श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस वर्ष 5253वें जन्मोत्सव के अवसर पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक बेहद अनूठी और प्रेरणादायक पहल देखने को मिली। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में 'नमामि गंगे' की ओर से एक ऐसा आयोजन किया गया, जिसने न केवल धार्मिक आस्था को बल दिया, बल्कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत यानी पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति प्रेम का भी गहरा संदेश दिया।
कालभैरव क्षेत्र में दिखा कान्हा का अनूठा स्वरूप
वाराणसी के ऐतिहासिक कालभैरव क्षेत्र में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण भगवान श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप रहे छोटे-छोटे बालक थे। इन बाल गोपालों के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया गया कि कान्हा का जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह प्रकृति, पर्यावरण और जीवन के हर एक पहलू के बीच संतुलन बनाने की सबसे बड़ी सीख देता है।
कार्यक्रम के दौरान वहां मौजूद क्षेत्रीय नागरिकों, पर्यटकों और श्रद्धालुओं का ध्यान इस बात की ओर खींचा गया कि कैसे हम अपने त्योहारों को पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) बना सकते हैं। भारी संख्या में जुटे लोगों ने बाल स्वरूपों के दर्शन किए और साथ ही एक जिम्मेदार नागरिक बनने का संकल्प भी लिया।
गोवर्धन पूजा और प्रकृति का अटूट रिश्ता
नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक एवं नगर निगम के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर राजेश शुक्ला ने इस अवसर पर जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का पूरा जीवन ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग का संगम है। उन्होंने कहा कि श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ही गोवर्धन पर्वत की पूजा कर यह बता दिया था कि मानव जीवन और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं।
उन्होंने आगे बताया कि भगवान का पूरा बाल्यकाल यमुना के तटों, हरे-भरे वनों, गोवर्धन की तलहटी और गायों के बीच बीता। यह इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर स्वयं प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक और प्रहरी रहे हैं। आधुनिक युग में जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियां हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण के इन संदेशों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है।
प्लास्टिक मुक्त आयोजनों पर जोर
आज के दौर में धार्मिक आयोजनों और उत्सवों में सिंगल यूज पॉलिथीन और प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग पर्यावरण के लिए एक नासूर बनता जा रहा है। कार्यक्रम में विशेष तौर पर इस बात पर जोर दिया गया कि:
- त्योहारों की सजावट में प्लास्टिक या थर्मोकोल के सामानों का प्रयोग बंद किया जाए।
- पूजा-पाठ और प्रसाद वितरण के दौरान बायोडिग्रेडेबल (Eco-friendly) विकल्पों को अपनाया जाए।
- जलस्रोतों और विशेषकर मां गंगा को प्लास्टिक और अन्य कचरे से पूरी तरह सुरक्षित रखा जाए।
- धरती, जलस्रोतों और मूक जीव-जंतुओं को प्लास्टिक के घातक प्रभावों से बचाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं।
स्वच्छ और हरित काशी का संकल्प
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने मिलकर 'स्वच्छ और हरित काशी' के निर्माण में अपनी सक्रिय जनभागीदारी निभाने का संकल्प लिया। नागरिकों ने शपथ ली कि वे न केवल अपने घरों और मंदिरों के आसपास साफ-सफाई बनाए रखेंगे, बल्कि बड़े पैमाने पर पौधरोपण कर पर्यावरण को समृद्ध बनाने में अपना योगदान देंगे।
नमामि गंगे की इस अनूठी पहल ने यह साबित कर दिया कि यदि धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सरोकारों को जोड़ दिया जाए, तो समाज में एक सकारात्मक बदलाव बहुत कम समय में लाया जा सकता है। जन्माष्टमी का यह पर्व काशीवासियों के लिए केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति को सहेजने का एक महाअभियान बन गया।