पहलू है। अतीत में धराली में जो तबाही आई और हाल ही में नेपाल में जिस तरह का महाविनाश देखने को मिला, इन सभी घटनाओं के पीछे छिपे संदेश को हमें बहुत गहराई से समझना होगा। प्रकृति अब हमें चेता रही है।"
पर्यटन की जगह तीर्थाटन को प्राथमिकता देने की अपील
पहाड़ों में लगातार बढ़ते व्यावसायिक दबाव और अनियोजित गतिविधियों पर प्रहार करते हुए संत दुर्गेश ने एक बड़ा सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि यदि हमें हिमालय की मूल आत्मा को बचाना है, तो हमें आधुनिक और बेलगाम 'पर्यटन' (Tourism) के मॉडल से हटकर हमारी सनातन संस्कृति से जुड़े 'तीर्थाटन' (Pilgrimage) को तवज्जो देनी होगी। जब तक पहाड़ों की यात्रा श्रद्धा और अनुशासन से नहीं जुड़ी होगी, तब तक पर्यावरण का यह संतुलन बहाल नहीं किया जा सकता।
- गौ, गंगा और सनातन संस्कृति: संत ने जोर देकर कहा कि देवभूमि के मूल स्वरूप को बचाए रखने के लिए गौ संरक्षण, मां गंगा की निर्मलता और सनातन मूल्यों का संवर्धन अनिवार्य शर्त है।
- पर्यावरण पर विशेष सत्र: आगामी 24 सितंबर तक चलने वाले इस 11 दिवसीय अनुष्ठान में कथा के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन और जलवायु परिवर्तन पर भी विशेष चर्चाएं और सत्र आयोजित किए जाएंगे।
प्रशासन और स्थानीय समितियों की तैयारियां पूरी
इस आयोजन को सफल बनाने के लिए गंगा विश्व सद्भावना समिति के तमाम पदाधिकारी पिछले कई दिनों से दिन-रात जुटे हुए थे। समिति के अध्यक्ष राकेश राणा, कोषाध्यक्ष महावीर प्रसाद उनियाल, टीकम सिंह चौहान और गणेश प्रसाद भट्ट ने संयुक्त रूप से जानकारी दी कि कथा स्थल पर भक्तों के बैठने, सुरक्षा और अन्य सभी आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं।
आयोजकों ने टिहरी शहर और आसपास के तमाम ग्रामीण इलाकों के निवासियों से अपील की है कि वे इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान में पहुंचकर पुण्य के भागीदार बनें और पर्यावरण संरक्षण के इस महाअभियान का हिस्सा बनें।
कार्यक्रम में इनकी रही विशेष उपस्थिति
इस दौरान पहले दिन की तैयारियों और कलश यात्रा में गोविंद पुंडीर, अनीता थपलियाल, शैला देवी, कल्पना भट्ट, अंबिका नैथानी, सोनम भंडारी, राम देई रावत, सपना कठैत, रोशनी भट्ट, कपिल उनियाल, कुलदीप नौटियाल, हेमंत नौटियाल, कृष्णा मिश्रा और राम रमया समेत कई गणमान्य नागरिक और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
बौराड़ी का यह पूरा इलाका इन दिनों शिव भजनों और डमरू की गूंज से गूंज रहा है। 24 सितंबर को पूर्णाहुति तक चलने वाले इस महापुराण के जरिए न केवल आध्यात्मिक चेतना जगाने का प्रयास किया जा रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय को सुरक्षित रखने का एक मजबूत संकल्प भी लिया जा रहा है।