7 अक्टूबर के हमलों के बाद पहला मतदान; नेतन्याहू और धुर दक्षिणपंथी गठबंधन का राजनीतिक भविष्य दांव पर
इजराइल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को देश की 120 सदस्यीय संसद यानी नेसेट (Knesset) के चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों और उसके बाद गाजा, लेबनान, सीरिया, यमन और ईरान के साथ चले लंबे संघर्षों के बाद हो रहे इन चुनावों को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़े जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा है। देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू के सामने उनके मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।
कड़ा मुकाबला और गठबंधन की पेचीदगियां
इजराइल की चुनावी प्रणाली के तहत मतदाता किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। देश में आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) प्रणाली लागू है, जिसके कारण आज तक के इतिहास में किसी भी एक पार्टी को संसद में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। नेसेट में कुल 120 सीटें हैं, और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों की बहुमत संख्या की आवश्यकता होती है। ओपिनियन पोल के अनुसार, इस बार भी त्रिशंकु संसद (Hung Parliament) बनने के आसार हैं, जिसका अर्थ है कि चुनाव परिणामों के बाद अगली सरकार बनाने के लिए हफ्तों या महीनों तक लंबी गठबंधन वार्ताएं चल सकती हैं।
मतदान के लिए सेना ने भी व्यापक इंतजाम किए हैं। इजराइली सेना ने चुनाव से पहले सैनिकों के लिए 850 से अधिक मतदान केंद्र बनाए हैं, जिनमें वेस्ट बैंक, दक्षिणी लेबनान, दक्षिण-पश्चिमी सीरिया और गाजा के सक्रिय युद्ध क्षेत्रों में बनाए गए मोबाइल बैलेट यूनिट्स भी शामिल हैं। इसके अलावा, देश के 12. लाख योग्य फिलिस्तीनी नागरिकों (अरब मतदाताओं) का मतदान प्रतिशत भी यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि चुनाव के बाद कौन सा राजनीतिक ब्लॉक सरकार बनाने में सफल होता है।
ईरान का मुद्दा और अमेरिका की भूमिका
चुनावी प्रचार के अंतिम दिनों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर आक्रामक रुख अपनाया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर तेल अवीव के ऊपर परमाणु मशरूम बादल की एक एआई-जनित तस्वीर साझा करते हुए मतदाताओं से अपील की कि यदि वे अपने परिवार की सुरक्षा चाहते हैं, तो विपक्ष को वोट देते समय उनके हाथ कांपने चाहिए। नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन का हवाला देते हुए दावा किया है कि यदि वे सत्ता में बने रहते हैं, तो वे और ट्रंप मिलकर ईरान के खतरे को पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। हालांकि, व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका मध्यावधि चुनावों से पहले ईरान पर कोई हमला नहीं करेगा।
भारत-इजराइल संबंधों पर नजर
इस बीच, नई दिल्ली भी इजराइल के इन राजनीतिक घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर बनाए हुए है। भारत के दृष्टिकोण से मुख्य सवाल यह है कि यदि येरुशलम में सत्ता परिवर्तन होता है, तो क्या इससे भारत और इजराइल के द्विपक्षीय संबंधों पर कोई प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, रक्षा, तकनीक और आर्थिक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच मजबूत और पुराने सहयोग को देखते हुए विश्लेषकों का मानना है कि रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों के बीच लगातार बनी रहेगी।
सीमा पर सुरक्षा और अन्य गतिविधियां
मतदान के ठीक पहले, इजराइली सेना ने मंगलवार को निट्जाना के पास मिस्र की सीमा से इजराइली क्षेत्र में दाखिल होने वाले एक मिस्र के नागरिक को हिरासत में ले लिया। सेना ने बताया कि उसे आगे की पूछताछ के लिए सुरक्षा बलों को सौंप दिया गया है, हालांकि इस संबंध में कोई अन्य विस्तृत जानकारी साझा नहीं की गई है। चुनाव परिणामों के स्पष्ट होने में अभी कुछ हफ्तों का समय लग सकता है, और पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि युद्ध के बाद का इजराइल किस नेतृत्व को चुनता है।