मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इंदौर में धनतेरस पर अपनी 70 साल पुरानी पुश्तैनी 'काकी जी की दुकान' पर ग्राहकों को खुद सामान तौलकर बेचा।
इंदौर की 70 साल पुरानी 'काकी जी की दुकान' पर मंत्री ने निभाई पुरानी पारिवारिक परंपरा, ग्राहकों से की मुलाकात और खुद तौला सामान।
मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने धनतेरस के पावन अवसर पर एक बार फिर राजनीति की व्यस्तताओं से दूर अपने पुराने पारिवारिक अंदाज में नजर आए। हर साल की तरह इस बार भी वे इंदौर में अपनी 70 साल से अधिक पुरानी पुश्तैनी किराना दुकान पर पहुंचे, जिसे स्थानीय लोग 'काकी जी की दुकान' के नाम से जानते हैं। इस दौरान उन्होंने न केवल दुकान पर पहुंचे ग्राहकों से आत्मीय मुलाकात की, बल्कि खुद तराजू से सामान तौलकर उन्हें किराना सामग्री बेची। मंत्री को बिल्कुल सामान्य दुकानदार के रूप में अपने बीच पाकर वहां खरीदारी करने पहुंचे ग्राहक भी काफी उत्साहित दिखाई दिए।
मां अयोध्या देवी विजयवर्गीय की यादों से जुड़ी है दुकान
इंदौर शहर की यह दुकान सिर्फ एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं है, बल्कि यह विजयवर्गीय परिवार की पुरानी विरासत और भावनात्मक स्मृतियों का प्रमुख केंद्र है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह किराना दुकान सात दशक यानी 70 साल से भी अधिक पुरानी है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की माताजी, स्वर्गीय अयोध्या देवी विजयवर्गीय इस दुकान को लंबे समय तक संभाला करती थीं। इलाके के लोग और परिचित उन्हें बेहद आदर के साथ 'काकी जी' कहकर पुकारते थे। मां के नाम और उनके स्नेह के कारण ही इस दुकान का नाम 'काकी जी की दुकान' पड़ा, जो आज भी अपने इस ऐतिहासिक और पारिवारिक नाम से इलाके में जानी जाती है और एक खास पहचान रखती है।
जड़ों से जुड़े रहने का भावनात्मक जरिया
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के लिए यह पुश्तैनी ठिकाना केवल एक पारिवारिक संपत्ति नहीं है, बल्कि यह उनकी जड़ों और मां की स्मृतियों से जुड़ने का एक बेहद भावुक माध्यम है। इस विशेष परंपरा को लेकर उनका मानना है कि जीवन में कुछ परंपराएं समय के बीतने के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि उनका महत्व और आत्मीयता हर साल और अधिक गहरी हो जाती है। धनतेरस के शुभ दिन पर अपनी इस पुरानी दुकान पर पहुंचना और आम लोगों व पुराने परिचितों के बीच समय बिताना उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं है।
राजनीतिक व्यस्तता के बीच अपनों का साथ
अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों और व्यस्त दिनचर्या के बावजूद कैलाश विजयवर्गीय हर साल धनतेरस के मौके पर समय निकालकर इस दुकान पर जरूर आते हैं। दुकान की देहरी पर कदम रखते ही उन्हें अपने बचपन और परिवार के साथ बिताए शुरुआती दिनों की यादें ताजा हो जाती हैं। यहां उन्हें पीढ़ियों से चले आ रहे अपनेपन और स्थानीय लोगों का वही पुराना सानिध्य मिलता है, जो राजनीति की चमक-धमक से दूर उन्हें उनकी जमीन से जोड़े रखता है।