चार दशक के अंतराल पर अंडरवर्ल्ड के दो अलग-अलग दौर के कुख्यात गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम और लॉरेंस बिश्नोई अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल से जुड़े रहे हैं।
भारतीय अंडरवर्ल्ड के इतिहास में अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल एक ऐसा दुर्लभ बिंदु है, जहां अलग-अलग पीढ़ियों के दो बड़े गैंगस्टर किसी न किसी रूप में जुड़े। जहां एक ओर 1983 में एक गोली लगने की घटना के बाद दाऊद इब्राहिम को कानूनी कार्रवाई और हिरासत के दौर से गुजरते हुए साबरमती जेल में रखा गया था, वहीं मई 2023 से लॉरेंस बिश्नोई इसी जेल में बंद है। सुरक्षा एजेंसियां उसके कथित आपराधिक नेटवर्क से जुड़े मामलों की जांच कर रही हैं।
1983 में क्या हुआ था दाऊद के साथ?
दाऊद इब्राहिम के साबरमती जेल में बिताए गए उस दौर का जिक्र गुजरात के तत्कालीन कस्टम कमिश्नर और बाद में डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) के महानिदेशक बने बी.वी. कुमार की पुस्तक 'DRI & The Dons: The Untold Stories' में विस्तार से मिलता है।
जून 1983 में दाऊद जामन सलया और पोरबंदर की यात्रा के बाद बॉम्बे (अब मुंबई) लौट रहा था। वह लालू जोगी पटेल की कार में बैठा था, जिसे पटेल का ड्राइवर गुलाब चला रहा था। कार की आगे की सीट पर दाऊद बैठा था, जबकि उसके पीछे गुजरात के अंडरवर्ल्ड का एक अन्य शख्स हाजी इस्माइल बैठा था।
बी.वी. कुमार की किताब के मुताबिक, रास्ते में उन्होंने आलमजेब पठान को अपनी ओर आते देखा, जो कभी दाऊद का सहयोगी था लेकिन बाद में उसका विरोधी बन गया था। हाजी इस्माइल ने घबराहट में अपनी पिस्तौल निकालने की कोशिश की, जिससे हथियार से गोली चल गई। गोली इस्माइल की बाएं हथेली को चीरती हुई आगे की सीट से गुजरी और सीधे दाऊद की गर्दन में जा लगी। हालांकि, कुछ अन्य विवरणों में यह भी कहा जाता है कि वह गोली आलमजेब ने चलाई थी।
बड़ौदा अस्पताल में पूछताछ और स्मगलिंग की जांच
यह जख्म सतही था। ड्राइवर गुलाब घायल लोगों को लेकर बड़ौदा के सयाजी अस्पताल पहुंचा और वहां से चला गया। इस गोलीबारी की सूचना मिलने पर बड़ौदा के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर पी.के. दत्ता ने दाऊद से पूछताछ की थी।
किताब के अनुसार, पूछताछ में दाऊद ने मौखिक रूप से स्वीकार किया था कि वह 'नंबर दो धंधा' यानी तस्करी का काम करता है। हालांकि, उसने इस बात से इनकार किया था कि उसे आलमजेब ने गोली मारी थी। उसके साथियों का भी यही कहना था कि पिस्तौल दुर्घटनावश चल गई थी।
इसके बाद गुजरात के अधिकारियों ने लगभग 3 करोड़ रुपये मूल्य की तस्करी के एक मामले की जांच शुरू की, जिसमें दाऊद की संलिप्तता का संदेह था। इसके बाद अधिकारियों ने उसे कंजर्वेशन ऑफ फॉरेन एक्सचेंज एंड प्रिवेंशन ऑफ स्मगलिंग एक्टिविटीज एक्ट (COFEPOSA) के तहत हिरासत में लेने का वारंट हासिल किया और उसे हिरासत में ले लिया गया।
न्यायिक खींचतान और साबरमती जेल में स्थानांतरण
दाऊद ने अपनी इस निवारक हिरासत (preventive detention) को अदालत में चुनौती दी और इसके लिए वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी को अपनी पैरवी के लिए नियुक्त किया। मामला तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी.डी. जिन के समक्ष आया। बी.वी. कुमार लिखते हैं कि न्यायाधीश ने ठोस सबूतों के अभाव में निवारक हिरासत की वैधता पर सवाल उठाया और जिस परिस्थिति में दाऊद को हिरासत में लिया गया था, उस पर कड़ी आपत्ति जताई।
दिलचस्प बात यह है कि अधिकारियों ने प्रतिद्वंद्वियों से उसकी जान को खतरे का हवाला देते हुए उसे हिरासत में रखने की दलील दी थी। हालांकि, अदालत ने उसे रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते कि वह किसी अन्य कानून के तहत हिरासत में न हो और अपनी मर्जी से जोखिम उठाने के लिए स्वतंत्र हो।
लेकिन रिहाई तुरंत नहीं हुई। अधिकारियों ने गुजरात सरकार के समक्ष नए सिरे से हिरासत का आदेश प्राप्त किया, जिसके तहत दाऊद को फिर से हिरासत में रखकर साबरमती जेल भेज दिया गया।
जेल से पेशी के दौरान जानलेवा हमला
साबरमती जेल में दाऊद की दूसरी हिरासत के दौरान उसकी जान पर एक बार फिर खतरा मंडराया। जब उसे अदालत में पेशी के लिए साबरमती जेल से बड़ौदा ले जाया जा रहा था, तब अहमदाबाद में जमालपुर पगाथिया के पास उसके वाहन पर फायरिंग की गई।
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घटना के विवरण के अनुसार, दाऊद पुलिस वैन के बजाय एक निजी फिएट कार में यात्रा कर रहा था। तभी गैंगस्टर अब्दुल लतीफ के गिरोह के सदस्यों और आलमजेब ने उसे देख लिया। पुलिस escorte वाली फिएट कार को एक भीड़भाड़ वाले इलाके में घेर लिया गया और गोलीबारी शुरू हो गई। पूर्व पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने अपनी पुस्तक 'डायल डी फॉर डॉन' में इस घटना का जिक्र करते हुए बताया है कि इस हमले में दाऊद बच गया, जबकि कार में मौजूद दो अन्य लोग गोलियों का शिकार बने।
इस हमले के बाद दाऊद ने कुछ समय साबरमती जेल में बिताया और फिर अपनी हिरासत को चुनौती दी। अंततः उसे रिहा कर दिया गया। बी.वी. कुमार इसे उन दुर्लभ अवसरों में से एक बताते हैं जब यह गैंगस्टर, भले ही थोड़े समय के लिए, जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा था। इसके बाद 1984 में वह दुबई चला गया और फिर कभी भारतीय पुलिस की पहुंच में नहीं आया।