शासकीय योजनाओं और तकनीकी मार्गदर्शन से बदली बलौदा विकासखंड के किसान की तकदीर
छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा विकासखंड अंतर्गत आने वाले ग्राम बुडगहन के प्रगतिशील कृषक बहोरन ने पारंपरिक खेती के दायरे से बाहर निकलकर आधुनिक उद्यानिकी फसलों की ओर कदम बढ़ाया है। शासन की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और कृषि तथा उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन का लाभ उठाते हुए उन्होंने अपनी कृषि आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत विभागीय सहायता प्राप्त कर वे अब संरक्षित खेती यानी शेडनेट हाउस के जरिए विभिन्न प्रकार की सब्जियों का व्यावसायिक उत्पादन कर रहे हैं.
पारंपरिक धान खेती से उद्यानिकी की ओर झुकाव
कृषक बहोरन के पास कुल 2.400 हेक्टेयर कुल कृषि भूमि उपलब्ध है। शुरुआती दौर में वे अन्य किसानों की तरह मुख्य रूप से पारंपरिक धान की खेती पर ही पूरी तरह निर्भर थे। हालांकि, उद्यानिकी फसलों के उत्पादन और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। इसी रुचि को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जिला उद्यान विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया और वहां से संचालित होने वाली तमाम योजनाओं की विस्तृत जानकारी हासिल की। विभाग के मैदानी अमले से मिले निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन के बाद उन्होंने अपनी कुल जोत में से 2.000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में उद्यानिकी फसलों का उत्पादन पूरी तन्मयता के साथ शुरू कर दिया.
शेडनेट हाउस और ग्राफ्टेड बैंगन से मिला विशेष लाभ
वर्तमान समय में कृषक बहोरन अपने खेतों में शेडनेट हाउस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, जिसके माध्यम से मौसमी और बेमौसम दोनों ही तरह की सब्जियों की बंपर पैदावार ली जा रही है। वे मुख्य रूप से बैंगन, लौकी, खीरा और धनिया की फसलें उगा रहे हैं। उद्यानिकी विभाग की योजनाओं के अंतर्गत उन्हें विशेष रूप से ग्राफ्टेड (प्रत्यारोपित) बैंगन की खेती के लिए सरकारी अनुदान का लाभ भी प्रदान किया गया है। शेडनेट हाउस के भीतर खेती करने के कारण फसलों पर कीटों और प्रतिकूल मौसम का प्रभाव कम होता है, जिससे उन्हें उच्च गुणवत्ता का बेहतर उत्पादन प्राप्त हो रहा है और बाजार में उनकी उपज की मांग भी अच्छी बनी हुई है.
आर्थिक स्थिति में सुधार और अन्य किसानों के लिए प्रेरणा
कृषक बहोरन ने मौजूदा वर्ष के दौरान अपने खेतों से उत्पादित धनिया और बैंगन को बाजार में बेचकर काफी अच्छी आर्थिक आय अर्जित की है। उनका कहना है कि केवल पारंपरिक फसलों की तुलना में आधुनिक उद्यानिकी फसलों से उन्हें कहीं अधिक मुनाफा मिल रहा है, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक और मजबूत सुधार आया है। बहोरन की यह सफलता यह साबित करती है कि यदि शासन की योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो, किसानों को समय पर तकनीकी मार्गदर्शन मिले और कड़ी मेहनत जोड़ी जाए, तो खेती को घाटे का सौदा होने से बचाकर आय के नए और स्थायी स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। उनकी इस प्रेरणादायक सफलता से प्रभावित होकर अब आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य गांवों के किसान भी पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों की खेती करने के प्रति खासी रुचि दिखाने लगे हैं.