हर साल 27 अक्टूबर को मनाया जाता है वर्ल्ड ऑक्यूपेशनल थेरेपी डे, जानिए बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए इसके क्या हैं लाभ
जीवन में कई बार किसी गंभीर चोट, बीमारी या शारीरिक व मानसिक परेशानी के कारण व्यक्ति के लिए रोजमर्रा के सामान्य काम करना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कुछ बच्चों को लिखने, कपड़े पहनने या अपनी उम्र के अनुसार अन्य गतिविधियां सीखने में कठिनाई होती है, तो वहीं कई बुजुर्गों को नहाने, खाना खाने और चलने-फिरने जैसे बुनियादी कामों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसी कठिन परिस्थितियों में व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऑक्यूपेशनल थेरेपी एक महत्वपूर्ण चिकित्सा विधा के रूप में काम आती है। हर साल 27 अक्टूबर को 'वर्ल्ड ऑक्यूपेशनल थेरेपी डे' मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य इस चिकित्सा पद्धति के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों की स्वतंत्रता व जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है।
क्या होती है ऑक्यूपेशनल थेरेपी?
ऑक्यूपेशनल थेरेपी रिहैबिलिटेशन मेडिसिन यानी पुनर्जीवन चिकित्सा की एक प्रमुख विधा है। इसमें व्यक्ति को उसके दैनिक जीवन के कार्य स्वतंत्र रूप से करने में सक्षम बनाने के लिए विशेष अभ्यास कराए जाते हैं। यहां 'ऑक्यूपेशन' शब्द का अर्थ केवल नौकरी या रोजगार से नहीं है, बल्कि इसका संबंध उन तमाम गतिविधियों से है जो किसी व्यक्ति की दैनिकचर्या का अनिवार्य हिस्सा होती हैं। इनमें कपड़े पहनना, खाना खाना, लिखना, नहाना, घर के कामकाज करना, पढ़ाई करना और कामकाजी गतिविधियों में हिस्सा लेना शामिल है। एक कुशल ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट मरीज की शारीरिक व मानसिक क्षमता तथा उसकी दैनिक समस्याओं का बारीकी से आकलन करके उपयुक्त गतिविधियों, अभ्यासों और सहायक उपकरणों की रूपरेखा तैयार करता है।
बच्चों के विकास और शिक्षा में महत्व
कई बच्चों को जन्मजात या विकासात्मक कारणों से लिखने के लिए पेंसिल सही ढंग से पकड़ने, शर्ट के बटन लगाने, जूते के फीते बांधने, छोटी वस्तुओं को उठाने या स्कूल की सामान्य गतिविधियों में भाग लेने में परेशानी होती है। ऐसे मामलों में ऑक्यूपेशनल थेरेपी बेहद मददगार साबित होती है। थेरेपिस्ट बच्चों के साथ खेल-खेल में और अन्य उपयोगी गतिविधियों के माध्यम से उनके हाथों के समन्वय, सूक्ष्म मोटर कौशल और दैनिक जीवन के जरूरी हुनर को विकसित करने का प्रयास करते हैं। हालांकि, प्रत्येक बच्चे की शारीरिक और मानसिक स्थिति अलग होती है, इसलिए किसी भी थेरेपी को शुरू करने से पहले विशेषज्ञ द्वारा बच्चे का उचित परीक्षण किया जाता है।
चोट, दुर्घटना और गंभीर बीमारियों के बाद पुनर्वास
ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर सड़क दुर्घटना, बड़ी सर्जरी या ऐसी किसी भी गंभीर बीमारी के बाद जो व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों को सीधे तौर पर प्रभावित करती है, सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति का आत्मविश्वास भी डगमगा सकता है। ऑक्यूपेशनल थेरेपी ऐसे मरीजों को उनकी बची हुई क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग करना दोबारा सिखाती है, जिससे वे धीरे-धीरे अपने दैनिक कार्यों को खुद करने के योग्य बन जाते हैं।
बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए वरदान
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कमजोरी आने, संतुलन बिगड़ने या जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं के कारण बुजुर्गों को रोजमर्रा के कार्यों में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। ऑक्यूपेशनल थेरेपी के जरिए न केवल बुजुर्गों और दिव्यांगजनों को व्यायाम कराए जाते हैं, बल्कि उनके रहने के कमरे या घर के वातावरण में जरूरी बदलाव करने के तरीके भी सुझाए जाते हैं। इसके अलावा, गतिविधियों को आसान बनाने वाली तकनीकों और विभिन्न सहायक उपकरणों के सुरक्षित इस्तेमाल का प्रशिक्षण देकर उनके जीवन को सुगम बनाया जाता है।
वर्ल्ड ऑक्यूपेशनल थेरेपी डे का संदेश स्पष्ट करता है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक बाधाओं के बावजूद अपनी क्षमता के अनुसार रोजमर्रा की सार्थक गतिविधियों में भाग लेने और सम्मानजनक जीवन जीने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए।