उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में शिक्षा की अलख जगाने वाले शिक्षकों का जीवन सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे समाज की धड़कन बन जाते हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले के एक दूरदराज प्राथमिक विद्यालय में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। एक शिक्षिका ने जब ढाई दशक से अधिक समय तक अपनी सेवाएं देने के बाद उस क्षेत्र को अलविदा कहा, तो पूरा गांव सड़क पर उतर आया। ढोल-दमाऊ की थाप और आंखों में आंसुओं के बीच दी गई यह विदाई इस बात का प्रमाण है कि समर्पित शिक्षक कभी केवल कर्मचारी नहीं होते, बल्कि वे पीढ़ियों के निर्माता होते हैं।
26 वर्षों का अटूट सफर और प्राथमिक विद्यालय इठुड़
मामला पौड़ी गढ़वाल के विकासखंड कोट के अंतर्गत आने वाले प्राथमिक विद्यालय इठुड़ का है। यहां प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्यरत कुसुम लता का हाल ही में राजकीय प्राथमिक विद्यालय श्रीखून के लिए स्थानांतरण हुआ है। जब एक ही स्थान पर कोई शिक्षक लगातार 26 साल तक अपनी सेवाएं देता है, तो वह स्कूल केवल एक सरकारी संस्थान नहीं रह जाता, बल्कि गांव के हर परिवार का हिस्सा बन जाता है। कुसुम लता ने इन ढाई दशकों से अधिक समय में केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं किया, बल्कि सैकड़ों बच्चों के भविष्य को संवारने का कठिन और पवित्र कार्य किया।
उनके इस लंबे कार्यकाल के दौरान कई पीढ़ियां पढ़कर आगे निकल गईं। जिन बच्चों को उन्होंने ककहरा सिखाया था, आज वे समाज में अलग-अलग पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में जब उनके ट्रांसफर की आधिकारिक सूचना आई, तो पूरे गांव में एक खामोशी सी छा गई। हर कोई इस बात से आहत था कि अब वह मार्गदर्शक शिक्षक उनके बीच रोजाना नहीं होगा, जो बच्चों को अपनी संतान की तरह स्नेह देती थीं।
ढोल-दमाऊ की थाप और नम आंखें
स्थानांतरण के बाद ग्रामीणों ने मिलकर प्रधानाध्यापिका के सम्मान में एक भव्य विदाई समारोह का आयोजन किया। पहाड़ी संस्कृति के अनुसार, इस विदाई को यादगार बनाने के लिए पारंपरिक वाद्य यंत्रों ढोल-दमाऊ का सहारा लिया गया। हालांकि, उत्सव जैसा माहौल होने के बावजूद वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। जब कुसुम लता ने विद्यालय परिसर से विदा लेना शुरू किया, तो ग्रामीण महिलाओं और बुजुर्गों के आंसू छलक पड़े।
यह दृश्य किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था, लेकिन यह पूरी तरह सच और भावनाओं से ओत-प्रोत था। एक शिक्षक और समाज के बीच का ऐसा रिश्ता आज के दौर में बहुत दुर्लभ माना जाता है। ग्रामीणों ने खुलकर स्वीकार किया कि कुसुम लता ने विद्यालय को अपने परिवार की तरह सींचा है।
विदाई में दिखा बड़प्पन: उपहारों और सम्मान का अनूठा सिलसिला
आम तौर पर विदाई समारोहों में शिक्षक ही तोहफे लेते हैं, लेकिन प्रधानाध्यापिका कुसुम लता ने इस परंपरा से हटकर कुछ ऐसा किया जिसने सभी का दिल जीत लिया। अपने सम्मान समारोह के दौरान उन्होंने खुद पहल करते हुए गांव के बुजुर्गों को अंगवस्त्र भेंट किए। इसके अलावा, स्थानीय महिला सशक्तिकरण का प्रतीक माने जाने वाले महिला मंगल दल को पंचायती बर्तन भेंट किए गए ताकि वे सामुदायिक कार्यों में इनका उपयोग कर सकें।
यही नहीं, विद्यालय के पूर्व छात्रों और वर्तमान में पढ़ रहे बच्चों को भी विशेष उपहार दिए गए। यह इस बात का सबूत था कि जाने से पहले भी वह हर किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती थीं। उनका यह बड़प्पन ग्रामीणों के दिलों पर हमेशा के लिए अंकित हो गया।
ग्राम प्रधान और ग्रामीणों ने साझा किए अपने संस्मरण
समारोह के दौरान ग्राम प्रधान रुस्तम सिंह रौथाण ने अपने संबोधन में कुसुम लता के योगदान को विस्तार से याद किया। उन्होंने कहा कि कुसुम लता ने हमेशा एक आदर्श शिक्षक की भूमिका निभाई। उन्होंने बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनके नैतिक संस्कारों और सर्वांगीण विकास पर विशेष जोर दिया। 26 वर्षों तक बच्चों के बीच रहकर उन्होंने एक शिक्षक के साथ-साथ एक अभिभावक और मार्गदर्शक की भूमिका भी बखूबी निभाई।
गांव की अन्य महिलाओं, जिनमें भगोली देवी, सीता देवी और रश्मि देवी शामिल थीं, ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि कुसुम लता का जाना गांव के लिए एक बड़ी क्षति जैसा है, हालांकि वे नई जगह पर भी उतनी ही लगन से बच्चों को पढ़ाएंगी, इस बात का उन्हें पूरा विश्वास है। समारोह में उपस्थित भारी भीड़ इस बात की गवाही दे रही थी कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कितनी गहरी छाप छोड़ी है।
निष्कर्ष: एक शिक्षक की असली पूंजी
सरकारी सेवाओं में ट्रांसफर और प्रमोशन एक सामान्य प्रक्रिया है, जो हर कर्मचारी के जीवन में आती है। लेकिन कुछ लोग अपनी कार्यशैली और समर्पण से उस प्रक्रिया को एक भावुक और ऐतिहासिक पल में बदल देते हैं। प्राथमिक विद्यालय इठुड़ से कुसुम लता की विदाई यह सिखाती है कि यदि आप अपने काम के प्रति पूरी तरह ईमानदार और समर्पित हैं, तो समाज आपको कभी नहीं भूलता। धन और शोहरत से परे, लोगों का ऐसा बेइंतिहा प्यार और सम्मान ही किसी भी शिक्षक की असली और सबसे बड़ी पूंजी होती है।