कल्याण-डोंबिवली और उल्हासनगर महानगर पालिकाओं में महिला महापौरों के पतियों की कथित सक्रिय भूमिका और प्रशासनिक कामकाज में हस्तक्षेप पर उठ रहे हैं सवाल।
कल्याण-डोंबिवली और उल्हासनगर महानगर पालिकाओं में महिला महापौरों के पतियों की कथित सक्रिय भूमिका और प्रशासनिक कामकाज में दखल देने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। उच्च शिक्षित और कानून की डिग्री होने के बावजूद महिला महापौरों के बजाय उनके पतियों द्वारा कार्यालयों में बैठकर फैसले लेने और अधिकारियों को निर्देश देने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में जोरों पर है।
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा महिला सशक्तिकरण और महिलाओं को नेतृत्व के अवसर देने के दावों के बीच महाराष्ट्र की कल्याण-डोंबिवली महानगर पालिका (KDMC) और उल्हासनगर महानगर पालिका का यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। लंबे अरसे बाद संपन्न हुए आम चुनावों में आरक्षण के चलते इन दोनों महत्वपूर्ण शहरी निकायों में महिलाओं को शहर का प्रथम नागरिक यानी महापौर बनने का अवसर मिला। कल्याण-डोंबिवली मनपा में एडवोकेट हर्षाली योगेश चौधरी और उल्हासनगर मनपा में एडवोकेट अश्विनी कमलेश निकम को महापौर पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
कार्यालयों और एंटीचेंबर में पतियों का कब्जा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दोनों ही महानगर पालिकाओं में निर्वाचित महिला महापौरों की तुलना में उनके पति प्रशासनिक बैठकों और कार्यालयों में अधिक सक्रिय नजर आते हैं। आरोप है कि महापौर कार्यालयों से जुड़े एंटीचेंबर में बैठकर ये पतिदेव महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं और मनपा के आला अधिकारियों तथा ठेकेदारों को दिशा-निर्देश देते हैं। स्थानीय स्तर पर इन्हें 'सुपर महापौर' की संज्ञा दी जा रही है, क्योंकि आम नागरिकों को जहां महापौर से मिलने के लिए पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है, वहीं इन पतियों की आवाजाही पर कोई रोकटोक नहीं है।
उल्हासनगर मनपा मुख्यालय में हंगामा
उल्हासनगर महानगर पालिका की महापौर अश्विनी निकम के पति कमलेश निकम अपनी राजनीतिक सक्रियता और आक्रामक तेवरों को लेकर खासी चर्चा में हैं। हाल ही में उन्होंने उल्हासनगर मनपा मुख्यालय के भीतर भाजपा नगरसेविका नीता नारायण पंजाबी के कक्ष के बाहर जमकर हंगामा किया था। इस दौरान उन्होंने भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रविंद्र चव्हाण को लेकर भी तीखे बयान दिए, जिससे मनपा परिसर में राजनीतिक तनाव की स्थिति पैदा हो गई। प्रशासनिक गलियारों में सवाल उठाए जा रहे हैं कि यदि कोई आम नागरिक इस तरह का हंगामा करता तो सुरक्षा विभाग तुरंत कार्रवाई करता, लेकिन महापौर के पति होने के कारण प्रशासन की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई।
कल्याण-डोंबिवली में योगेश चौधरी की मौजूदगी
दूसरी ओर, कल्याण-डोंबिवली महानगर पालिका की महापौर एडवोकेट हर्षाली योगेश चौधरी के पति योगेश चौधरी भी कार्यालय में नियमित रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। हालांकि वे कमलेश निकम की तरह उग्र स्वभाव के नहीं हैं, लेकिन महापौर के मनपा में आने से लेकर घर जाने तक वे कार्यालय में ही डेरा डाले रहते हैं। कथित तौर पर महापौर के अधिकांश शासकीय और प्रशासकीय कार्य वही संभालते हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और जनप्रतिनिधि के अधिकारों को लेकर बहस छिड़ गई है।
कानूनी रूप से सक्षम हैं दोनों महापौर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह है कि कल्याण-डोंबिवली और उल्हासनगर दोनों ही मनपाओं की महापौर उच्च शिक्षित हैं और उनके पास कानून की डिग्री (एलएलबी) है। वे कानूनी रूप से हर फैसले को लेने और समझने में पूरी तरह सक्षम हैं तथा उन्हें किसी बाहरी सलाहकार की भी आवश्यकता नहीं है। इसके बावजूद उनके पतियों द्वारा महापौर कक्ष में बैठकर अधिकारियों के साथ बैठकें करने और प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप करने पर कानूनी और प्रशासनिक नियमों की पालना को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शासकीय नियमों के मुताबिक, किसी भी निर्वाचित पद पर बैठे पदाधिकारी के परिजन अधिकारियों को सीधे निर्देश नहीं दे सकते हैं और न ही प्रशासनिक कामकाज में हस्तक्षेप कर सकते हैं।