Breaking
► मुंबई में नाबालिगों की गुमशुदगी: 8 महीने में 875 मामले दर्ज, 97% सुलझे ► छत्रपति संभाजीनगर-गोवा विमान सेवा 24 दिन में फिर बंद, इंडिगो के विंटर शेड्यूल में जगह नहीं ► मुर्गे का खून और टूटी चूड़ियां फैलाकर रचा मौत का नाटक, 21 दिन बाद मुंबई में मिली लापता महिला ► चंद्रपुर में किन्नर समुदाय के सशक्तीकरण के लिए विशेष कार्यशाला आयोजित ► यूपी-बिहार विधान परिषद चुनाव: 19 सीटों पर मतगणना जारी, विभिन्न केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा ► बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर मतगणना जारी, सीसीटीवी को लेकर हंगामा ► जेपीएससी मेधा घोटाला: सीआईडी ने 12 आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में दाखिल की 97 पन्नों की चार्जशीट ► उत्तराखंड में जल्द बढ़ेगा पर्यावरण मित्रों का मानदेय: सीएम धामी का ऐलान ► रायबरेली: रामलीला मेले में जलपरी शो का बिना टिकट प्रवेश बना खूनी संघर्ष, जमकर चले लात-घूंसे ► मुंबई लोकल ठप: 200 से अधिक ट्रेनें रद्द, भांडुप में युवक की मौत और कांजुरमार्ग में सिग्नल फेल ► मुंबई में नाबालिगों की गुमशुदगी: 8 महीने में 875 मामले दर्ज, 97% सुलझे ► छत्रपति संभाजीनगर-गोवा विमान सेवा 24 दिन में फिर बंद, इंडिगो के विंटर शेड्यूल में जगह नहीं ► मुर्गे का खून और टूटी चूड़ियां फैलाकर रचा मौत का नाटक, 21 दिन बाद मुंबई में मिली लापता महिला ► चंद्रपुर में किन्नर समुदाय के सशक्तीकरण के लिए विशेष कार्यशाला आयोजित ► यूपी-बिहार विधान परिषद चुनाव: 19 सीटों पर मतगणना जारी, विभिन्न केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा ► बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर मतगणना जारी, सीसीटीवी को लेकर हंगामा ► जेपीएससी मेधा घोटाला: सीआईडी ने 12 आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में दाखिल की 97 पन्नों की चार्जशीट ► उत्तराखंड में जल्द बढ़ेगा पर्यावरण मित्रों का मानदेय: सीएम धामी का ऐलान ► रायबरेली: रामलीला मेले में जलपरी शो का बिना टिकट प्रवेश बना खूनी संघर्ष, जमकर चले लात-घूंसे ► मुंबई लोकल ठप: 200 से अधिक ट्रेनें रद्द, भांडुप में युवक की मौत और कांजुरमार्ग में सिग्नल फेल

बिहार की लोक संस्कृति का दर्पण है पारंपरिक गीत 'निमिया पतईया झरी जाए'

बिहार की लोक संस्कृति का दर्पण है पारंपरिक गीत 'निमिया पतईया झरी जाए'

पारंपरिक लोकगीतों में रची-बसी है बिहार की ठेठ संस्कृति, जानिए 'निमिया पतईया' गीत के मायने

बिहार की असली सांस्कृतिक पहचान वहां के लोकगीतों और ग्रामीण परिवेश में बसती है। अक्सर मुख्यधारा के आधुनिक भोजपुरी संगीत में एक तय शैली की गूंज सुनाई देती है, लेकिन जब बात ठेठ लोक संस्कृति की आती है, तो पारंपरिक गीत ही वहां के समाज और जीवन शैली का वास्तविक परिचय देते हैं। ऐसा ही एक बेहद लोकप्रिय और पारंपरिक लोकगीत है 'निमिया पतईया झरी जाए हो अंगनवा, कईसे बहारु जी'। यह गीत बिहार के गांव-देहात के जीवन, पारिवारिक जिम्मेदारियों और संयुक्त परिवार के बीच के रिश्तों को बहुत ही मार्मिक और सुंदर तरीके से प्रस्तुत करता है।

महिला की दृष्टि से रची गई पारिवारिक मर्यादा

यह लोकगीत एक विवाहित महिला के नजरिए से गाया गया है, जो घर के कामों और ससुराल के रिश्तों के बीच अपनी सीमाओं और मर्यादाओं को बयां करती है। गीत की मूल प्रेरणा आंगन में खड़े नीम के पेड़ से गिर रही पत्तियों और उन्हें समेटने की असमर्थता से जुड़ी है। महिला कहती है कि नीम के पत्ते झड़कर पूरे आंगन में फैल चुके हैं, लेकिन वह आंगन में झाड़ू कैसे लगाए, क्योंकि उसके सामने कई सामाजिक और पारिवारिक संकोच हैं। यह गीत एक बहू के रूप में महिला के दायित्वों और संयुक्त परिवार में बरती जाने वाली शालीनता को दर्शाता है।

ससुर और जेठ के साथ रिश्तों का संकोच

गीत के अगले चरणों में ससुराल के अलग-अलग सदस्यों के साथ महिला के संबंधों की गहराई को दिखाया गया है। महिला बताती है कि उसी आंगन में उसके ससुर का डेरा यानी कमरा है, और उनकी पगड़ी या उपस्थिति मात्र से ही उसके मन में एक आदर और झिझक का भाव आ जाता है। भारतीय संस्कृति में ससुर को पिता के समान माना गया है, जिनके सामने बहू पारंपरिक मर्यादाओं का पालन करती है। इसी तरह, गीत में पति के बड़े भाई यानी भसूर का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उनके आवास के पास से गुजरते या सफाई करते समय बहुत सावधानी रखनी पड़ती है, ताकि अनजाने में भी कोई मर्यादा भंग न हो। ग्रामीण समाज में इन रिश्तों की गरिमा बनाए रखने के लिए विशेष ध्यान दिया जाता है।

पति के साथ अपनापन और नजरों का मिलन

ससुराल के कड़े सामाजिक नियमों और संकोच के बीच, जब गीत में पति यानी 'पिया जी' का जिक्र आता है, तो रचना का भाव बदल जाता है। महिला बताती है कि उसी आंगन में पति का भी डेरा है, जहां नजरें मिलने पर दिल की धड़कन बढ़ जाती है और एक खास अपनापन महसूस होता है। अन्य रिश्तों की झिझक और मर्यादा के विपरीत, पति के साथ यह संवाद और नजरों का मिलना विवाहित जीवन में स्नेह और सांत्वना का अहसास कराता है। यह लोकगीत न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह बिहार के ग्रामीण अंचल की उन बारीकियों को भी सामने लाता है, जहां हर रिश्ते के लिए एक तय मर्यादा और आदर का भावू जुड़ा हुआ है।

About the Author

काव्या त्रिपाठी

काव्या त्रिपाठी

Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

Read More

ज़रूर पढ़ें (You May Also Like)

अगली खबर पढ़ें:

आगे पढ़ें →